विगत दिनों दिल्ली के भारत मंडपम में एक बड़ा तमाशा शुरू हुआ। नौवां “इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक” खुला है, उपराष्ट्रपति ने इसका उद्घाटन किया , दुनिया भर से नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, उद्योगपति और स्टार्टअप जुटे , और पांच दिन तक “क्लाइमेट रेज़िलिएंट वॉटर मैनेजमेंट” पर गंभीर चर्चाएं हुयीं। भाषण हुये होंगे, प्रस्तुतियां हुयी होंगी, तस्वीरें खिंचेंगी गयीं होंगी, और शुक्रवार तक सब लोग अपने-अपने शहर लौट गये होंगे। ठीक इसी हफ्ते, बीते कुछ दिनों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच किशाऊ बांध परियोजना पर पानी बांटने का समझौता हुआ है, मध्य प्रदेश-गुजरात-राजस्थान-महाराष्ट्र के बीच नर्मदा को लेकर दशकों पुराना विवाद निपटा है, और बिहार-झारखंड ने सोन नदी के पानी पर 53 साल पुरानी तकरार खत्म की है। सतह पर देखें तो यह हफ्ता भारत की “जल कूटनीति” के लिए ऐतिहासिक लगता है।
लेकिन इन्हीं दिनों, ज़मीन के नीचे, एक बिल्कुल अलग कहानी चल रही है – जिस पर न कोई सम्मेलन होता है, न कोई समझौता होता है, न कोई भाषण।
यह कहानी है भारत के भूजल के लगातार सूखते जाने की। नीति आयोग के अपने आकलन के मुताबिक देश करीब साठ करोड़ लोग – यानी हर दूसरा भारतीय – उच्च से लेकर अत्यंत गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है, हर साल करीब 251 अरब घन मीटर भूजल निकालता है, जो वैश्विक भूजल दोहन का एक-चौथाई से ज़्यादा है। प्रति व्यक्ति सालाना जल उपलब्धता जो 2021 में करीब 1,486 घन मीटर थी, अनुमान है कि 2025 तक घटकर 1,341 और 2050 तक महज़ 1,140 घन मीटर रह जाएगी – यानी भारत उस रेखा के और करीब खिसकता जा रहा है, जिसके नीचे किसी देश को “जल-अभावग्रस्त” माना जाता है। नीति आयोग की ही चेतावनी है कि 2030 तक देश की पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है।
यह वह असली सवाल है, जिसे भारत मंडपम के भाषणों की चमक में अक्सर टाल दिया जाता है: क्या हम पानी को सचमुच एक राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हैं, या सिर्फ उसके प्रबंधन का तमाशा करते हैं, जबकि नीचे-नीचे संकट गहराता चला जाता है?
इस सवाल को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना ज़रूरी है। आज़ादी के बाद भारत की सिंचाई और कृषि नीति का पूरा ढांचा इस सोच पर टिका था कि पानी एक अनंत संसाधन है, जिसे जितना चाहो उतना निकाला जा सकता है। हरित क्रांति ने देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इसकी कीमत पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भूजल भंडार ने चुकाई, जहां धान और गन्ने जैसी पानी-भक्षी फसलों को मुफ्त या लगभग मुफ्त बिजली और आकर्षक न्यूनतम समर्थन मूल्य के सहारे उगाया जाता रहा। दुनिया भर में औसतन करीब सत्तर प्रतिशत ताज़ा पानी खेती में खर्च होता है, भारत में यह हिस्सेदारी इससे भी ज़्यादा मानी जाती है। नतीजा यह हुआ कि जिन इलाकों को कभी भारत की “अन्न की टोकरी” कहा जाता था, वहीं आज भूजल स्तर सबसे तेज़ी से नीचे जा रहा है।
यह विडंबना ही है कि जिस खेती ने देश को भूख से बचाया, वही खेती अब उसे प्यास की तरफ धकेल रही है।
शहरों की कहानी अलग है, पर उतनी ही चिंताजनक। बेंगलुरु की झीलें सूखना, चेन्नई का “डे ज़ीरो” के करीब पहुंचना, शिमला में गर्मियों में टैंकरों की कतारें – ये अब अपवाद नहीं, चेतावनी के संकेत बन चुके हैं। शहरीकरण जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, जल आपूर्ति और सीवेज ट्रीटमेंट का ढांचा उस रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। बारिश का पानी जो कभी तालाबों और बावड़ियों में रुकता था, अब कंक्रीट की सड़कों पर बहकर नालों में बर्बाद हो जाता है।
फिर भी, यह मान लेना अन्यायपूर्ण होगा कि सरकारों ने कुछ नहीं किया। जल जीवन मिशन ने करोड़ों ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाया है, अटल भूजल योजना जैसी परियोजनाएं सामुदायिक भागीदारी से भूजल प्रबंधन की दिशा में काम कर रही हैं, और नदी जोड़ो परियोजना जैसे बड़े विचार पर, चाहे धीमी गति से ही सही, आगे बढ़ने की कोशिश हो रही है। हाल के दिनों के अंतरराज्यीय जल समझौते भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं – और इन्हें कमतर आंकना ग़लत होगा, क्योंकि भारत में नदी जल के बंटवारे पर राज्यों के बीच सहमति बनाना अक्सर दशकों तक अटका रहता है। कावेरी, सतलुज-यमुना और महानदी , महादायी जैसे विवाद इस बात के गवाह हैं कि पानी को लेकर राज्यों के बीच राजनीतिक भरोसा बनाना कितना दुर्लभ काम है।
