← सभी रचनाएँ

कुर्सी

जंगल में पड़ी लकड़ी…
और घर में रखी कुर्सी —
दोनों एक ही वृक्ष से जन्मी थीं,
पर अर्थ ने उन्हें अलग कर दिया।

उसके घर की पुरानी कुर्सी खिड़की के पास रखी रहती थी।
नीम के पेड़ की छाया दोपहर को धीरे-धीरे फर्श पर उतर आती,
और शाम को वही कुर्सी सूर्यास्त की गवाह बनती।

वह रोज़ वहीं बैठती थी।
कभी चाय का कप हाथ में,
कभी अधखुली किताब गोद में,
और कभी—बस यादें।

उस कुर्सी पर बैठते ही
घर “घर” हो जाता था।

उस दिन जब वह पहली बार आया था,
तो उसने कुर्सी की ओर इशारा कर कहा था—
“यहीं बैठूँ?”

वह मुस्कुराई थी।
उसे पता था—
यह सवाल बैठने का नहीं,
ठहरने का था।

धीरे-धीरे वह कुर्सी
दो लोगों की प्रतीक्षा करने लगी।
कभी वह बैठता,
कभी वह,
और कई बार—
दोनों पास-पास ज़मीन पर।

कुर्सी तब भी वहीं रहती—
एक साक्षी की तरह।

बारिश की एक शाम,
जब बिजली चली गई थी,
वह कुर्सी खिड़की से आती ठंडी हवा को रोकते हुए
उसके लिए पीठ बन गई थी।
और उसके लिए—
उसका कंधा।

कुर्सी जानती थी—
अब वह सिर्फ़ लकड़ी नहीं रही।
वह बैठने की जगह नहीं,
रुक जाने की जगह बन चुकी थी।

फिर एक दिन वह चला गया।
घर वैसा ही रहा,
नीम का पेड़ भी,
खिड़की भी।

बस कुर्सी थोड़ी भारी हो गई।

आज भी वह उस पर बैठती है।
कभी-कभी हाथ फेरती है उसकी पीठ पर,
जैसे किसी पुराने विश्वास को छू रही हो।

जंगल में पड़ी लकड़ी
कभी नहीं जान पाती—
कि घर में रखी कुर्सी
सिर्फ़ शरीर को नहीं,
किसी की अनुपस्थिति को भी संभालती है।

रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
9425611243

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *