किसी परिवार में जब पहली बार “कैंसर” शब्द बोला जाता है, तो उसी दिन से घर का हिसाब-किताब बदल जाता है। पहले रिपोर्टें आती हैं, फिर डर आता है, और उसके ठीक बाद एक पर्ची आती है, जिस पर दवाओं के नाम लिखे होते हैं। उस पर्ची के साथ अक्सर एक बिना कहा निर्देश भी होता है: दवा अस्पताल की अपनी फ़ार्मेसी से ही लीजिए। उस घड़ी में कोई मरीज़ या उसका बेटा काउंटर पर खड़े होकर यह नहीं पूछता कि इस शीशी की असली क़ीमत क्या है। डरा हुआ आदमी मोलभाव नहीं करता। और हमारी पूरी दवा-व्यवस्था इसी डर के भरोसे चलती है।
इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने उसी डर पर उँगली रखी। किशन चंद जैन बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के सामने एक कैंसर दवा का उदाहरण आया, जो रिटेलर को क़रीब 2,700 रुपये में मिलती है पर जिस पर MRP 27,000 रुपये छपी है। यानी दस गुना। एक इंजेक्शन का ज़िक्र भी हुआ, जिसकी MRP 22,437 रुपये है और रिटेलर को वह 3,520 रुपये में मिलता है। 22 सितंबर को अदालत ने इसे “दिनदहाड़े डकैती” कहा था, और 29 सितंबर को जस्टिस मेहता ने इसे सीधे “कत्लेआम” कह दिया। जस्टिस नाथ की टिप्पणी थी कि कॉरपोरेट अस्पताल अब उद्योग हैं, सेवा नहीं, और सवाल किया कि आम आदमी यह सब क्यों झेले। बेंच ने सुझाव दिया कि सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन क्यों न तय कर दिया जाए। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने माना कि यह सुझाव तर्कसंगत लगता है और विभागों से बात करने के लिए समय माँगा। अगली सुनवाई अक्टूबर के दूसरे हफ़्ते में है।
ख़बर इतनी ही है। पर इसके भीतर जो सवाल है, वह एक दवा की क़ीमत से कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि जिस बाज़ार में ख़रीदार के पास न विकल्प है, न जानकारी, न समय, क्या उस बाज़ार को “बाज़ार” कहना भी ठीक है? और अगर नहीं, तो उसे बाज़ार के भरोसे छोड़ देना कितना ठीक है?
अर्थशास्त्र की किताबें कहती हैं कि क़ीमत माँग और आपूर्ति से तय होती है। लेकिन कैंसर की दवा वह चीज़ नहीं है जिसकी माँग क़ीमत बढ़ने पर घट जाए। कीमोथेरेपी का अगला चक्र टाला नहीं जा सकता। डॉक्टर जो ब्रांड लिख देता है, मरीज़ वही ख़रीदता है। और जब अस्पताल कहता है कि बाहर की दवा की गुणवत्ता की गारंटी नहीं, तो मरीज़ के पास मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। अदालत ने भी यही बात कही कि अस्पताल के भीतर और बाहर की क़ीमतों में इतना फ़र्क़ मरीज़ों के मन में यह भ्रम पैदा करता है कि कहीं सस्ती दवा नक़ली तो नहीं। यानी यहाँ ऊँची क़ीमत केवल लूट नहीं है, वह अपने आप में एक तरह का “भरोसे का सबूत” बना दी गई है। यह सबसे चिंताजनक बात है।
MRP का यह खेल नया नहीं है। भारत में दवाओं की क़ीमतें दो हिस्सों में बँटी हैं। राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) में शामिल दवाओं पर Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत अधिकतम क़ीमत तय होती है, और उसमें रिटेलर का 16 प्रतिशत मार्जिन पहले से शामिल है। अदालत का 16 प्रतिशत वाला सुझाव यहीं से आता है। पर जो दवाएँ इस सूची से बाहर हैं, उन पर कंपनी अपनी मर्ज़ी से MRP छाप सकती है, बस साल में दस प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा नहीं सकती। नतीजा यह है कि कंपनी MRP ऊँची छापती है, अस्पताल या डिस्ट्रीब्यूटर को भारी छूट पर माल देती है, और बीच का फ़ासला किसी की कमाई बन जाता है। मरीज़ के हिस्से केवल छपी हुई क़ीमत आती है।
इसका एक सबूत सरकार के अपने पास पहले से मौजूद है। 2018 में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने दिल्ली-एनसीआर के कुछ निजी अस्पतालों के बिलों का विश्लेषण किया था, जिसमें दवाओं और consumables पर कई सौ से लेकर क़रीब 1,700 प्रतिशत तक के मार्जिन मिले थे। उसके बाद 2019 में NPPA ने 42 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा 30 प्रतिशत तय की, और सैकड़ों ब्रांडों की MRP में भारी कमी आई। यानी यह प्रयोग हो चुका है और काम भी करता है। सवाल यह है कि जो तरीक़ा 42 दवाओं के लिए ठीक था, वह बाक़ी हज़ारों के लिए क्यों नहीं अपनाया गया।