पर यहीं वह जगह है जहां मामला उतना सीधा नहीं रह जाता, जितना लगता है। पानी पर समझौते होना ज़रूरी है, मगर वे ज़्यादातर इस सवाल पर होते हैं कि उपलब्ध पानी को किस राज्य को कितना मिलेगा – न कि इस सवाल पर कि कुल उपलब्ध पानी ही क्यों घटता जा रहा है। यह ऐसा ही है जैसे एक परिवार अपनी घटती आमदनी को आपस में बांटने का तरीका तो सुलझा ले, पर यह न पूछे कि आमदनी घट क्यों रही है। नदी-जल बंटवारे की राजनीति ध्यान का केंद्र बन जाती है, जबकि भूजल दोहन, जो कहीं ज़्यादा बड़ा और खामोश संकट है, चुनावी भाषण में शायद ही कभी जगह पाता है – क्योंकि उसका कोई एक “दुश्मन राज्य” नहीं है, जिसके खिलाफ जनता को लामबंद किया जा सके। भूजल का संकट फैला हुआ, अदृश्य और धीमा है, और लोकतंत्र में जो संकट धीमे-धीमे आता है, उस पर तत्काल राजनीतिक कीमत चुकानी नहीं पड़ती – इसलिए उसे टाला जाना आसान हो जाता है।
एक ईमानदार आपत्ति यहां उठाई जा सकती है: क्या यह आलोचना जल संसाधन प्रबंधन की उस जटिलता को नज़रअंदाज़ नहीं करती, जिसमें केंद्र, राज्य, किसान संगठन, उद्योग और स्थानीय निकाय – सबके अलग-अलग हित जुड़े हैं? भारत का संविधान पानी को राज्य सूची का विषय बनाता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर की समान नीति बनाना संरचनात्मक रूप से कठिन है। किसानों से मुफ्त बिजली छीनना या फसल पैटर्न बदलने को कहना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है, चाहे वैज्ञानिक तर्क कितना भी मज़बूत क्यों न हो। यह आपत्ति जायज़ है – पानी का संकट सचमुच किसी एक सरकार या किसी एक नीति की नाकामी नहीं, बल्कि दशकों की सामूहिक चूक का नतीजा है, जिसमें किसान, उद्योग, शहरी उपभोक्ता और नीति-निर्माता – सब किसी-न-किसी हद तक भागीदार रहे हैं।
फिर भी, सामूहिक ज़िम्मेदारी होने का मतलब यह नहीं कि तात्कालिकता की मांग कम हो जाए। जलवायु परिवर्तन इस पूरी तस्वीर को और उलझा रहा है – मानसून अब पहले जैसा अनुमानित नहीं रहा, कम दिनों में ज़्यादा बारिश और बाकी समय सूखे जैसी स्थिति एक नया सामान्य बनती जा रही है, जिससे परंपरागत जल-प्रबंधन के तरीके अपर्याप्त पड़ रहे हैं। ऐसे में पानी को सिर्फ इंजीनियरिंग की समस्या – बांध बनाओ, नहर खोदो, नदी जोड़ो – मानकर टाला नहीं जा सकता। यह उतना ही शासन और व्यवहार का सवाल है, जितना ढांचागत निर्माण का। जब तक बिजली और फसल की नीतियां भूजल को बचाने की दिशा में पुनर्गठित नहीं होतीं, जब तक शहर बारिश के पानी को संजोने और गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल करने को अपनी बुनियादी ज़िम्मेदारी नहीं मानते, तब तक कोई भी जल सम्मेलन या अंतरराज्यीय समझौता केवल लक्षणों का इलाज रहेगा, बीमारी की जड़ का नहीं।
इसका असर सिर्फ आज के किसान या शहरी उपभोक्ता तक सीमित नहीं है। यह उस पीढ़ी का सवाल है जो अभी पैदा भी नहीं हुई। अगर प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता इसी रफ्तार से घटती रही, तो तीस साल बाद का भारत — जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और सबसे युवा कार्यबल वाला देश होने का दावा करता है — पानी की कमी के कारण अपनी ही आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की सीमा में बंध सकता है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, उद्योग, यहां तक कि सामाजिक शांति — सब किसी-न-किसी रूप में पानी की उपलब्धता से जुड़े हैं। पानी की कमी इतिहास में कई जगह सामाजिक तनाव और पलायन की वजह बनी है, और भारत जैसे विविधता भरे, संघीय ढांचे वाले देश में यह खतरा हल्के में लेने लायक नहीं।
भारत मंडपम में इस हफ्ते जो चर्चाएं हो रही हैं, वे बेकार नहीं हैं – पर वे तभी मायने रखेंगी जब सम्मेलन कक्ष से निकलकर खेत की मेड़ और शहर की छत तक पहुंचें। असली परीक्षा भाषणों में नहीं, बल्कि इसमें है कि अगले जल सप्ताह तक भूजल का स्तर कितना बदला। जब तक पानी बचाना किसी नेता के लिए उतना ही राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं बनता, जितना पानी बांटने का समझौता करना, तब तक यह संकट वहीं रहेगा जहां आज है – हर भाषण में स्वीकार किया गया, पर किसी वोट में न मांगा गया।
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

