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गिरते रुपये का बिल किसके नाम?

रुपये की गिरावट — गिरते रुपये का बिल किसके नाम?

 

रुपये की गिरावट की खबर अब अख़बार के पहले पन्ने से खिसककर बिज़नेस पेज के किसी कोने में पहुँच गई है। 94, फिर 95, फिर 96। हर नया आंकड़ा पिछले से थोड़ा कम चौंकाता है। यही सबसे ख़तरनाक बात है। जो चीज़ धीरे-धीरे बिगड़ती है, उस पर हम ध्यान देना बंद कर देते हैं, जबकि उसका बिल हर महीने किसी न किसी की जेब से चुपचाप कट रहा होता है।

इस हफ़्ते रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगभग 95.6 से 96 के बीच रहा। पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल के दाम नरम पड़े और सरकारी बैंकों के ज़रिये रिज़र्व बैंक ने डॉलर बेचे। इससे रुपये को लगातार पाँच सत्रों तक थोड़ी राहत मिली। पर यह राहत बड़ी तस्वीर नहीं बदलती। इस साल की शुरुआत में रुपया लगभग 89 पर था। मई में यह 96.84 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक गया। कैलेंडर वर्ष 2026 में अब तक यह क़रीब 7 प्रतिशत कमज़ोर हो चुका है। लगातार दूसरे साल यह एशिया की सबसे कमज़ोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में है। इसी हफ़्ते 10 साल के सरकारी बॉन्ड की yield 7.11 प्रतिशत पर पहुँची, जो मई के बाद सबसे ऊँची है। विदेशी मुद्रा भंडार भी लगातार कई हफ़्तों की बढ़त के बाद सितंबर में घटा है।

इन आंकड़ों पर बहस अक्सर दो खानों में बँट जाती है। एक खाना कहता है कि “रुपया गिर रहा है, यानी देश की साख गिर रही है।” दूसरा कहता है कि “यह बाज़ार है, मुद्रा ऊपर-नीचे होती रहती है, घबराने की बात नहीं।” दोनों में कुछ सच है, पर दोनों असली सवाल से बचते हैं। असली सवाल यह नहीं कि रुपया कितने पर है। असली सवाल यह है कि इस गिरावट का बिल किसके नाम कट रहा है, और किसके खाते में जमा हो रहा है।

शुरुआत उस बात से करें जिस पर कोई विवाद नहीं। भारत अपनी ज़रूरत का 85 प्रतिशत से ज़्यादा कच्चा तेल आयात करता है और उसका भुगतान डॉलर में होता है। इस साल मार्च में पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़ा युद्ध शुरू होने के बाद तेल महँगा हुआ। रुपये की गिरावट भी तेज़ हुई। मार्च से मई के बीच ही रुपया लगभग 5 प्रतिशत टूट गया। महँगा तेल और कमज़ोर रुपया, यह दोहरी मार है। हर बैरल के लिए ज़्यादा डॉलर चाहिए, और हर डॉलर के लिए ज़्यादा रुपये। ऊपर से अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर अनिश्चितता और विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना।

अब देखिए यह बिल पहुँचता कहाँ है। अगस्त में खुदरा महँगाई 4.82 प्रतिशत रही, जो दिसंबर 2024 के बाद सबसे ऊँची है। खाद्य महँगाई 5.95 प्रतिशत रही। सबसे ध्यान देने की बात यह है कि ग्रामीण महँगाई 5.23 प्रतिशत थी, जबकि शहरी 4.31 प्रतिशत। यानी जो परिवार सबसे कम कमाते हैं और अपनी आमदनी का सबसे बड़ा हिस्सा खाने-पीने और ढुलाई पर ख़र्च करते हैं, उन पर यह दबाव सबसे ज़्यादा है। डीज़ल, खाद, खाने का तेल, दालें, दवाओं का कच्चा माल, सब किसी न किसी रूप में डॉलर से बँधे हैं। गाँव का किसान शायद कभी डॉलर का भाव नहीं देखता, पर उसकी लागत रोज़ उसी भाव से तय हो रही है।

फिर वे परिवार हैं जिनके बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं। मध्यवर्ग के लिए यह अब कोई विलासिता नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य का एक सामान्य रास्ता बन चुका है। जिस परिवार ने साल की शुरुआत में 89 के भाव से फ़ीस का हिसाब लगाकर एजुकेशन लोन लिया था, उसके लिए वही फ़ीस अब लगभग 7 प्रतिशत महँगी है, बिना किसी की ग़लती के। विदेशी मशीनें या कच्चा माल मँगाने वाले छोटे और मझोले उद्योग भी इसी हाल में हैं। बड़ी कंपनियाँ hedging से ख़ुद को बचा लेती हैं, पर जबलपुर या इंदौर की किसी छोटी फ़ैक्ट्री के पास न वह विशेषज्ञता है, न वह पैसा।

