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बापू आज होते तो

आरव ने उस आदमी को ब्लॉक कर दिया। वह उसे जानता भी नहीं था। केवल इसलिए कि उसने उसकी बात से असहमति जताई थी। कुछ क्षण पहले तक आरव उसके जवाब में तीखी टिप्पणी लिख रहा था। फिर उसकी उंगली स्क्रीन पर रुक गई। अचानक उसे लगा – क्या असहमति का जवाब अपमान ही होना चाहिए? उसने मोबाइल बंद किया और कुर्सी पर पीछे टिक गया। कमरे की दीवार पर गांधी की एक छोटी-सी तस्वीर टंगी थी। किसी पुराने कैलेंडर से काटकर उसने न जाने कब वहाँ चिपका दी थी। उसने शायद ही कभी उस तस्वीर को ध्यान से देखा था। आज उसकी नजर पहली बार गांधी के चेहरे पर ठहर गई। 2 अक्टूबर आने वाला था। हर साल की तरह इस बार भी कॉलेज में गांधी जयंती मनाई जानी थी। भाषण होंगे, पुष्पांजलि होगी और सत्य, अहिंसा, स्वच्छता और सादगी की बातें होंगी। लेकिन उस रात आरव के मन में एक अलग सवाल उठा – अगर गांधी आज होते तो क्या कहते? क्या वे उसके हाथ से मोबाइल छीन लेते? क्या वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विरोध करते? क्या वे सोशल मीडिया छोड़ने को कहते? या फिर केवल इतना पूछते – “तुम इन सबका इस्तेमाल कर रहे हो, या ये सब तुम्हारा?” आरव देर तक तस्वीर को देखता रहा। उसे पहली बार लगा कि गांधी शायद आज की दुनिया के लिए उतने पुराने नहीं हैं, जितने उसे अब तक लगते रहे थे। अगले दिन कॉलेज में उसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर प्रस्तुति देनी थी। उसने रात में पूरा काम एक AI टूल से कर लिया। विषय था -“The Future of Humanity.” प्रस्तुति सुंदर थी, भाषा प्रभावशाली थी और तर्क व्यवस्थित थे। सुबह उसे लगा कि यह प्रस्तुति उसकी है ही नहीं। उसने स्लाइडें खोलीं। हर बात सही थी, लेकिन उनमें आरव कहीं नहीं था। उसने प्रस्तुति दोबारा बनाई। AI से मदद ली, मगर इस बार अपने अनुभव, अपनी भाषा और अपने प्रश्न उसमें जोड़े। प्रस्तुति के अंत में उसने एक वाक्य लिखा-“तकनीक हमारी क्षमता बढ़ा सकती है, लेकिन हमारी जगह सोच नहीं सकती।” मंच से उतरते हुए उसे लगा, शायद गांधी आज होते तो मशीन तोड़ने नहीं जाते। वे केवल यह देखते कि मशीन के सामने मनुष्य की स्वतंत्रता बची है या नहीं। उसे पहली बार “स्वराज” का एक नया अर्थ समझ आया – दूसरों पर शासन करने से पहले अपने ऊपर शासन। आज का स्वराज शायद केवल सत्ता से स्वतंत्र होना नहीं था। वह अपने मोबाइल, अपनी आदतों, अपनी प्रतिक्रियाओं और अपने लालच पर भी अधिकार था। कुछ दिनों बाद सोशल मी डिया पर एक विवाद छिड़ गया। एक मित्र ने किसी व्यक्ति के बारे में अपमानजनक टिप्पणी लिखी। आरव भी जवाब देने लगा। शब्द तैयार थे। तर्क भी था। केवल संयम नहीं था। उसे कुछ दिन पहले की अपनी टिप्पणी याद आई। उसने उत्तर लिखकर मिटा दिया। उसे लगा, गांधी की अहिंसा शायद आज लाठी और बंदूक के बीच नहीं, कीबोर्ड और शब्दों के बीच भी अपनी परीक्षा दे रही है। किसी को चोट पहुँचाने के लिए हाथ उठाना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक वाक्य ही काफी होता है। उस दिन आरव ने पहली बार महसूस किया कि असहमति का अर्थ दुश्मनी नहीं होता। गांधी की तस्वीर अब उसके कमरे की दीवार पर नहीं थी। वह उसके विचारों में कहीं आने लगी थी। एक दिन उसने दादी के घर पड़ा पुराना चरखा देखा। वह धूल से ढका था। आरव ने उसे छुआ, मगर चला नहीं सका। उसने सोचा- आज चरखे का अर्थ क्या होगा?