दरारों में ठहरी स्त्री

प्रेम—यह शब्द हमारे बीच कभी नहीं आया। इसे कहना ऐसा होता जैसे किसी बहुत नाजुक काँच पर हथौड़ा मार देना। सच तो यह था कि उसके सामने बैठते ही मेरे भीतर का भूगोल बदलने लगता था। ठीक वैसे, जैसे किसी पुराने, धूल भरे कमरे में अचानक ताज़ी हवा का झोंका आ जाए और हर चीज़ अपनी जगह से ज़रा-सा हिलकर एक नई तरतीब में आ जाए।

वह उन पुरुषों में से नहीं था जो कमरे में दाखिल होते ही अपने व्यक्तित्व का शोर मचाते हैं। उसका आना ऐसा था जैसे शाम का धुंधलका उतरता है, बेआवाज़, लेकिन हर चीज़ को अपनी आगोश में लेता हुआ। जब वह बैठता, तो लगता जैसे वह कुर्सी पर नहीं, बल्कि अपनी ही थकान के ढेर पर टिका है। उसकी आँखों में किसी विजेता की चमक नहीं थी, बल्कि एक ऐसे मुसाफिर की वीरानगी थी, जिसे मंज़िल मिल तो गई हो, पर सफ़र ने उसे भीतर से खाली कर दिया हो।

पहली मुलाक़ात में उसने अपना नाम कुछ और बताया था।

यह झूठ मुझे बहुत बाद में पता चला। लेकिन विडंबना देखिए, जब तक मुझे उसका असली नाम पता चला, तब तक वह झूठा नाम ही मेरे लिए उसका ‘सच’ बन चुका था। नाम महज एक शब्द था; उसका होना एक अहसास।

हमारी बातें सतही थीं—किताबों के पन्ने, कॉफी का स्वाद, शहर का बदलता मौसम। लेकिन इन साधारण शब्दों के नीचे एक गहरी नदी बह रही थी। वह अक्सर बात करते-करते रुक जाता। वाक्य अधर में लटक जाते।

मैं उसे देखती रहती। मैंने महसूस किया कि दुनिया में कुछ पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें ‘सुने जाने’ की नहीं, बस ‘ठहरने’ की जगह चाहिए होती है।

एक रोज़ मैंने पूछ ही लिया, “तुम अपनी बात पूरी क्यों नहीं करते? वाक्यों को अधूरा क्यों छोड़ देते हो?”

वह फीका-सा मुस्कुराया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर हाथ रख दिया गया हो।

“क्योंकि वाक्यों के पूरा होते ही वे एक ‘निर्णय’ बन जाते हैं,” उसने धीमे स्वर में कहा, “और अधूरेपन में… एक गुंजाइश बची रहती है। सच होने का डर लगता है मुझे।”

समय के साथ, वह मुझसे प्रेम की नहीं, अपनी अपूर्णता की बातें करने लगा। वह अपनी कमियों को मेरे सामने ऐसे रखता जैसे कोई पुजारी ईश्वर के सामने फूल चढ़ाता है—पूरी श्रद्धा और निसंकोच भाव से। वह कहता, “मुझे लगता है मैं काफी नहीं हूँ।” उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, बस एक स्वीकारोक्ति थी। मैंने उसे कभी झूठी तसल्ली नहीं दी। मैंने कभी नहीं कहा कि “सब ठीक हो जाएगा।” कुछ टूटी हुई चीज़ें जुड़ने के लिए नहीं, बस सहेज कर रखने के लिए होती हैं।

फिर एक दिन वह गायब हो गया। बिना किसी चेतावनी के। समय से पहले, निशानों के बिना।

उस रात मुझे क्रोध आया। उसके जाने पर नहीं, बल्कि अपनी समझ पर। मुझे गुस्सा इस बात का था कि मैं उसके इस पलायन को समझ रही थी। मैं जानती थी कि वह मुझसे नहीं, खुद से भाग रहा है।

दो दिन बाद वह लौटा। आँखों के नीचे रातें जमा थीं। चेहरा उतरा हुआ।

उसने कोई बहाना नहीं बनाया। बस इतना कहा, “मैं कहीं और खुद को उलझा बैठा था। वहाँ से बाहर निकलने का रास्ता… सिर्फ तुम्हारे पास आने वाली सड़क थी।”

मैंने कोई सवाल नहीं किया।कुछ जवाब इतने नग्न होते हैं कि उन्हें कपड़ों की तरह शब्दों से ढकना ज़रूरी नहीं होता।

कभी-कभी किसी को माफ़ कर देना, उसे समझने से ज़्यादा आसान होता है।

हम घंटों साथ बैठते। मेज़ पर रखी कॉफ़ी ठंडी होकर काली पड़ जाती, मोबाइल स्क्रीन औंधे मुँह लेटे रहते। हमारे बीच की दूरी बमुश्किल एक हाथ की होती, लेकिन उस दूरी में एक पूरा ब्रह्मांड था। यह वो दूरी थी जो ‘संभावना’ से भरी थी।