यहाँ ईमानदारी से दूसरा पक्ष भी रखना होगा, क्योंकि वह कमज़ोर नहीं है। कमज़ोर रुपया निर्यातकों के लिए फ़ायदेमंद है। आईटी सेवाओं, दवा कंपनियों, कपड़ा और इंजीनियरिंग निर्यातकों को हर डॉलर पर ज़्यादा रुपये मिलते हैं। खाड़ी और दूसरे देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों के परिवारों को, ख़ासकर केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार में, भेजे गए पैसे की ज़्यादा क़ीमत मिलती है। कई अर्थशास्त्री यह भी कहते हैं कि रिज़र्व बैंक को किसी एक आंकड़े को बचाने के लिए भंडार नहीं फूँकना चाहिए। 2013 में भी “रुपया आईसीयू में है” जैसे जुमले ख़ूब चले थे, और तब भी सच यही था कि मुद्रा को कृत्रिम रूप से मज़बूत रखना लंबे समय में निर्यात को कमज़ोर करता है। यह तर्क सही है कि रुपये की क़ीमत राष्ट्रीय गौरव का पैमाना नहीं है।

पर यह तर्क जहाँ रुकता है, असली समस्या वहीं से शुरू होती है। कमज़ोर रुपये का फ़ायदा कुछ गिने-चुने क्षेत्रों और परिवारों तक सीमित है, जबकि उसका नुकसान लगभग हर घर तक पहुँचता है। निर्यात से मिलने वाला लाभ कंपनियों की बैलेंस शीट में जाता है। महँगाई का बोझ सीधे रसोई में उतरता है। अगर कमज़ोर रुपया सचमुच निर्यात को बड़ा धक्का दे रहा होता, तो हम व्यापार घाटे को तेज़ी से घटता देख रहे होते। ऐसा नहीं हो रहा, क्योंकि हमारा निर्यात ख़ुद आयातित कच्चे माल पर टिका है। यानी हम गिरावट की पूरी क़ीमत तो चुका रहे हैं, पर उसका पूरा फ़ायदा नहीं उठा पा रहे।

मेरा मानना है कि रुपये पर बहस को भावनाओं से निकालकर ढाँचे पर लाना होगा। रिज़र्व बैंक का काम उतार-चढ़ाव को सँभालना है, किसी स्तर को पवित्र बनाना नहीं, और वह यह काम कर भी रहा है। पर मुद्रा की कमज़ोरी की जड़ें केंद्रीय बैंक के हाथ में नहीं हैं। वे हमारी ऊर्जा नीति, हमारे व्यापार ढाँचे और हमारी निवेश-नीति में हैं। जब तक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें इतनी भारी मात्रा में आयातित तेल पर टिकी रहेंगी, दुनिया के किसी भी कोने का युद्ध सीधे हमारी थाली तक पहुँचता रहेगा। इसलिए सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और घरेलू ऊर्जा भंडारण पर निवेश केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, आर्थिक संप्रभुता का सवाल है। दूसरा, हमें ऐसा निर्यात चाहिए जिसमें भारतीय मूल्य-वर्धन ज़्यादा हो, ताकि कमज़ोर रुपया सचमुच फ़ायदे में बदले। तीसरा, सरकार को मानना चाहिए कि आयातित महँगाई का बोझ बराबर नहीं बँटता। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद सब्सिडी और ग्रामीण परिवहन पर ध्यान देना इसी गिरावट के जवाब का हिस्सा होना चाहिए।

राजनीति की भूमिका भी इसमें कम नहीं। विपक्ष में रहते हुए हर दल रुपये की गिरावट को सरकार की नाकामी बताता है, और सत्ता में आते ही उसे “वैश्विक परिस्थिति” कहने लगता है। यह दोहरापन जनता की समझ को धुँधला करता है। रुपये की गिरावट पर ईमानदार बात यह होगी कि इसके कुछ कारण हमारे बस से बाहर हैं, कुछ हमारी दशकों पुरानी नीतिगत कमज़ोरियों से जुड़े हैं, और इसकी क़ीमत बराबर नहीं बँट रही।

आगे का रास्ता आसान नहीं है। तेल के दाम पश्चिम एशिया के हालात पर टिके हैं। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता अभी अधर में है। बॉन्ड yield का बढ़ना बताता है कि सरकार और कंपनियों के लिए उधार महँगा होने वाला है। 100 का आंकड़ा अब कल्पना नहीं, एक संभावना की तरह चर्चा में है। अगर वह दिन आया, तो सुर्ख़ियाँ फिर एक दिन के लिए लौटेंगी। पर तब तक असली सवाल को टालना ठीक नहीं होगा।

रुपया एक काग़ज़ का टुकड़ा भर नहीं है। वह वादा है कि आज की मेहनत की क़ीमत कल भी बची रहेगी। जब वह वादा धीरे-धीरे कमज़ोर होता है, तो सबसे पहले वह व्यक्ति महसूस करता है जिसके पास बचाने को सबसे कम है। वह डॉलर का भाव नहीं पढ़ता, बस इतना जानता है कि इस महीने भी राशन की पर्ची पिछले महीने से लंबी हो गई है। गिरते रुपये का बिल उसी के नाम कट रहा है। सवाल यह है कि क्या हम उस बिल को देखने के लिए तैयार हैं।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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