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ग्रेट निकोबार: जिनसे पूछा ही नहीं गया, उनकी ‘हाँ’ कैसे मान ली?

ग्रेट निकोबार परियोजना — ग्रेट निकोबार: जिनसे पूछा ही नहीं गया, उनकी 'हाँ' कैसे मान ली?

किसी से उसकी ज़मीन माँगने के दो तरीके होते हैं। पहला, उसके सामने बैठकर पूरी बात बताई जाए: क्या बनेगा, कितना जंगल कटेगा, उसका गाँव कहाँ जाएगा, और वह चाहे तो मना भी कर सकता है। दूसरा, एक काग़ज़ आगे बढ़ा दिया जाए और कहा जाए, यहाँ दस्तख़त कर दो। काग़ज़ पर दोनों का नतीजा “सहमति” ही लिखा जाता है। पर लोकतंत्र में इन दोनों के बीच जो फ़ासला है, वही बताता है कि कोई राज्य अपने सबसे कमज़ोर नागरिक को किस नज़र से देखता है।

5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी केंद्र सरकार की एक अर्ज़ी आई। सरकार चाहती थी कि कलकत्ता हाई कोर्ट में चल रही वह जनहित याचिका आगे न सुनी जाए, जिसमें आरोप है कि इस परियोजना के लिए आदिवासियों की सहमति लेते समय वन अधिकार कानून (Forest Rights Act) का पालन नहीं किया गया। हाई कोर्ट 6 मई को सरकार की यह प्रारंभिक आपत्ति ख़ारिज कर चुका था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दख़ल देने से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट से कहा कि वह 25-26 नवंबर की तय तारीख़ों पर सुनवाई आगे बढ़ाए। अटॉर्नी जनरल ने परियोजना को “बड़े राष्ट्रीय महत्व” का बताया। इसी सुनवाई में न्यायमूर्ति बागची ने एक बात कही जो इस पूरे विवाद की धुरी है: संस्कृति का संरक्षण संविधान से संरक्षित मौलिक अधिकार है।

यह फ़ैसला अंतिम नहीं है, सिर्फ़ प्रक्रिया से जुड़ा है। पर इसने वह सवाल फिर सामने रख दिया है जिसे “राष्ट्रीय महत्व” के शोर में बार-बार दबा दिया जाता है। जब देश किसी बड़े रणनीतिक सपने के लिए किसी छोटे समुदाय की ज़मीन लेता है, तो उस समुदाय की “हाँ” का मतलब क्या होता है? और अगर वह “हाँ” ईमानदारी से ली ही नहीं गई, तो क्या राष्ट्रीय महत्व उस कमी को ढक सकता है?

पहले परियोजना का आकार समझ लें। ग्रेट निकोबार भारत का सबसे दक्षिणी द्वीप है, जहाँ अनुमानित 81,000 करोड़ रुपये की लागत से गैलाथिया खाड़ी में एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, नागरिक और सैन्य दोनों उपयोग वाला एक हवाई अड्डा, एक बिजलीघर और एक नई टाउनशिप बनाने की योजना है। इसके लिए करीब 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि दी जानी है। सरकार के ही अनुमान से लगभग साढ़े नौ लाख पेड़ इसकी ज़द में आएँगे, और कई स्वतंत्र वैज्ञानिक यह संख्या इससे कहीं ज़्यादा मानते हैं। गैलाथिया खाड़ी लेदरबैक समुद्री कछुओं के अंडे देने की जगह है, और जंगल के भीतर शोम्पेन रहते हैं। शोम्पेन विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG) माने जाते हैं, उनकी आबादी कुछ सौ ही है और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क बहुत सीमित है। तट पर निकोबारी समुदाय के गाँव थे, जिन्हें 2004 की सुनामी ने उजाड़ दिया था।

