

दिल्ली की मतदाता सूची पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई हो गई। मामला 21 सितंबर को सूचीबद्ध था, बहस 22 को हुई, और फैसला अभी नहीं आया। अदालत ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर पूछा है कि अब तक क्या कदम उठाए गए, और दो हफ्ते बाद मामला फिर सुना जाएगा। सुनने में यह एक सामान्य अदालती तारीख लगती है। पर इस सुनवाई के अगले ही दिन इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट छपी, और दोनों को साथ रखकर पढ़ें तो तस्वीर बदल जाती है। SIR पर सवाल अब सिर्फ विपक्ष के मंच से नहीं उठ रहे। वे सुप्रीम कोर्ट की बेंच से भी उठे हैं, और खुद चुनाव आयोग के भीतर से भी।
पहले आंकड़े देख लीजिए, क्योंकि वे किसी भाषण से ज़्यादा बोलते हैं। 31 अगस्त को जारी मसौदा सूची में दिल्ली के 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 47 लाख नाम बाहर थे, यानी मोटे तौर पर हर तीसरा मतदाता। आयोग का हिसाब है कि इनमें 43 लाख से ज़्यादा “स्थानांतरित या अनुपस्थित” थे, करीब 2.8 लाख की मृत्यु हो चुकी थी और लगभग 1.4 लाख के नाम एक से अधिक जगह दर्ज थे। यहां तक बात समझ में आती है। लेकिन इसके ऊपर 33 लाख और लोग हैं जिनका नाम सूची में तो बचा है, पर हाथ में नोटिस है। करीब 13.8 लाख “नो मैपिंग” के कारण, और 19.3 लाख “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” के नाम पर। जोड़ लीजिए। देश की राजधानी का लगभग हर दूसरा मतदाता या तो सूची से बाहर है, या अपनी मौजूदगी साबित करने की कतार में खड़ा है।
अदालत में सबसे अहम बात किसी वकील ने नहीं, बेंच ने कही। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने जब याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रशांत भूषण ने नोटिसों का मामला रखा, तो न्यायमूर्ति बागची ने प्रथम दृष्टया सहमति जताई कि नोटिस लगभग यांत्रिक ढंग से जा रहे हैं और बहुत संभव है कि मशीन से बनाए गए हों। प्रधान न्यायाधीश ने आयोग से साफ कहा कि “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” का अर्थ उसे स्पष्ट करना होगा। और अदालत में रखे गए उदाहरण इस “तर्क” की पोल खुद खोलते हैं: मतदाता और उसके माता-पिता की उम्र में 15-20 साल से कम का अंतर, या दो भाई-बहनों के जन्म के बीच नौ महीने से कम का फासला। अब ज़रा सोचिए। जिस दिहाड़ी मज़दूर को ऐसा नोटिस मिले, वह आयोग के बताए बारह दस्तावेज़ों में से कौन-सा कागज़ लेकर जाए जो उसके माता-पिता की उम्र का हिसाब सुलझा दे? भूषण का तर्क यही था कि बहुत से गरीब नागरिकों के पास आधार ही इकलौता दस्तावेज़ होता है।
एक आरोप और लगा, जो अगर सच निकला तो बेहद गंभीर है। भूषण के मुताबिक जिन्हें “स्थानांतरित” बताकर हटाया गया, उन्हें पता बदलने वाला फॉर्म 8 नहीं भरने दिया जा रहा, बल्कि नए पंजीकरण का फॉर्म 6 भरवाया जा रहा है, जिसमें घोषणा करनी पड़ती है कि आपने पहले कभी वोट नहीं दिया। यानी सूची में लौटने की कीमत एक झूठी घोषणा। आयोग के वकील ने इस आरोप को निराधार और गैर-ज़िम्मेदाराना बताकर सख्ती से खारिज किया। सच क्या है, यह अदालत तय करेगी। पर ऐसा सवाल उठना ही बताता है कि ज़मीन पर प्रक्रिया कितनी उलझी हुई है।
अदालत ने अभी कोई आदेश नहीं दिया, और ईमानदारी से कहूं तो इसमें कोई बुराई नहीं। बेंच ने सुझाया कि आयोग मतदाताओं के लिए सवाल-जवाब की एक सरल मार्गदर्शिका बनाए और बीएलओ लोगों की मदद करें। प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि दिल्ली में फिलहाल कोई चुनाव सिर पर नहीं है, इसलिए प्रक्रिया ठीक करने का समय है। यह व्यावहारिक सोच है। पर समय होने का मतलब यह नहीं कि दो हफ्ते बाद फिर वही धुंध मिले।
और यहीं 23 सितंबर की इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल इस पूरी बहस को नई ज़मीन पर ले आती है। अखबार ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 तक के लिखित रिकॉर्ड खंगाले और पाया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार SIR से जुड़े ऐसे फैसलों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की, जो उनके अनुसार उनकी जानकारी के बिना लिए गए। ये आपत्तियां छोटे-मोटे मुद्दों पर नहीं थीं। नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाना और बहाल करना, मतदाता जोड़ने के खिलाफ अपीलें, और मतदाता सूचियों की अभिरक्षा व सुरक्षा। चार आपत्तियां तो एक ही दिन दर्ज हुईं। एक टिप्पणी में संधू ने लिखा कि आयोग ने दो आयुक्तों की लिखित सलाह के विरुद्ध काम किया, और उस कार्रवाई को अनधिकृत और अवैध बताया।
मेरी नज़र में सबसे चिंताजनक हिस्सा तकनीक का है। दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर उस कार्य-विभाजन पर आपत्ति जताई, जिससे पुनरीक्षण में इस्तेमाल हो रहे डिजिटल सिस्टम पर उनकी निगरानी घट गई। आयोग के इतिहास में ऐसा कदम पहले कभी नहीं उठा। रिपोर्ट गोवा का उदाहरण भी देती है, जहां 97 मतदाता निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के सामने सारी शर्तें पूरी कर चुके थे, फिर भी सॉफ्टवेयर के कारण उनके पक्ष का फैसला सिस्टम में दर्ज नहीं हो सका। अब इस टुकड़े को अदालत की बात से जोड़िए। “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” किसी अफसर की आंख से नहीं, सॉफ्टवेयर की गणना से निकलती है। आयोग का ERONET सिस्टम पुरानी “बेस” सूचियों से नाम, उम्र और रिश्तों का मिलान करता है, और मिलान न बैठे तो नोटिस। SIR के तीसरे चरण में तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र और दिल्ली में करीब 1.76 करोड़ मतदाताओं को इसी श्रेणी में नोटिस मिल चुके हैं। यानी जिस मशीन से करोड़ों नोटिस निकल रहे हैं, उसी मशीन की निगरानी किसके हाथ में रहे, यही आयोग के भीतर टकराव की जड़ है। इसे संयोग मानना मुश्किल है।
आयोग ने रिपोर्ट को खारिज किया है। उसका कहना है कि लिखित नोट, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-संतुलन सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं, विचार-विमर्श में मतभेद स्वाभाविक हैं, और पिछले साल भर के फैसले पूर्ण आयोग ने सर्वसम्मति से लिए। ECINet को उसने कड़े डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल वाला मंच बताया है। यह जवाब भी सुना जाना चाहिए। यह भी मानना पड़ेगा कि विपक्ष ने इस रिपोर्ट को जिस फुर्ती से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और दोबारा चुनाव की मांग तक खींच लिया, उसमें राजनीतिक अवसरवाद साफ दिखता है। मतदाता सूची की सफाई सचमुच ज़रूरी है। मृत लोगों के नाम, दोहरे पंजीकरण, बरसों पहले पलायन कर चुके परिवार, ये असली समस्याएं हैं। और हर कटा हुआ नाम साज़िश नहीं होता।
लेकिन आयोग के जवाब में एक गांठ है, जिसे खोले बिना बात आगे नहीं बढ़ती। अगर हर फैसला सर्वसम्मति से हुआ, तो तीन में से दो सदस्यों की ये 14 लिखित आपत्तियां आखिर क्या थीं? 2023 का कानून कहता है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से चले, और मतभेद हो तो बहुमत से फैसला हो। जब तीन में से दो सदस्य बार-बार लिख रहे हों कि फैसले उनकी जानकारी के बिना हुए, तो “सर्वसम्मति” का दावा या तो इन आपत्तियों को झुठलाता है, या सर्वसम्मति को एक खोखली मुहर बना देता है। दोनों में से कोई भी स्थिति उस संस्था के लिए अच्छी खबर नहीं, जिस पर पूरे लोकतंत्र की गिनती टिकी है।
और इस सबका बोझ आखिर उठाता कौन है? वही आम नागरिक। जिस बुज़ुर्ग महिला के नाम कोई ज़मीन नहीं, जिस मज़दूर ने तीन साल में तीन शहर बदले, जिस आदिवासी परिवार के पास कभी औपचारिक कागज़ बने ही नहीं, उन्हें अब एक सॉफ्टवेयर को यह समझाना है कि उनकी मां की उम्र उनसे सोलह साल ज़्यादा क्यों नहीं दर्ज हुई। पहले फर्ज़ी मतदाता होने का शक साबित करना राज्य का काम था। अब अपनी असलियत साबित करना नागरिक का काम है, और शक पैदा करने वाली मशीन के नियम तक उसे नहीं बताए जाते। यह सिर्फ प्रक्रिया की खामी नहीं, नागरिक और राज्य के रिश्ते की दिशा उलट देने वाली बात है।
दो हफ्ते बाद जब मामला फिर सुना जाए, तो अदालत के पास मांगने के लिए तीन सीधी चीज़ें हैं। नोटिस पाने वाले मतदाताओं की सार्वजनिक, खोजी जा सकने वाली सूची। “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” तय करने वाले मानदंड और सॉफ्टवेयर के पैरामीटर। और यह स्पष्टता कि इस प्रक्रिया के अहम फैसले किसने, किसकी सहमति से लिए। इनमें से कुछ भी नया नहीं है। जनवरी में पश्चिम बंगाल के मामले में यही अदालत ऐसे मतदाताओं के नाम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों पर प्रदर्शित करने का आदेश दे चुकी है। दिल्ली के लिए पैमाना अलग क्यों हो?
जब एक मशीन तय करने लगे कि कौन संदिग्ध है, और उस मशीन पर नियंत्रण किसका हो यह खुद आयोग के भीतर विवाद बन जाए, तब सवाल सूची की शुद्धता का नहीं रह जाता। सवाल यह हो जाता है कि उस सूची पर भरोसा कौन करे। भरोसे के बिना बनी सूची चाहे जितनी “साफ” हो, वह लोकतंत्र की नींव नहीं रहती। वह बस एक डेटाबेस रह जाती है।
रविकान्त राऊत
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

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