
उस दिन शुक्रवार था, आटाचक्की के पाट टाँकने का दिन। केसर बाई ने चक्की का पत्थर उतरवाकर बरामदे में लिटा दिया था। टाँकी से उसकी घिसी लकीरों पर चोट करतीं—ठक, ठक, ठक। पत्थर की धूल उनके पल्लू पर जमती जाती।
“ग्राहक कहते हैं आटा मोटा आ रहा है,” भोला ने कहा।
“पाट घिस गया था। आज टाँक रही हूँ। कल से बारीक आएगा।”
भोला सीढ़ी पर बैठा था। पास में एक थैला था।
“चाची, मैं इंदौर जा रहा हूँ। कारखाने में काम मिल गया है। बारह हजार।”
केसर बाई ने थैले की ओर देखा, कुछ नहीं पूछा।
भोला बोला, “रुक्मिणी का बाप फिर आया था। कह रहा था, दुबारा गली में दिखा तो टाँगें तोड़ देगा। जाने दो चाची। वहाँ पैसा भी है, चैन भी।”
“चैन।”
“हाँ।”
केसर बाई ने पत्थर पर हथेली फेरी। लकीरें खुरदरी थीं। ठीक थीं।
“हूँ,” उन्होंने कहा।
उन्नीस सौ तिरासी में इसी बस-अड्डे के नीम के नीचे गिरधारी दो टिकट लेकर खड़ा था—भोपाल के टिकट। भोर की गाड़ी थी। केसर सत्रह बरस की थी। वह उसे घर की छत से, गली के मोड़ से और अंत में नीम के पीछे से देखती रही थी। उसके पैर आगे नहीं बढ़े।
बस चली गई।
गिरधारी उसमें नहीं बैठा। वह दोपहर तक नीम के नीचे खड़ा रहा। फिर उसका कोई पता नहीं चला।
छह महीने बाद केसर का विवाह रामप्रसाद से हुआ। चक्की उन्हीं की थी। वे भले आदमी थे। इक्कीस वर्षों में उन्होंने कभी आवाज़ ऊँची नहीं की। जब वे गए, मोहल्ले की औरतें रोईं। केसर सूखी आँखों से बैठी रहीं।
लोगों ने कहा—“कितनी हिम्मत वाली है।”
केसर कुछ नहीं बोलीं। आँसू आए थे, गले तक आए थे, फिर वहीं रुक गए—जैसे कोई चीज पूरी बनने से पहले ही अटक गई हो।
दोपहर में गोमती काकी गेहूँ लेकर आईं।
“बहू कहती है, आटा बारीक चाहिए।”
“आज ही पाट टाँका है, काकी। बारीक ही आएगा।”
केसर ने भोला से पत्थर चढ़वाया। मशीन चली। नीचे की टोंटी से सफेद, महीन और गरम आटा गिरने लगा। उन्होंने हथेली नीचे कर दी। हथेली भर गई।
शाम को भोला थैला उठाकर खड़ा हुआ।
“चलता हूँ, चाची। भोर की गाड़ी है।”
“जा।”
वह दो सीढ़ियाँ उतरा, फिर मुड़ा।
“कुछ कहना है?”
केसर मशीन के पास खड़ी थीं। पल्लू पर पत्थर की धूल थी।
“बस-अड्डे पर नीम का पेड़ अब भी है?”
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भोला ने अजीब नज़र से देखा। न
“हाँ, है। क्यों?” “कुछ नहीं।” भोला चला गया। गली के मोड़ पर पहुँचकर वह रुका। थैला कंधे से उतारा। नीम की ओर देखा। केसर ने दुबारा उस ओर नहीं देखा। भीतर गईं और मशीन फिर चला दी। गोमती काकी का गेहूँ अभी आधा बाकी था। आटा गरम था। दो टिकट और एक पेड़। एक टिकट गाड़ी में गया, एक पेड़ के नीचे रह गया। चालीस बरस बाद पेड़ अब भी है। गाड़ियाँ अब भी सुबह जाती हैं। रविकान्त राऊत जबलपुर,मध्यप्रदेश 9425611243

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