← सभी रचनाएँ

दोष स्क्रीन का नहीं

यूट्यूब गलत नहीं है। सोशल मीडिया भी अपने आप में दोषी नहीं है।माध्यम हमारे सामने संभावनाएं रखता है।अंततः यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उसी स्क्रीन से मनोरंजन लेकर उठते हैं या कोई विचार लेकर।क्योंकि सोए हुए मन के सामने दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी भी खुली हो, तो वह केवल रोशनी देखेगा। जागा हुआ मन उसी स्क्रीन में एक पाठशाला खोज लेगा।

जिस उपकरण को हमने मनोरंजन के लिए बनाया था, वही धीरे-धीरे हमारा शिक्षक, पुस्तकालय, समाचार कक्ष, सभागार और कभी-कभी हमारा विचारक भी बन गया है। लेकिन इसी स्क्रीन पर एक और दुनिया भी रहती है। वह दुनिया जो हमें कुछ समझने नहीं देती, केवल अगली चीज देखने के लिए उकसाती है। यहीं से असली प्रश्न पैदा होता है।

इसलिए लड़ाई सामग्री की नहीं, ध्यान की है।  सोशल मिडिया हमारे समय का नया दुर्लभ संसाधन है । हमारे पूर्वजों के सामने समस्या सूचना की कमी थी। हमारे सामने समस्या सूचना की अधिकता है। यह अंतर बहुत बड़ा है। जब जानकारी कम होती है, तो उसे खोजने का प्रयास करना पड़ता है। जब जानकारी अनंत हो जाती है, तो उसे अस्वीकार करने की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है।

शायद दोष स्क्रीन का नहीं है। ज्ञान अब दरवाजे पर दस्तक  देता है । एक समय ज्ञान दुर्लभ था। किताब चाहिए तो पुस्तकालय जाना पड़ता था। किसी विशेषज्ञ को सुनना हो तो उसके शहर तक पहुँचना पड़ता था। किसी विषय की जानकारी चाहिए तो किसी जानकार व्यक्ति की तलाश करनी पड़ती थी। आज स्थिति उलट गई है। ज्ञान हमें खोजता हुआ आता है।

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *