
गाँव का नाम था देवपुर—नदी के किनारे बसा, पीपल और नीम की छाया में साँस लेता हुआ एक साधारण-सा गाँव। देवपुर में एक पुराना मंदिर था, जिसकी घंटियों की आवाज़ सुबह की चिड़ियों से पहले उठती थी। लोग कहते थे—“यह मंदिर विश्वास पर टिका है।”
मंदिर का दीप वर्षों से हरि शास्त्री जलाते आ रहे थे। सफ़ेद धोती, शांत आँखें, और माथे पर हल्की-सी चंदन रेखा। लोग उन्हें ज्ञानी मानते थे, पर कोई नहीं जानता था कि हरि शास्त्री के भीतर एक गहरा द्वंद्व पल रहा था।
उस वर्ष बारिश समय पर नहीं आई। खेत सूखने लगे। कुएँ का पानी नीचे उतर गया। गाँव में पहली बार विश्वास डगमगाया। हर शाम चौपाल पर लोग पूछते— “इतनी पूजा-पाठ के बाद भी ऐसा क्यों?”
एक दिन शास्त्री जी का बेटा अनिरुद्ध शहर से लौटा। पढ़ा-लिखा, तर्कशील, और सवालों से भरा हुआ। उसने पिता से कहा— “बाबा, क्या आपको कभी संदेह नहीं होता? इतने वर्षों से दीप जला रहे हैं, पर गाँव की हालत तो वही है।”
हरि शास्त्री चुप रहे। उस रात वे मंदिर में अकेले बैठे थे। दीपक की लौ काँप रही थी। पहली बार उनके हाथ भी काँपे। उनके मन में प्रश्न उठा—क्या मैं सचमुच विश्वास करता हूँ, या बस आदत निभा रहा हूँ? वह प्रश्न उनके भीतर किसी तूफ़ान की तरह उठा। उन्होंने दीप बुझा दिया।
अगली सुबह गाँव में हंगामा मच गया। “मंदिर का दीप बुझ गया!” लोगों ने इसे अपशकुन माना। कुछ ने कहा—“अब तो सब खत्म।”
अनिरुद्ध ने पिता से पूछा—“आपने ऐसा क्यों किया?”हरि शास्त्री ने धीमे स्वर में कहा—“क्योंकि कल पहली बार मुझे संदेह हुआ… और उसी क्षण मैंने महसूस किया कि मेरा विश्वास ज़िंदा है।”
गाँव वाले इकट्ठा हुए। शास्त्री जी ने कहा—“जिस विश्वास को प्रश्नों से डर लगे, वह विश्वास नहीं, डर है। संदेह उस दीये की हवा है, जिससे लौ और तेज़ होती है।”
उस शाम गाँव के हर घर से एक दीप निकला। लोग मंदिर पहुँचे। किसी ने शास्त्री जी से दीप जलाने को नहीं कहा। इस बार अनिरुद्ध ने दीप जलाया। अजीब संयोग था— उसी रात पहली बारिश नहीं हुई,पर उस रात जो बरसा—वह था डर का अंत।
देवपुर में अब भी सूखे साल आते हैं। सवाल भी उठते हैं। पर मंदिर का दीप अब कभी अकेला नहीं जलता। और हरि शास्त्री मुस्कराकर कहते हैं— “यदि तुम कभी संदेह महसूस करो, तो मत समझना कि तुम विश्वास से दूर हो। संदेह वह जगह है, जहाँ विश्वास साँस लेता है।”
रविकान्त राऊत जबलपुर मध्यप्रदेश
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243


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