और यह सवाल सिर्फ़ मरीज़ की जेब का नहीं है। अदालत ने एक ऐसी बात भी उठाई जिस पर कम ध्यान जाता है: जब इलाज आयुष्मान भारत या किसी सरकारी योजना के तहत होता है, तब भी अस्पताल इन्हीं फूली हुई MRP के आधार पर पैसा वसूलते हैं। जस्टिस मेहता के शब्दों में, सरकार पैसा नहीं देती, टैक्सपेयर देता है। यानी जो आदमी कभी अस्पताल नहीं गया, वह भी इस मुनाफ़े का बिल भर रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य खातों के अनुसार देश के कुल स्वास्थ्य खर्च का लगभग 40 प्रतिशत अब भी लोग अपनी जेब से भरते हैं, और उसमें दवाओं का हिस्सा सबसे बड़ा है। ICMR के अनुमान बताते हैं कि भारत में हर साल 15 लाख से ज़्यादा नए कैंसर मामले सामने आ रहे हैं, और यह संख्या बढ़ रही है। इतने बड़े और बढ़ते हुए “बाज़ार” में दस गुना मार्जिन का मतलब है हज़ारों परिवारों का कर्ज़, बिके हुए खेत और बीच में छोड़ा गया इलाज।
फिर भी यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना सुर्ख़ियों में दिखता है। दवा उद्योग का तर्क है कि नई कैंसर दवाओं पर शोध में अरबों रुपये लगते हैं, और अगर हर दवा पर एक समान मार्जिन थोप दिया गया तो कंपनियाँ नई दवाएँ भारत में लाना ही बंद कर सकती हैं। निजी अस्पताल कहेंगे कि उनकी फ़ार्मेसी केवल दुकान नहीं है, वहाँ cold chain, विशेषज्ञ फ़ार्मासिस्ट और दवा की शुद्धता की ज़िम्मेदारी भी है, जिसकी लागत होती है। यह भी सच है कि कई अस्पताल कमरे और जाँच की दरें कम रखकर दवाओं से घाटा पूरा करते हैं, और अगर दवा का मुनाफ़ा रोका गया तो वही पैसा किसी और मद में जोड़ दिया जाएगा। दवा-मूल्य नियंत्रण के इतिहास में ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ क़ीमत दबाने पर कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया और बाज़ार में कमी हो गई।
इन तर्कों को ख़ारिज करना आसान नहीं, पर ये उस फ़ासले का जवाब नहीं देते जिसकी बात अदालत कर रही है। शोध की लागत कंपनी की क़ीमत में होती है, यानी PTR में। 2,700 से 27,000 का फ़ासला शोध की लागत नहीं है, वह वितरण की श्रृंखला में बँटा हुआ मुनाफ़ा है, जिसका दवा बनाने से कोई लेना-देना नहीं। 16 प्रतिशत की सीमा कंपनी की क़ीमत को नहीं छूती, वह केवल उसके ऊपर जोड़े जाने वाले हिस्से को छूती है। और अगर अस्पताल दवा के मुनाफ़े से बाक़ी सेवाओं की लागत चला रहे हैं, तो ईमानदारी यही है कि वह लागत खुले बिल में दिखे, कैंसर की शीशी के भीतर छिपी न रहे। छिपा हुआ शुल्क हमेशा सबसे कमज़ोर आदमी से वसूला जाता है।
मेरी समझ में इस बहस का असली केंद्र “मार्जिन कितना हो” नहीं, बल्कि “MRP का मतलब क्या हो” है। आज MRP एक काग़ज़ी संख्या बन गई है, जो बताती है कि अधिकतम कितना वसूला जा सकता है, यह नहीं कि चीज़ की असली क़ीमत क्या है। अगर हर दवा पर MRP के साथ PTR भी छपना अनिवार्य हो जाए, अगर अस्पतालों को मरीज़ों को अपनी फ़ार्मेसी से ख़रीदने के लिए मजबूर करने पर साफ़ रोक हो, और अगर सरकारी योजनाओं में दवाओं का भुगतान MRP की जगह ख़रीद मूल्य पर एक तय मार्जिन के साथ हो, तो बहुत कुछ अपने आप ठीक हो सकता है। जन औषधि केंद्रों और generic दवाओं का विस्तार इसमें मदद करता है, पर कैंसर की ज़्यादातर नई दवाएँ अब भी पेटेंट या ब्रांड के घेरे में हैं, जहाँ generic विकल्प नहीं है। वहाँ केवल नियम ही बचाव कर सकते हैं।
यहाँ एक असहज बात भी कहनी होगी। यह मुद्दा किसी एक सरकार या एक अदालत का नहीं है। NPPA के पास अधिकार पहले से हैं, आँकड़े पहले से हैं, 2019 का सफल प्रयोग भी पहले से है। फिर भी बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट को “डकैती” और “कत्लेआम” जैसे शब्द इस्तेमाल करने पड़े। जब नीति बनाने वाले चुप रहते हैं और अदालत को नीति का काम करना पड़ता है, तो वह लोकतंत्र की ताक़त कम, उसकी थकान ज़्यादा दिखाता है। अक्टूबर की सुनवाई में सरकार जो जवाब देगी, वह केवल एक क़ानूनी हलफ़नामा नहीं होगा। वह यह बताएगा कि हमारी व्यवस्था बीमार आदमी को नागरिक मानती है या ग्राहक।
कैंसर का इलाज डॉक्टर करते हैं, पर उसका सबसे लंबा हिस्सा परिवार झेलता है: रात भर का सफ़र, वार्ड के बाहर की बेंच, और हर हफ़्ते काउंटर पर बढ़ता हुआ बिल। उस काउंटर के पीछे खड़ा आदमी यह नहीं जानता कि सामने वाले ने कौन-सी ज़मीन बेचकर पैसा जुटाया है। व्यवस्था को यह जानना चाहिए। किसी सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि वह स्वस्थ लोगों को कितनी सुविधाएँ देता है, बल्कि यह कि वह अपने सबसे डरे हुए नागरिक से कितना कम छीनता है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243




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