← सभी रचनाएँ

तुम्हारे जाने के बाद

तुम चली गईं, तब भी
कमरा कहां खाली  हुआ
तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बैठी रही
कुर्सी पर,
और खिड़की के पास, 
तुम्हारी आवाज़ ठहरी रही।

आज सुबह अधजागी हालत में
मैंने तुम्हें टटोलने के लिए हाथ बढ़ाया था ,
फिर याद आया कि तुम नहीं हो,
तो मैं झट से उठ बैठा और फ़िर
इस खालीपन के अहसास से  भागने लिए
खुद को काम में झोंक दिया दिनभर

आज भी सुबह जब मैंने चाय रखता हूं
टेबल पर तो याद आता है
तुम तो ऐसे पीती थीं।
दरवाज़ा खोलता हूँ

तो एक पल को उम्मीद होती है
कि तुम सामने होओगी।
फिर याद आता है
तुम तो हो नहीं ।

मैं अब भी यह मान नहीं पा रहा
कि तुम यहाँ नहीं हो 
बार-बार आधा मुड़कर देखता हूं
ये देखने कि तुम क्या कर रही हो,

और तब मैंने जाना
मोहब्बत का वज़ूद फ़कत
साथ होने में नहीं,
किसी के न होने पर भी
उसके लिए
जगह बची होने में होता है।

रविकान्त राऊत
जबलपुर ,मध्यप्रदेश

रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

इस रचना को शेयर करें

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *