
सितंबर का महीना उत्तर भारत के लिए एक अदृश्य उलटी गिनती लेकर आता है। पंजाब और हरियाणा के खेतों में धान की बालियां अभी हरी हैं, लेकिन अगले डेढ़-दो महीने में यही खेत एक ऐसे फैसले का मैदान बनेंगे जो दिल्ली-एनसीआर की सांसों की गुणवत्ता तय करेगा। हरियाणा सरकार के अपने आकलन के मुताबिक इस सीजन करीब अस्सी लाख टन धान की पराली पैदा होने का अनुमान है, जो लगभग सोलह लाख हेक्टेयर में हुई धान की खेती से निकलेगी। सवाल वही पुराना है, पर हर साल पहले से ज्यादा तीखा होता जाता है: क्या इस बार खेत जलने से बचेंगे, या अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली फिर धुंध की चादर में लिपट जाएगी?
यह चिंता निराधार नहीं है। इसी साल अप्रैल-मई में जब गेहूं की पराली जलाने का मौसम था, पंजाब में दो मई तक 2,403 आगजनी की घटनाएं दर्ज हो चुकी थीं, और एक ही दिन में 644 मामले सामने आए – इस सीजन का सबसे बड़ा उछाल। यह आंकड़ा 2024 की इसी अवधि के 437 मामलों से दोगुने से भी ज्यादा था। पिछले छह वर्षों का पूरा रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर उतार-चढ़ाव भरी है — 2020 में 13,420, 2022 में 14,511, तो 2025 में घटकर 10,207 – यानी न तो यह समस्या हमेशा के लिए हल हुई है, न ही यह मान लेना ठीक होगा कि हर साल सुधार ही होता रहेगा। नीति और नीयत, दोनों की परीक्षा हर मौसम में नए सिरे से होती है।
इस बार वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने पहले से कहीं ज्यादा विस्तृत खाका खींचा है। हर गांव और हर खेत की मैपिंग होगी, यह दर्ज किया जाएगा कि कौन किसान अपनी पराली में-सीटू यानी खेत में ही सड़ाकर निपटाएगा और कौन उसे उद्योगों को बेचेगा। सौ किसानों पर एक नोडल अधिकारी तैनात होगा, संवेदनशील “हॉटस्पॉट” गांवों में यह अनुपात पचास किसानों तक सीमित होगा। शाम और रात में गश्त बढ़ाई जाएगी, क्योंकि उपग्रह से निगरानी अक्सर रात में जलाई गई आग को पकड़ नहीं पाती। जिला और ब्लॉक स्तर पर विशेष “पराली सुरक्षा बल” बनाए जा रहे हैं, और उल्लंघन करने वालों की भू-अभिलेख में लाल प्रविष्टि के साथ पर्यावरण क्षतिपूर्ति भी वसूली जाएगी। हरियाणा ने अपनी अस्सी लाख टन पराली में से पच्चीस लाख टन उद्योगों – बायोमास संयंत्र, संपीड़ित बायोगैस, बिजलीघर, इथेनॉल और पैकेजिंग उद्योग – को भेजने, पैंतालीस लाख टन खेत में ही मिलाने और दस लाख टन चारे के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनाई है। बावन हजार से ज्यादा हैप्पी सीडर, स्ट्रॉ चॉपर और जीरो-टिल सीड ड्रिल जैसी मशीनें किसानों तक पहुंचाई भी जा चुकी हैं।
कागज़ पर यह योजना ठोस दिखती है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह ढांचा उस आर्थिक मजबूरी को समझता है जिसके चलते किसान हर साल आग का सहारा लेता है। धान की कटाई और गेहूं की बुआई के बीच किसान के पास मुश्किल से दो-तीन हफ्तों की खिड़की होती है। मशीनों का किराया, डीजल की लागत, और मजदूरों की कमी – इन सबके सामने आग सबसे सस्ता और सबसे तेज़ रास्ता बन जाती है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जब सरकार ने जुर्माना दोगुना किया था, तब पंजाब के किसान संगठनों ने साफ कहा था कि दंड बढ़ाने से पहले मशीनरी और मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए थी। यह टकराव आज भी उतना ही प्रासंगिक है – प्रवर्तन और प्रोत्साहन के बीच का संतुलन अब तक ठीक से नहीं बैठा है। जब तक पराली से बनने वाले उत्पादों -बायो-सीएनजी, इथेनॉल, पैकेजिंग सामग्री – के लिए उद्योगों की खरीद-गारंटी और मूल्य-स्थिरता तय नहीं होती, “एक्स-सीटू” प्रबंधन एक सरकारी योजना ही बना रहेगा, बाज़ार-चालित समाधान नहीं बन पाएगा।
दूसरी तरफ यह भी याद रखना जरूरी है कि दिल्ली का प्रदूषण संकट सिर्फ पराली की कहानी नहीं है। पिछली सर्दियों में जब दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक बार-बार साढ़े तीन सौ के पार गया और ग्रैप के तीसरे-चौथे चरण की पाबंदियां लगानी पड़ीं, तो उसके पीछे वाहनों का धुआं, निर्माण की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, कूड़ा जलाना और डीजल जनरेटर जैसे स्थानीय कारण भी उतने ही जिम्मेदार थे। शोध बताते हैं कि दिल्ली के पीएम 2.5 प्रदूषण में आधे से ज्यादा हिस्सा अकेले वाहनों का है, जबकि पराली का योगदान सामान्य दिनों में एक प्रतिशत से भी कम रह जाता है – हां, दिवाली के आसपास चंद दिनों के लिए यह हिस्सा तीस-अड़तीस प्रतिशत तक उछल सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि पराली जलाना उचित है, पर हर साल पंजाब-हरियाणा के किसान को अकेला खलनायक बनाकर दिल्ली अपनी साल भर की सुस्ती से पीछा नहीं छुड़ा सकती। ग्रैप जैसी प्रतिक्रियात्मक व्यवस्था – जो हवा जहरीली होने के बाद हरकत में आती है – असल समस्या का इलाज नहीं, सिर्फ लक्षणों की मरहम-पट्टी है।
असली समाधान दो मोर्चों पर एक साथ चलने से ही निकलेगा। पंजाब-हरियाणा को प्रवर्तन से आगे बढ़कर पराली को किसान के लिए घाटे का बोझ नहीं, आमदनी का जरिया बनाना होगा – इसके लिए बायोमास और सीबीजी उद्योग को तेजी से खड़ा करना और खरीद की गारंटी देना जरूरी है। वहीं दिल्ली-एनसीआर को यह स्वीकार करना होगा कि उसकी अपनी सड़कों, निर्माण स्थलों और उद्योगों से उठता धुआं उतना ही बड़ा अपराधी है, और उस पर साल भर, न कि सिर्फ नवंबर में, काम करना होगा। जब तक दोनों मोर्चों पर जिम्मेदारी बराबर नहीं बंटेगी, हर सितंबर यही उलटी गिनती दोहराई जाती रहेगी – और हर नवंबर दिल्ली की सांसें फिर उधार की हवा पर टिकी मिलेंगी।
रविकान्त राऊत
जबलपुर ,मध्यप्रदेश
9425611243

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