वासना तब पैदा नहीं होती  जब हाथ छूते हैं; वह तब जन्म लेती है जब दोनों जानते हैं कि चाहें तो छू सकते हैं—और फिर भी नहीं छूते ,वह उस बारीक क्षण में जन्म लेती है जब दोनों जानते हैं कि वे सरहद पार कर सकते हैं, मगर फिर भी संयम चुनते हैं।

एक शाम वह मेरे बेहद करीब था। इतना करीब कि उसकी साँसें मेरी त्वचा पर किसी गुप्त संदेश की तरह लिखी जा रही थीं। मेरी कलाई उसकी जाँघ के पास थी, बिना छुए भी मैं उसकी देह की आँच महसूस कर सकती थी।

तभी उसका फोन बजा। उसने नहीं उठाया। स्क्रीन पर किसी स्त्री का नाम चमक रहा था।

उस पल मेरे भीतर ईर्ष्या की आंधी नहीं उठी। बल्कि एक अजीब-सी, ठंडी राहत मिली।

राहत इस बात की कि अब वह मेरी कल्पना का कोई देवता नहीं रहा। वह एक साधारण, दोषपूर्ण मनुष्य था। अब यह कहानी ‘आदर्श प्रेम’ की नहीं, बल्कि ‘मानवीय उलझनों’ की थी।

मैं जानती थी कि अगर मैंने पूछा, तो वह सच बोल देगा। और वह सच या तो मुझे तोड़ देगा या उसे। इसलिए मैंने अपनी जिज्ञासा की बलि दे दी। मैंने कुछ नहीं पूछा।

उस चुप्पी में मैंने महसूस किया कि कांप मेरा शरीर नहीं रहा था, कांप उसका आत्मसम्मान रहा था।

मुझे पता था कि वह मुझे उस तरह नहीं चाहता, जिस तरह उपन्यासों में चाहा जाता है। वह मेरे पास अपनी जटिलताओं से थककर आता था, एक कोरे कागज़ की तलाश में। और मैं? मैं उसे चाहती थी, लेकिन उस चाह में जकड़ने की हवस नहीं थी। यह चाहत उसे ‘पा लेने’ की नहीं, उसे ‘मुक्त कर देने’ की थी।

रात गहरी हो गई थी। हम उस कगार पर थे जहाँ एक स्पर्श सब कुछ बदल सकता था।

मैंने अपना हाथ उठाया। उसकी ओर बढ़ी। लेकिन उसे छुआ नहीं। मेरी हथेली उसके माथे से इंच भर दूर हवा में रुक गई। मैंने उसे स्पर्श नहीं दिया, बस स्पर्श की ‘ऊष्मा’ दी।

वह सिहर उठा। उसने आँखें मूंद लीं, जैसे किसी गहरे पानी में उतर रहा हो।

उसने फुसफुसाते हुए कहा, “अगर तुम मुझे छू लेतीं… तो मुझे तुमसे झूठ बोलना पड़ता। यह दूरी ही मुझे सच बोलने की ताकत दे रही है।”

मैं समझ गई।

यह रात मिलन की नहीं थी। यह रात अपने-अपने सच को ओढ़कर सोने की थी।

अगली सुबह, जब वह जाने लगा, तो उसकी चाल में एक हल्कापन था। न कोई अपराधबोध, न कोई वादा। उसने कहा कि वह अब खुद से उतनी नफरत नहीं करता। उस एक वाक्य में प्रेम की सबसे पवित्र परिभाषा छिपी थी—

प्रेम वह नहीं जो आपको पूर्ण बना दे, प्रेम वह है जो आपको अपने अपूर्ण रूप के साथ जीना सिखा दे।

जाते-जाते उसने पहली बार अपना असली नाम बताया। मैंने उसे याद रखने की ज़हमत नहीं उठाई। क्योंकि कुछ लोग अपने नाम से नहीं, अपने द्वारा छोड़े गए सन्नाटे से पहचाने जाते हैं।

आज भी, जब कोई मेरे सामने बैठता है, अपनी उलझने सुनाता है, तो मैं बस सुनती हूँ। मैं कोई सलाह नहीं देती, न ही ठीक करने की कोशिश करती हूँ। मैं अब जान गई हूँ कि प्रेम किसी खाली बर्तन को भरने का नाम नहीं है।

प्रेम तो वह रौशनी है जो आपको अपनी ही दरारों को देखने और उन्हें स्वीकार करने का साहस देती है।

मैं उन्हीं दरारों के बीच खड़ी हूँ। अधूरी, मगर पहले से कहीं ज़्यादा पूरी। स्पर्श से परे, मगर सबसे ज़्यादा ज़िंदा।

इस पूरी कहानी का ऑडियो  नीचे है – सुनिये और कमेंट कीजिये

 

 

 

 

 

2 thoughts on “दरारों में ठहरी स्त्री”

  1. प्रेम स्पर्श नहीं, अनुभूतियों की आस्था है । एक कहानी जो वासना के ज्वार या कि; आकर्षण एवं अधिकार के आवेग से परे जीना सिखाती है । मानवीय संबंधों एवं संप्रेषण की सुंदर, सार्थक एवं शाश्वत आश्वस्ति। बधाई सरजी।

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