
“वह समंदर जो कभी नहीं आया”
शाम ढल रही थी।
छत पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी—लेकिन मैंने उसे पिया नहीं। बस पकड़े रहा। जैसे कप में चाय नहीं कोई पुरानी बात थी जिसे छोड़ना मुनासिब नहीं लग रहा था।
नीचे गली में ज़िंदगी चल रही थी। ठेलेवाला आलू बेच रहा था, एक बच्चा साइकिल पर लड़खड़ा रहा था, किसी खिड़की से रोटी की महक आ रही थी। सब कुछ वैसा ही था—जैसा कल था, जैसा परसों था, जैसा शायद कल भी रहेगा।
मैं यह सब देख रहा था।
पर मैं और कहीं और भी था।
दफ़्तर में आज किसी ने टोका—”यार, आजकल कहाँ गुम रहते ho?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—”कहाँ जाऊँगा? यहीं हूँ।”
बात वहीं दफ़न हो गई।
कोई आगे नहीं पूछता। लोगों के पास फ़ुर्सत होती है—बस किसी को अपना वक़्त देने की आदत नहीं होती। मुझे इससे कोई गिला नहीं। मैं बस यह नहीं समझ पाता कि जब सब कुछ अपनी जगह है—नौकरी, घर, अपने लोग—तो यह जो भीतर एक हल्की सी कसक रहती है, वह आती कहाँ से है।
बचपन में एक बार मास्टरजी ने पूछा था—”अगर दुनिया में एक चीज़ माँग सको जो तुम्हारे पास नहीं है, तो क्या माँगोगे?”
बाकी बच्चों ने कहा—साइकिल,टी.वी.,पैसे।
मैंने कहा था—”समंदर।”
पूरी कक्षा हँसी थी।
मास्टरजी ने समझाया—”ट्रेन से जाओ,मुम्बई(तब की बम्बई)तीन सौ किलोमीटर है।”
मैं भी हँस दिया था। लेकिन जानता था कि मेरा मतलब वह नहीं था जो किसी ने समझा हो।
एक बार मैं सच में गया था।
शादी के दो साल बाद। अपनी पत्नी के साथ। मुंबई।
समंदर किनारे हम दोनों खड़े थे। लहरें आती थीं, लौट जाती थीं।
उसने कहा—”कितना सुकून है यहाँ।”
मैंने कहा—”हाँ।”
लेकिन भीतर कुछ और था। एक अजीब बेकरारी। जैसे वह जगह जो भरनी चाहिए थी—नहीं भरी। जैसे इतने बरस जिस चीज़ को खोजता रहा था, वह यह नहीं थी।
मैं समंदर देखना नहीं चाहता था। शायद मैं उस तड़प को महसूस करना चाहता था जो समंदर न होने से पैदा होती है।
फ़र्क़ बहुत बारीक है। लेकिन है।
वापसी में ट्रेन की खिड़की से बाहर देखता रहा। खेत, दरख़्त, छोटे-छोटे स्टेशन जिनके नाम पढ़ने की फ़ुर्सत नहीं थी। और धीरे-धीरे—वही शहर, वही गलियाँ, वही छत।
और एक अजीब इत्मीनान।
घर आकर कुछ सुकून मिला था।
याद आ रहा है,बचपन में एक बार रेडियो पर समुद्र की आवाज़ें सुनी थीं। लहरों का टूटना, पानी का पत्थरों से टकराना। आँखें बंद करके उस आवाज़ में डूब गया था।
जब आँखें खोलीं तो कमरा वही था। वही दिल्ली, वही छत, वही धूप।
लेकिन कुछ बदल गया था।
मैं बदल गया था।
उस दिन समझा—समंदर को देखने की ज़रूरत नहीं होती। बस उसकी आवाज़ सुनना काफ़ी है। उसकी अनुपस्थिति में उसे महसूस करना काफ़ी है।
और शायद यही सबसे गहरा अनुभव है—जो हमारे पास नहीं है, उसे अपने भीतर ढूँढ लेना।
मेरी पत्नी अक्सर कहती है—”तुम हमेशा कहीं और रहते हो।”
मैं कहता हूँ—”यहीं हूँ।”
वह कहती है—”जिस्म से।”
मैं चुप हो जाता हूँ।
क्या कहूँ? यह भी नहीं बता सकता कि कहाँ रहता हूँ। बस कहीं। एक ऐसी जगह जिसका कोई नाम नहीं, कोई पता नहीं—बस एक खिंचाव है जो हमेशा रहता है।
शायद वही मेरा समंदर है।
पड़ोस में एक शर्मा अंकल हैं।
एक शाम छत पर मुलाक़ात हुई। ऐसे ही। बिना किसी वजह के।
उन्होंने पूछा—”बेटा, खुश हो?”
मैंने कहा—”जी, बिल्कुल।”
उन्होंने मुझे देखा। थोड़ी देर। बिना कुछ कहे।
फिर बोले—”ठीक है।”
बस इतना।
लेकिन उस “ठीक है” में बहुत कुछ था। जैसे उन्होंने सब समझ लिया हो। और यह भी जान लिया हो कि पूछने से कुछ नहीं बदलता।
उस रात मुझे नींद देर से आई।
मैं कहानियाँ लिखता हूँ। रोज़।
डायरी नहीं—कहानियाँ।
ऐसी कहानियाँ जिनमें कोई न कोई किसी अनदेखी जगह की तलाश में होता है। कोई ट्रेन में बैठा बाहर देख रहा है, कोई छत पर खड़ा कहीं और है, कोई किसी से बात कर रहा है और सोच कुछ और रहा है।
मेरी पत्नी कभी-कभी पूछती है—”आज क्या लिखा?”
मैं कहता हूँ—”बस यूँ ही।”
वह आगे नहीं पूछती।
शायद जानती है कि इस “यूँ ही” का कोई तर्जुमा नहीं होता।
एक रात मैंने लिखा—
“जो चीज़ें हमारे पास नहीं होतीं, वे हमें उन चीज़ों से कहीं ज़्यादा याद रहती हैं जो होती हैं। शायद इसीलिए आदमी हमेशा कुछ न कुछ ढूँढता रहता है। तलाश ख़त्म हुई—तो वह भी।“
लिखकर कॉपी बंद की।
चाय बनाई।
पी ली।
और सो गया।
अगले दिन सुबह उठा।
दफ़्तर गया।
किसी ने पूछा—”कैसे हो?”
मैंने कहा—”बढ़िया।”
और वह दिन भी गुज़र गया।
छत पर रखी ठंडी चाय।
गली में ठेलेवाले की आवाज़।
और भीतर कहीं—एक समंदर जो कभी नहीं आया।
मैं जिसके साथ जीता हूँ।
जिसके साथ लिखता हूँ।
जिसके साथ सोता हूँ।
और हर सुबह—फिर उठ जाता हूँ।
मेरी ही तरह मेरे शहर के पास सब कुछ है। बस समंदर नहीं है। और इसी “नहीं” में शायद हमारी पूरी कहानी है।
यही मेरा मुखौटा है। चुप्पी का मुखौटा। जो सब जानता है—पर कहता कुछ नहीं।
■ रविकान्त राऊत
