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गार्गी से गीब्रा तक-स्त्री-ऋषिकायें और ए.आई.-एथिक्स

 जब प्रश्न ही ब्रह्म था, और आज भी है

जबलपुर में नर्मदा के किनारे एक छोटे-से कोचिंग सेंटर में, शाम की उस घड़ी जब सूरज घाटों पर सुनहरा उतरता है, मेरी पोती लैपटॉप की स्क्रीन पर पायथन का कोड चला रही थी। उसने बिना सिर उठाए पूछा – “दादाजी, अगर ए.आई. सब कुछ सीख लेगा, तो हम आगे क्या पूछेंगे?”

यह सवाल इतना सीधा था कि उसकी गहराई तुरंत समझ नहीं आई। पर उसी शाम, नर्मदा की धार देखते हुए, मुझे राजा जनक की वह सभा याद आ गई जहाँ दक्षिणा सोने की नहीं, प्रश्नों की दी जाती थी और उस सभा में सबसे तीखा प्रश्न पूछने वाला कोई पुरुष ऋषि नहीं एक स्त्री थी, गार्गी वाचक्नवी।

गार्गी वाचक्नवी प्राचीन भारत की उन गिनी-चुनी दार्शनिकों में थीं जिन्हें वेदों की व्याख्याता और ब्रह्मवादिनी के रूप में जाना जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय में, राजा जनक के उस विख्यात यज्ञ के वर्णन में, उनका नाम दो बार आता है, जहाँ वे याज्ञवल्क्य से सीधे अध्यात्म पर संवाद करती हैं।

उपनिषद् बताता है कि उस सभा में नौ विद्वानों ने प्रश्न किए थे, और उनमें गार्गी अकेली स्त्री थीं जिन्होंने दो बार प्रश्न पूछे। वे जनक के दरबार के नवरत्नों में गिनी जाती थीं, और कहा जाता है कि उन्होंने ऋग्वेद के कुछ सूक्त भी रचे। यह किसी आधुनिक “नारी सशक्तिकरण” के पोस्टर की कहानी नहीं थी, यह वैदिक भारत की वह प्रयोगशाला थी जहाँ सत्य की एकमात्र कसौटी तर्क था, लिंग नहीं।

प्रश्नों की सीढ़ी: भारत की सुकराती पद्धति

गार्गी ने याज्ञवल्क्य से केवल पूछा नहीं, वे एक-एक कर सीढ़ियाँ चढ़ती गईं। बृहदारण्यक के उस अंश में संवाद कुछ इस तरह बढ़ता है — यह पृथ्वी किस पर टिकी है? जल पर। जल किस पर? वायु पर। वायु किस पर? अंतरिक्ष-लोकों पर। हर उत्तर अगले प्रश्न की सीढ़ी बन जाता है, जब तक गार्गी अंतिम प्रश्न तक नहीं पहुँच जातीं — वह कौन-सा धागा है जिसमें यह समूचा ब्रह्मांड पिरोया हुआ है?

याज्ञवल्क्य तीन उत्तर देते हैं – हिरण्यगर्भ, अंतर्यामी, और अक्षर। पर जब गार्गी और आगे बढ़ने का साहस करती हैं, तो याज्ञवल्क्य चेतावनी देते हैं — अधिक मत पूछो, नहीं तो सिर गिर जाएगा। यह चेतावनी धमकी नहीं थी, यह एक कार्यप्रणाली थी। हर तार्किक ढाँचे में एक बुनियादी परत होती है जिसके आगे तर्क नहीं, केवल अनुभव या स्वीकृति बचती है — आज हम जिसे “अभिगृहीत” या axiom कहते हैं।