सहमति की कहानी यहीं से उलझती है। निकोबारी लोगों की ट्राइबल काउंसिल ने शुरुआत में एक अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया था, लेकिन नवंबर 2022 में उसे यह कहते हुए वापस ले लिया कि उन्हें पहले नहीं बताया गया था कि परियोजना के लिए चिह्नित ज़मीन में उनके सुनामी से पहले के पुश्तैनी गाँव भी आते हैं। काउंसिल के अध्यक्ष के मुताबिक़ वह प्रमाणपत्र इतनी जल्दबाज़ी में लिया गया कि वे उसे ठीक से पढ़ भी नहीं पाए। इस साल जनवरी में ज़िला प्रशासन ने आदिवासी मुखियाओं को बुलाकर उनसे ज़मीन “सरेंडर” करने के प्रमाणपत्रों पर दस्तख़त करने को कहा। मुखियाओं ने मना कर दिया और सार्वजनिक रूप से कहा कि वे अपनी ज़मीन वापस चाहते हैं, उसे छोड़ना नहीं। उनका यह भी कहना है कि वन अधिकार कानून के तहत उन्हें आज तक अधिकारों का कोई प्रमाणपत्र मिला ही नहीं। जिस अधिकार को कभी काग़ज़ पर दर्ज ही नहीं किया गया, उसे “छोड़ने” का प्रमाणपत्र माँगना अपने आप में एक अजीब विरोधाभास है।

यहाँ उस कानून का मक़सद याद रखना ज़रूरी है। 2006 का वन अधिकार कानून इस स्वीकारोक्ति के साथ बना था कि आज़ादी के बाद भी जंगल में रहने वालों के साथ “ऐतिहासिक अन्याय” हुआ, क्योंकि जिन जंगलों में वे पीढ़ियों से रहते आए, वहाँ सरकारी रिकॉर्ड ने उन्हें अतिक्रमणकारी बना दिया। इस कानून की आत्मा ग्राम सभा की सहमति है, यानी यह कि जंगल का भविष्य वे लोग भी तय करें जो उसमें रहते हैं। ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियों में सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में यही रास्ता अपनाया था, जब बॉक्साइट खनन का फ़ैसला डोंगरिया कोंध की ग्राम सभाओं पर छोड़ा गया और उन्होंने एक स्वर में “ना” कहा। उस फ़ैसले ने दिखाया था कि सहमति कोई औपचारिकता नहीं है। वह एक असली अधिकार है, और उसमें इनकार का अधिकार भी शामिल है।

यह मामला सीधा नहीं है, और ईमानदारी यही माँगती है कि सरकार के पक्ष को पूरी गंभीरता से सुना जाए। ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने के पास है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में गिना जाता है। भारत का बहुत-सा कंटेनर व्यापार आज कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से होकर गुज़रता है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी एक सच्चाई है, और श्रीलंका से म्यांमार तक उसके बंदरगाह-प्रोजेक्ट किसी से छिपे नहीं हैं। इस नज़र से देखें तो ग्रेट निकोबार पर भारत की मज़बूत उपस्थिति कोई सनक नहीं, बल्कि एक जायज़ रणनीतिक ज़रूरत है। सरकार यह भी कहती है कि द्वीप का बड़ा हिस्सा आदिवासी रिज़र्व के रूप में सुरक्षित रहेगा, शोम्पेन के लिए अलग नीति है, और वन्यजीवों की निगरानी की व्यवस्था की गई है। यह भी सच है कि कोई देश हर बड़ी परियोजना को अनंत मुक़दमों में उलझा नहीं छोड़ सकता।

फिर भी यह तर्क एक जगह आकर अटक जाता है। रणनीतिक ज़रूरत यह बताती है कि कुछ बनना चाहिए, यह नहीं बताती कि इतना बड़ा और इसी तरह बनना चाहिए। एक सैन्य अड्डा, निगरानी ढाँचा या सीमित बंदरगाह भी रणनीतिक मक़सद पूरा कर सकता है। पूरी टाउनशिप, पर्यटन केंद्र और लाखों पेड़ों की कटाई इस तर्क से अपने-आप सही साबित नहीं हो जाती। सुरक्षा का तर्क जितना बड़ा होता है, उतनी ही आसानी से वह हर सवाल को “राष्ट्र-विरोधी” बताकर चुप कराने का औज़ार बन जाता है। दूसरी समस्या पर्यावरण की भरपाई से जुड़ी है। निकोबार के वर्षावन की कटाई के बदले प्रतिपूरक वनीकरण हज़ारों किलोमीटर दूर हरियाणा में किया जाना है। काग़ज़ पर हिसाब बराबर हो जाता है, पर पारिस्थितिकी के स्तर पर यह ऐसा है जैसे किसी के घर गिराकर बदले में किसी दूसरे शहर में पेड़ लगा दिए जाएँ। तीसरी बात भूगोल की है। यह द्वीप एक सक्रिय भूकंपीय पट्टी पर है, और 2004 की सुनामी ने यहाँ की तटरेखा तक बदल दी थी। इतने जोखिम वाली जगह पर इतना बड़ा शहरी निवेश अपने आप में एक ऐसा सवाल है, जिसका सार्वजनिक जवाब अब तक संतोषजनक ढंग से नहीं आया।

मेरा मानना है कि ग्रेट निकोबार की बहस को “विकास बनाम पर्यावरण” या “राष्ट्र बनाम आदिवासी” के खाँचे में रखना ही ग़लत है। असली सवाल प्रक्रिया की ईमानदारी का है। अगर परियोजना सचमुच राष्ट्रीय हित में है, तो सरकार को सहमति की प्रक्रिया से डरने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। वह पूरी जानकारी स्थानीय भाषा में सामने रखे, ट्राइबल काउंसिल की आपत्तियों का लिखित जवाब दे, वन अधिकारों का विधिवत निपटारा करे, और एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा से यह जाँच कराए कि रणनीतिक लक्ष्य कम ज़मीन और कम नुकसान में पूरा हो सकता है या नहीं। अदालत में “मामला सुनने लायक ही नहीं है” कहना इस भरोसे को कमज़ोर करता है। जो सरकार अपने फ़ैसले पर आश्वस्त हो, वह सुनवाई से बचती नहीं, उसका सामना करती है।

इस मामले का असर निकोबार से कहीं आगे जाएगा। देश भर में खदानों, बाँधों, बंदरगाहों और औद्योगिक गलियारों के लिए जंगल की ज़मीन की माँग बढ़ रही है, और लगभग हर जगह यही सवाल खड़ा है कि ग्राम सभा की सहमति असली अधिकार है या एक औपचारिक रुकावट, जिसे किसी तरह पार कर लिया जाए। अगर ग्रेट निकोबार में “राष्ट्रीय महत्व” के नाम पर वन अधिकार कानून को किनारे कर दिया गया, तो यह मिसाल बस्तर से लेकर अरुणाचल तक दोहराई जाएगी। और अगर अदालतें यहाँ प्रक्रिया की कसौटी पर टिकी रहीं, तो यह संदेश जाएगा कि संविधान का संरक्षण आबादी के आकार से तय नहीं होता।

शोम्पेन अदालत नहीं जाते। वे अख़बार नहीं पढ़ते, प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं करते, और किसी चुनाव का नतीजा भी नहीं बदलते। शायद इसीलिए उनका मामला एक कसौटी है। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब नहीं होती जब बहुमत अपनी बात मनवाता है, बल्कि तब होती है जब कुछ सौ लोगों की चुप्पी को सहमति मान लेने का प्रलोभन सामने हो, और राज्य फिर भी रुककर पूछे कि क्या उनसे सचमुच पूछा गया था। नवंबर की सुनवाई में अदालत जो भी तय करे, यह सवाल हमारे सामने बना रहेगा कि हम कैसा देश बनाना चाहते हैं: ऐसा, जिसके बंदरगाह दुनिया के सबसे बड़े बंदरगाहों में गिने जाएँ, या ऐसा, जो अपने सबसे छोटे समुदाय की “ना” सुनने का साहस भी रखता हो। एक मज़बूत राष्ट्र को इन दोनों में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ता। पर अगर उसे चुनना पड़ रहा है, तो इसका मतलब है कि कहीं कोई सवाल पूछा ही नहीं गया।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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