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पुस्तक समीक्षा मौन संवाद: “कराहते कुरुक्षेत्र में युयुत्सु – बर्बरीक संवाद” की समीक्षा ‘”कुलीनता और धर्म पर एक मौन प्रतिरोध”

 

महाभारत का काल केवल युद्ध का काल नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के धर्म और अधर्म, कुलीनता और कर्मशीलता, नीति और कृपणता के संघर्ष का काल था। अनुपम त्रिपाठी का खंड-काव्य “मौन संवाद” इस संघर्ष को पुनः मानवीय चेतना के स्तर पर ले आता है। यह काव्य न केवल दो उपेक्षित पात्रों युयुत्सु और बर्बरीक का संवाद है, बल्कि उस मौन इतिहास की पुनर्स्मृति भी है जो हर युग में अकुलीन पराक्रम को कुलीनता की चौखट पर नत कर देता है। इस दृष्टि से यह खंड-काव्य महाभारत की कथावस्तु का पुनर्पाठ है , परंतु यह पुनर्पाठ किसी धार्मिक या पौराणिक भाव से नहीं, बल्कि एक गहन मानवशास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टि से किया गया है।

“मौन संवाद” का कथ्य सरल है, पर उसका आशय गहन – युद्ध समाप्त हो चुका है; रणभूमि में शवों के बीच दो आत्माएँ शेष हैं – एक, युयुत्सु, जो दासीपुत्र होते हुए भी धर्म का पक्षधर था; दूसरा, बर्बरीक, जो अकुलीन वंशज होते हुए भी सर्वाधिक सामर्थ्यवान योद्धा था। दोनों को नियति ने युद्ध से बाहर रखा – एक को उपेक्षा से, दूसरे को छल से। अब वही दोनों युद्धोत्तर मौन में एक-दूसरे से संवाद करते हैं। परंतु यह संवाद शब्दों का नहीं, बल्कि चेतना का संवाद है , जहाँ मौन, भाषा से अधिक प्रखर और सशक्त हो उठता है।

काव्य का सबसे प्रभावशाली तत्व यह है कि यह “कुलीनता” की परिभाषा को धर्म की चौखट से उठाकर मानव की आत्मा के न्यायालय में रख देता है। महाभारत के उस विराट आख्यान में जिन पात्रों को समाज ने “अकुलीन” कहकर हाशिये पर डाल दिया , उनकी आत्मगाथा अनुपम जी के शब्दों में पहली बार आवाज़ पाती है। यहाँ कृष्ण की नीतियाँ, धर्म की परिभाषाएँ और कुलीनता की सीमाएँ ,तीनों एक प्रश्न बनकर खड़ी होती हैं:- क्या धर्म केवल कुलीनों का अधिकार है? क्या नीति का औचित्य केवल वही तय करेगा जो सत्ता में है?

अनुपम त्रिपाठी ने “मौन” को एक सक्रिय भाषा बना दिया है। यह मौन निरपेक्ष नहीं, बल्कि मुक्तिबोधी मौन है , जिसमें कराह, चीख और आत्मचेतना एक साथ गूँजती है। अनुपम जी ने मौन को विचार की उपस्थिति बना दिया है। जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ यह मौन आत्मा के भीतर उतरता है। युयुत्सु का मौन – उपेक्षा का मौन है। बर्बरीक का मौन – छल और संहार का मौन है। और दोनों का संवाद – मानवता की अंतिम अपील है।

“मौन संवाद” का शिल्प अपने आप में अद्वितीय है। यह परंपरागत खंड-काव्यों की तरह नहीं, बल्कि नाट्यात्मक मंथन की तरह निर्मित हुआ है। प्रत्येक सोपान में कवि ने कथा, प्रतीक और आत्मदर्शन को एकत्र किया है। भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी मानवीय ताप से भरी है। अनुपम जी का वाक्य-विन्यास लंबा, गद्य-छंदमय और विचारशील है – जिसमें काव्य के साथ दर्शन बहता है।

यदि इस खंड-काव्य की गहरी परतों में उतरें, तो यह एक ऐसे चिंतन के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाता है जो वर्षों से साहित्यिक विमर्श में उठता रहा है कि धर्म की व्याख्या ने अकुलीनता को सदा पराधीन रखा। “महाभारत के अकुलीन नायक” में मैंने यही बात अपने तरीके से कही गई थी — कि कृष्ण की नीतियाँ, यद्यपि धर्म की रक्षा के लिए थीं, पर उनके भीतर सामाजिक पूर्वाग्रह का तत्व भी छिपा था। अनुपम जी के यहाँ वही विचार अब संवेदना का रूप ले लेता है। जहाँ तर्क मौन हो जाता है, वहाँ भावना बोल उठती है।

“मौन संवाद” की सबसे बड़ी विशेषता इसका विषय-चयन है। महाभारत जैसे बहुस्तरीय ग्रंथ से युयुत्सु और बर्बरीक को चुनना, और उन्हें युद्ध के बाद मानवीय संवाद में रूपांतरित करना, कवि की शोध-प्रखरता और मौलिकता दोनों को सिद्ध करता है। यह चयन केवल काव्यिक नहीं, बल्कि दार्शनिक है – क्योंकि इन दोनों पात्रों के माध्यम से कवि ने वर्गीय अन्याय, वैचारिक असमानता और आत्म-साक्षात्कार – तीनों को एक सूत्र में बाँध दिया है।

“मौन संवाद” अंततः मौन की पुनर्प्रतिष्ठा है — एक ऐसा मौन जो न निष्क्रिय है, न पलायनवादी। यह मौन विरोध का सबसे परिपक्व रूप है। यह उन सभी आवाज़ों का प्रतिनिधि है जिन्हें इतिहास ने दबा दिया। महाभारत का युद्ध भले समाप्त हो गया, पर “मौन संवाद” में वह पुनः आरंभ होता है – इस बार रणभूमि में नहीं, मनुष्य के भीतर। यह खंड-काव्य हमें बताता है कि “धर्म तब तक अधूरा है जब तक उसका न्याय हर वर्ग, हर वर्ण, हर अकुलीन आत्मा तक न पहुँचे।” अनुपम त्रिपाठी का यह काव्य उस अधूरे धर्म को पूर्णता देता है और अपने मौन में एक ऐसा स्वर रचता है जो आने वाले समय तक गूँजता रहेगा।

मेरी मित्रता और साहित्यिक सहयात्रा की पृष्ठभूमि में कहना चाहता हूँ—अनुपम जी का “मौन संवाद” न केवल उनके काव्य-शिल्प का शिखर है, बल्कि वह उन अनसुनी आवाज़ों की पुनर्प्रतिष्ठा है, जिन्हें इतिहास ने दबा दिया था। इस काव्य के माध्यम से अनुपम जी ने धर्म, मानवीयता और स्वरहीन जीवन के पक्ष में वह मौन प्रतिरोध रचा है, जिसे आने वाला समय सहेजेगा।

रविकान्त राऊत 
जबलपुर, मध्यप्रदेश 
9425611243 

 

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