

जन्माष्टमी के उत्सव के समांतर, अगर हम कृष्ण को देवता के खोल से बाहर निकालकर सिर्फ एक किरदार की तरह देखें, तो सामने एक ऐसा युवा खड़ा मिलता है जिसे आज की पीढ़ी शायद अपना ही कोई सहपाठी मान बैठे। वह युवा जो किसी एक पद, एक शहर, एक पहचान में बंधने से इनकार करता रहा . कभी गोकुल का ग्वाला, कभी मथुरा का राजनेता, कभी कुरुक्षेत्र का सारथी, कभी द्वारका का कूटनीतिज्ञ। एक ऐसा करियर-ग्राफ, जिसे आज की भाषा में “पोर्टफोलियो करियर” कहा जाता – जहां पद की ऊंचाई नहीं, हुनर की चौड़ाई मायने रखती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है कि भारत का जेन-ज़ी अपनी तरक्की को प्रमोशन से नहीं, नए कौशल सीखने से नापता है, और तनख्वाह से ज़्यादा जीवन के संतुलन को तरजीह देता है। कृष्ण का जीवन देखें तो वे कभी किसी एक सिंहासन के लिए नहीं लड़े – न मथुरा की गद्दी उन्होंने खुद संभाली, न हस्तिनापुर की। उन्होंने वह किया जो उन्हें सही लगा, और बाकी सत्ता दूसरों को सौंप दी। यह त्याग नहीं, एक स्पष्ट प्राथमिकता थी – ठीक वैसी ही, जैसी आज का युवा ‘कॉर्नर ऑफिस’ से ज़्यादा अपने समय और अर्थ को चुनता है।
कुरुक्षेत्र के मैदान में एक और बात ध्यान खींचती है। कृष्ण ने खुद हथियार न उठाने की शर्त रखी थी – वे सारथी बने, नेतृत्व अर्जुन के हाथ में रहा। यह किसी भी आधुनिक मैनेजमेंट कक्षा में पढ़ाई जाने वाली सबसे बड़ी सीख है: करने वाला हाथ कोई और हो, दिशा देने वाली नज़र आपकी हो। आज सड़कों पर उतरे युवा आंदोलनों में भी यही ढांचा दिखता है। नेपाल में पिछले बरस जब हज़ारों युवा उतरे, तो किसी एक चेहरे ने कमान नहीं संभाली , फैसला सामूहिक विवेक करता रहा, हर हाथ में पकड़ा हुआ मोबाइल-कैमरा एक हथियार बना, हर मीम एक नारा। भारत में भी जब एक टिप्पणी ने युवाओं को “तिलचट्टा” कह डाला, तो जवाब तलवार से नहीं, ठहाके से आया- “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे मज़ाक ने बड़े-बड़े सत्ता-प्रतिष्ठानों के सोशल मीडिया खाते हिला दिए। यह वही कला है जो कृष्ण ने युद्ध से पहले दिखाई थी जैसे हस्तिनापुर की सभा में शांतिदूत बनकर जाना, बातचीत की मेज़ को आखिरी विकल्प तक बचाए रखना और जब बात न बने तभी टकराव को अनिवार्य मानना। आज के जेन-ज़ी की भाषा में इसे “डायलॉग फर्स्ट, कॉन्फ्रंटेशन लास्ट” कहा जा सकता है।
पर शायद कृष्ण की सबसे आधुनिक भूमिका गीता के उस पहले अध्याय में छिपी है, जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन जब हथियार डालकर बैठ जाता है, टूटा हुआ, उलझा हुआ, तो कृष्ण उसे तुरंत उपदेश नहीं देते बल्कि पहले उसकी उलझन को पूरा सुनते हैं। यह किसी थेरेपी सेशन से कम नहीं। आज जब कहा जाता है कि यह पीढ़ी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पहले से ज़्यादा मुखर है, क्योंकि दफ्तर में हावी होने वाला बॉस उसे उतना नहीं डराता जितना बिना दिशा और बिना ठहराव का काम डराता है, तो कृष्ण का वह धैर्य याद आता है – पहले सुनना, फिर राह दिखाना।
इन सबके बीच कृष्ण कभी गंभीरता के बोझ तले दबे नहीं दिखते। रास रचाते हैं, बांसुरी बजाते हैं, हंसी-ठिठोली करते हैं – मानो कह रहे हों कि ज़िम्मेदारी उठाने के लिए खुद को उदास करना ज़रूरी नहीं। यही वह सूत्र है जो आज के युवा को हसल-कल्चर की थकान से बचा सकता है – काम पूरे मन से हो, पर मुस्कान गिरवी न रखी जाए। अगर कृष्ण आज किसी दफ्तर की लिफ्ट में जेन-ज़ी से मिलते, तो शायद उपदेश न देते। बस इतना पूछते – तुम्हारा धर्म क्या है, वह ढूंढ लिया कि नहीं? बाकी सब बाद में संभल जाएगा, जैसे हमेशा संभला है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
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