पर गार्गी वहीं रुकती नहीं। सभा की अनुमति लेकर वे फिर उठती हैं और पूछती हैं — जो आकाश के ऊपर, नीचे और बीच में है, वह किसमें ओतप्रोत है? उत्तर मिलता है — अक्षर ब्रह्म में। इसे सुनकर वे सभा से कहती हैं — इनसे कोई नहीं जीत सकता। पश्चिम में इसी तरह की प्रश्न-पद्धति को चार सौ वर्ष बाद सुकरात ने “एलेंखस” कहा; भारत में यह पहले से मौजूद थी, और उसका नाम था — अति प्रश्न। यहीं, इस सभा में, भारत के डेटा-विज्ञान का बीज छिपा है — जहाँ डेटा नहीं, प्रश्न ही प्राथमिक तत्व है।

“अति प्रश्न” और आज की ओवरफिटिंग

आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में एक जानी-पहचानी बीमारी है — ओवरफिटिंग। जब कोई मॉडल डेटा से इतने बारीक प्रश्न पूछने लगता है कि वह शोर को भी सार्थक पैटर्न मान बैठता है। गार्गी के प्रति याज्ञवल्क्य की चेतावनी असल में इसी समस्या की जड़ पर उँगली रखती है कि बुनियाद तक जाओ, पर अनंत सिलसिले में मत फँसो। आज जब बड़े भाषा मॉडल “मतिभ्रम” करते हैं, तथ्य गढ़ने लगते हैं, तो वे ठीक गार्गी की पहली सीढ़ियों पर अटके होते हैं, अक्षर तक पहुँचे बिना।

दूसरी ऋषिका — मैत्रेयी

उसी उपनिषद् में एक और स्त्री-स्वर उभरता है, याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी। जब याज्ञवल्क्य संन्यास लेने से पहले अपनी संपत्ति बाँटने चलते हैं, मैत्रेयी पूछती हैं , जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसे लेकर मैं क्या करूँ? गार्गी जहाँ ब्रह्मांड की संरचना पूछती हैं, वहीं मैत्रेयी जीवन के मूल्य पर सवाल उठाती हैं। दोनों मिलकर भारतीय ज्ञानमीमांसा के दो खंभे खड़े करती हैं — सत्ता का प्रश्न (यह क्या है) और मूल्य का प्रश्न (यह किसके लिए है)। संयोग नहीं कि आज की ए.आई.-एथिक्स भी ठीक यही दो प्रश्न दोहराती है — यह सिस्टम है क्या, और यह बना किसके लिए है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में महिला ए.आई.-शोधकर्ताओं और उद्यमियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, और उनके काम में गार्गी की उसी प्रश्न-परंपरा की झलक मिलती है।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान की मशीन इंटेलिजेंस यूनिट से जुड़ी रहीं संघमित्रा बंद्योपाध्याय, जो वहाँ निदेशक भी रह चुकी हैं और भटनागर पुरस्कार से सम्मानित हैं, विकासवादी एल्गोरिदम में उसी स्थिर समाधान, उस “अक्षर”, की खोज करती रही हैं जो शोर के बीच टिका रहे।

एसएपी लैब्स इंडिया की प्रबंध निदेशक और नैसकॉम की अध्यक्ष रह चुकीं सिंधु गंगाधरन का यह मानना सामने आया है कि नैतिक डिज़ाइन और मानव-केंद्रित तकनीक में महिलाओं की दृष्टि विशेष योगदान देती है। उद्यमिता के क्षेत्र में अश्विनी असोकन (मैड स्ट्रीट डेन), गीता मंजुनाथ (NIRAMए.आई. Health Analytix), प्रुकल्पा शंकर (Atlan) और बिंदु रेड्डी (Abacus.ए.आई.) जैसी संस्थापिकाएँ जेनरेटिव ए.आई. को स्वास्थ्य-सेवा से लेकर फिनटेक तक ले जा रही हैं।

नीति के स्तर पर भी यह धारा दिख रही है — जनवरी 2025 में अमृतापुरी में UNESCO के अंतर्गत Women for Ethical ए.आई. के दक्षिण एशियाई अध्याय का शुभारंभ हुआ, जिसका नेतृत्व अमृता विश्व विद्यापीठम कर रहा है, और जिसका लक्ष्य सैकड़ों महिलाओं को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित करना है। और शायद सबसे गार्गी-जैसा प्रश्न वह रहा जो सामने आया — कि “सिरी” और “एलेक्सा” जैसी सहायक-प्रणालियाँ “आदेश लेने वाली स्त्रियाँ” के रूप में क्यों गढ़ी गईं। यह केवल उपयोगकर्ता-अनुभव की शिकायत नहीं है, यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है, हमने ज्ञान की सेविका को स्त्री-स्वर ही क्यों दिया?

आँकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। भारत में अब तकनीकी भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी काफ़ी बढ़ चुकी है, और ए.आई. तथा मशीन लर्निंग के पाठ्यक्रमों में उनका नामांकन भी तेज़ी से ऊपर गया है। ये आँकड़े किसी नारे का हिस्सा नहीं, बल्कि गार्गी की उसी परंपरा की वापसी हैं जो हज़ारों साल पहले जनक की सभा में गूँजी थी।

यहाँ तीन जगहें हैं जहाँ प्राचीन प्रश्न-पद्धति और आज का डेटा-विज्ञान एक-दूसरे में झाँकते नज़र आते हैं।

पहली, प्रश्न की परतें, गार्गी की सीढ़ी थी — पृथ्वी से जल तक, जल से वायु तक, वायु से आकाश तक, और अंततः अक्षर तक। आज के डेटा-वैज्ञानिक की सीढ़ी कुछ यूँ है — कच्चा डेटा से फ़ीचर्स तक, फ़ीचर्स से एम्बेडिंग्स तक, वहाँ से लेटेंट स्पेस और फ़ाउंडेशन मॉडल तक, और अंततः उस “एलाइनमेंट सिद्धांत” तक जिस पर पूरा तंत्र टिका होता है। दोनों ही सीढ़ियों में हर परत पिछली परत से अपना आधार माँगती है।

दूसरी, नेति-नेति की पद्धति, याज्ञवल्क्य का उत्तर था — ब्रह्म न यह है, न वह है। आज की ए.आई.-सुरक्षा में इसी पद्धति का नाम है “रेड-टीमिंग” — यह परिभाषित करना कि मॉडल कहां तक खुद को बचा पाता है , ताकि जो बचे वही सही सीमा हो।

तीसरी, सभा की जवाबदेही। गार्गी अकेले नहीं पूछतीं — राजा जनक की पूरी सभा उस संवाद की साक्षी है। आज की ए.आई.-एथिक्स समितियाँ भी वही सभा हैं। जिस तरह उस दिन प्रश्न पूछने का अधिकार किसी संस्था के भीतर सुरक्षित था, उसी तरह आज नीति-निर्माताओं की कोशिश यही है कि प्रश्न पूछने का यह अधिकार संस्थागत रूप ले, कि यह किसी एक व्यक्ति की उदारता पर निर्भर न रहे।

गार्गी ने सिद्ध किया कि सनातन धर्म में प्रश्न करना ही उपासना है।
आज जब ए.आई. हमारे लिए उत्तर गढ़ रहा है, हमें गार्गी बनना होगा, जो उत्तर से नहीं डरती, पर उत्तर को अंतिम नहीं मानती। जो पूछती है “यह मॉडल किस अक्षर पर ओतप्रोत है? लाभ, सत्य, या सेवा?”
मेरी पोती ने फिर पूछा — “तो हम क्या पूछेंगे?” मैंने कहा — वही जो गार्गी ने पूछा था। “इस सब के पीछे वह धागा कौन-सा है जो नहीं टूटता?”

यदि भारत की बेटियाँ यह प्रश्न लैब में, नीति में, मंदिर में पूछती रहीं, तो व्यक्ति-निर्माण होगा, समाज-निर्माण होगा, और राष्ट्र-निर्माण भी।

रविकान्त राऊत 
जबलपुर,मध्यप्रदेश 
9425611243 
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