

कल्पना कीजिए कि कोई 22 साल का युवा है। उसे कोडिंग आती है, वह आर्टिफिशियल-इंटेलीज़ेंस समझता है, इंस्टाग्राम पर रील्स बनाता है, व्हाट्सएप पर बात करता है और उसके फोन में दुनिया की लगभग हर जानकारी मौजूद है। वह अंग्रेजी समझता है, पर ‘हिंग्लिश’ बोलता है और उसकी बातचीत में LOL, BTW, vibe, literally, bro और यार एक ही वाक्य में सहजता से आ सकते हैं।
अब उससे यह कहना कि “तुम्हें हिंदी बचानी चाहिए” शायद उसे प्रभावित न करे। लेकिन अगर उससे कहा जाए- “तुम्हें हिंदी पर कमांड हासिल करनी चाहिए, क्योंकि इससे तुम दूसरे लोगों के दिमाग और दिल तक कहीं ज्यादा ताकत से पहुँच सकते हो”, तो बात शायद बदल जाए।
राष्ट्रीय हिंदी दिवस को इसी कोण से देखने की जरूरत है। हिंदी का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं है कि ज़ेन-ज़ी कितनी शुद्ध हिंदी बोलता है। बल्कि असली सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी हिंदी को अपनी क्रियेटिविटी, इंफ्ल्युएंस, करियर और रिलेशनशिप की ताकत में बदल सकती है?
अंग्रेजी से लड़ने की जरूरत नहीं , सबसे पहले तो हमें एक भ्रम दूर कर देना चाहिए कि हिंदी चुनने का अर्थ अंग्रेजी को छोड़ना नहीं है। आज के युवा के लिए अंग्रेजी जानना उतना ही उपयोगी है जितना कोडिंग, एआई, डेटा या डिजिटल संचार को समझना। दुनिया से संवाद के लिए अंग्रेजी की अपनी जगह है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब अंग्रेजी ज्ञान की भाषा से आगे बढ़कर व्यक्तित्व की एकमात्र भाषा बनने लगती है।
आपको अंग्रेजी में बहुत कुछ पता हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि आप अंग्रेजी में अपने अनुभव की सबसे महीन परतों को व्यक्त कर पाएं। इसलिए प्रश्न “हिंदी या अंग्रेजी?” का नहीं है। प्रश्न है- क्या आपके पास भाषा का इतना नियंत्रण है कि आप अपने विचार को उसकी सबसे प्रभावशाली शक्ल दे सकें? यहीं हिंदी Gen Z के लिए एक असाधारण शक्ति बन सकती है। हिंग्लिश समस्या नहीं, लेकिन कमांड जरूरी है
आज की युवा भाषा को देखकर अक्सर शिकायत होती है—“बच्चों को हिंदी आती ही नहीं।” यह पूरी तरह सही नहीं है।
सोशल मीडिया पर हिंदी-अंग्रेजी कोड-मिक्सिंग यानी हिंग्लिश का इस्तेमाल एक स्थापित भाषिक व्यवहार बन चुका है। शोध बताते हैं कि भारतीय युवा डिजिटल संवाद में भाषा बदलते रहते हैं- कभी हिंदी, कभी अंग्रेजी, कभी क्षेत्रीय भाषा, साथ में इमोजी, लिप्यंतरण और इंटरनेट-स्लैंग। यह केवल भाषा की कमजोरी नहीं, बल्कि नई डिजिटल पहचान का हिस्सा भी है।
2024 के एक बड़े अध्ययन ने भी पाया कि भारतीय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में हिंग्लिश का इस्तेमाल लगातार बढ़ा और हिंदी भाषी उपयोगकर्ताओं के बीच यह एकभाषी हिंदी या अंग्रेज़ी की तुलना में अधिक पसंद किया गया।
इसलिए “भाषा शुद्ध रखो” कहना शायद गलत लड़ाई है। सही बात यह है- बेशक हिंग्लिश बोलिए, स्लैंग बोलिए, मीम-भाषायें बोलिए; लेकिन जब जरूरत हो तो उसी विचार को प्रभावशाली, सटीक और सुंदर हिंदी में कह सकने की क्षमता भी रखिए।
क्योंकि भाषा की असली ताकत यह नहीं कि आप कितने कठिन शब्द जानते हैं। असली ताकत है -आप कितनी गहरी बात कितनी सरलता से कह सकते हैं।
जिस भाषा में अटेंशन मिलता है, वही नई अर्थव्यवस्था की भाषा है आज भाषा केवल साहित्य का विषय नहीं है। वह डिजिटल अर्थव्यवस्था का कच्चा माल बन चुकी है।
भारत में 2024 में लगभग 870 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता ने भारतीय भाषाएँ में इंटरनेट सामग्री का इस्तेमाल किया, और शहरी भारत में 57 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता ने भारतीय भाषा की सामग्री को प्राथमिकता बताई। वीडियो देखने, सामाजिक नेटवर्किंग और ऑनलाइन खोज जैसे कामों में भारतीय भाषाओं का उपयोग बहुत बड़ा है।
यानी हिंदी केवल कविता और कहानी की भाषा नहीं रह गई।वह कंटेंट इकॉनोमी की भाषा है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
9425611243