शायद केवल सूत कातना नहीं। जो युवा अपने हाथ से कोई वस्तु बनाता है, कोई कोड लिखता है, खेत में नई पद्धति अपनाता है, कविता लिखता है या किसी समस्या का समाधान खोजता है- वह भी अपने समय का चरखा चला रहा है। चरखा शायद उस आत्मनिर्भरता का प्रतीक था जिसमें मनुष्य केवल बाजार का ग्राहक नहीं रहता, कुछ बनाने वाला भी बनता है। आरव ने उसी दिन अपने कमरे की मेज पर पड़ा एक अधूरा प्रोजेक्ट उठाया और उसे पूरा करने बैठ गया। फिर एक दिन ऑनलाइन खरीदारी करते हुए उसने कई चीजें कार्ट में डाल दीं। कुछ देर बाद वह स्क्रीन को देखता रहा।उसे गांधी का वह आग्रह याद आया जिसमें जरूरत और लालच के बीच अंतर करने की बात थी। उसने खुद से पूछा- “मुझे सचमुच इन सबकी जरूरत कितनी है?” दो चीजें उसने हटा दीं। बात बहुत छोटी थी। लेकिन उस छोटे-से निर्णय ने उसके भीतर एक और दरवाजा खोल दिया। उसे समझ आया कि पर्यावरण की रक्षा केवल पेड़ लगाने या नारे लगाने से नहीं होगी। वह हमारी खरीदारी की आदतों में भी होगी, उस चीज को फेंकने से पहले भी होगी जिसे थोड़े और समय इस्तेमाल किया जा सकता है और उस जरूरत को पहचानने में भी होगी जो वास्तव में जरूरत नहीं, केवल इच्छा है। 2 अक्टूबर आ गया। कॉलेज का मैदान सजा हुआ था। गांधी की बड़ी तस्वीर के सामने फूल रखे थे। मंच पर भाषण हो रहे थे। आरव पीछे बैठा सुन रहा था। वही शब्द, जो हर वर्ष सुनाई देते थे। लेकिन इस बार उसे वे पुराने नहीं लगे। उसे लगा, शायद पुराने शब्द नहीं होते। पुराने केवल हमारे सुनने के तरीके हो जाते हैं। कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोग बाहर निकलने लगे। मैदान में कागज और प्लास्टिक के कुछ टुकड़े पड़े थे। आरव ने झुककर एक कागज उठाया। कूड़ेदान कुछ कदम दूर था। उसने कागज उसमें डाल दिया। पास खड़े मित्र ने हँसते हुए कहा, “अब तू गांधी बनने लगा है क्या?” आरव भी हँसा। “नहीं।” “फिर?” “बस इतना समझ आया है कि उन्हें याद करने और उनकी किसी बात को अपने जीवन में उतारने में बहुत फर्क है।” मित्र कुछ नहीं बोला। दोनों आगे बढ़ गए। उस रात आरव ने मोबाइल खोला। उसने नोट्स में एक नया पन्ना बनाया। शीर्षक था – “मेरे समय का गांधी।” नीचे उसने लिखा – “मुझे गांधी जैसा नहीं बनना है। मुझे अपने समय में उनके सवालों को जीवित रखना है।” फिर उसने एक ही सवाल लिखा – “मैं जो कर रहा हूँ, क्या उससे मैं बेहतर मनुष्य बन रहा हूँ?” उसने मोबाइल बंद कर दिया। कमरे में अँधेरा था। दीवार पर गांधी की तस्वीर अब भी लगी थी। लेकिन उस रात आरव को पहली बार लगा कि तस्वीर दीवार पर नहीं है। वह उसके भीतर कहीं टंगी है। दुनिया बदल रही थी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य के काम करने के तरीके बदल रही थी। सोशल मीडिया लोगों के विचारों और रिश्तों को प्रभावित कर रहा था। बाजार जरूरत और इच्छा के बीच की सीमा मिटा रहा था। भविष्य पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और तेज होने वाला था। लेकिन आरव को अब लगता था कि भविष्य का असली प्रश्न मशीनों की बुद्धिमत्ता नहीं है। प्रश्न यह है कि इतनी शक्ति हाथ में आने के बाद मनुष्य अपने भीतर कितना मनुष्य बचा पाता है। शायद बापू आज होते तो Gen Z से चरखा चलाने को नहीं कहते। मोबाइल छोड़ने को भी नहीं कहते। AI से डरने को भी नहीं कहते। वे शायद केवल इतना कहते – “दुनिया को बदलने की अपनी शक्ति बढ़ाते जाओ, लेकिन यह मत भूलो कि तुम्हें अपने भीतर के मनुष्य को भी उतनी ही ताकत देनी है।” और शायद गांधी को आज याद करने का सबसे सच्चा तरीका यही होता- उनकी तस्वीर के सामने फूल रखने से पहले, अपने किसी निर्णय के सामने उनका एक सवाल रख देना। रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

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