माँ ने फोन पर पूछा, “तुम खाना खा लिए? मैंने कहा, “हाँ।” उन्होंने कहा, “अच्छा। सो जाओ फिर।” मैंने कहा, “हाँ।”
और यह बातचीत ख़त्म हो गई। जैसे हर बार होती है।
लेकिन जो बातें हमने नहीं कहीं, वे इतनी थीं कि अगर उन्हें लिख दिया जाए तो एक पूरी किताब बन जाए।
माँ ने यह नहीं कहा, “मुझे तुम्हारी याद आती है।”
मैंने भी यह नहीं कहा, “मुझे भी।”
माँ ने यह नहीं पूछा, “क्या तुम अकेला तो महसूस नहीं करते ?”
“हमेशा।”-मैंने कहना चाहता था पर नहीं कहा,
मेरे पास एक मुखौटा है जिसे मैं “अनुवाद का मुखौटा” कहता हूँ।
यह तब पहनता हूँ जब मुझे अपनी भाषा में बात करनी होती है, लेकिन अपने उन शब्दों में नहीं , जो मेरी असली भावना व्यक्त करते हों ।
जब मैं कह रहा होता हूं कि “मैं ठीक हूँ” , तब दरअसल मतलब होता है “मैं टूट रहा हूँ।”
जब मुझे “सब अच्छा है” कहना होता है, इसका मतलब होता है कि “कुछ भी अच्छा नहीं है।”
पिछले हफ्ते मैं एक पुस्तक की दुकान में था। एक किताब देखी — अनुवाद में खोया हुआ (Lost in Translation)।
लॉस्ट इन ट्रांसलेशन अमेरिकी लेखिका निकोल मोन्स द्वारा लिखित यह उपन्यास जो एक अमेरिकी महिला की कहानी है जो चीन में अनुवादक के रूप में रहकर अपने अतीत को भुलाने की कोशिश करती है। मैंने उसे उठाया। पहला पन्ना पलटा। वहाँ लिखा था:
“हर भाषा में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका सटीक अनुवाद नहीं हो सकता। वे अपनी मिट्टी में ही जीते हैं।”
मैंने सोचा — क्या रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं?
क्या माँ-बेटे के बीच का प्यार भी ऐसे ही किन्हीं “अनुवाद “में खो जाता है”?
मुझे याद आया — बचपन में माँ मुझसे हिंदी में बात करती थीं।
“बेटा, यह खा लो।”
“बेटा, यहाँ आ जाओ।”
“बेटा, सो जाओ।”
और मैं समझ जाता था। हर शब्द। हर स्वर। हर ख़ामोशी।
फिर मैं बड़ा हुआ। शहर चला गया। अंग्रेज़ी में बात करने लगा।
और धीरे-धीरे — बहुत धीरे-धीरे — हमारी बातचीत छोटी होती गई।
अब हम “हाँ” और “ठीक है” तक सिमट गए हैं।
पिछली बार जब मैं घर गया था, माँ ने मुझे देखा और मुस्कुराईं।
फिर उन्होंने पूछा, “चाय पिओगे?”
मैंने कहा, “हाँ।”
वे रसोई में चली गईं। मैं सोफे पर बैठा रहा।
और अचानक मुझे एहसास हुआ — “चाय पिओगे?” दरअसल एक सवाल नहीं था।
यह एक अनुवाद था।
असली वाक्य था — “मुझे तुम्हारे लिए कुछ करने दो। मुझे यह महसूस करने दो कि मैं अभी भी तुम्हारी माँ हूँ।”
लेकिन वह भाषा हम दोनों के बीच खो चुकी थी।
अब जब भी माँ फोन करती हैं, मैं अपना मुखौटा पहन लेता हूँ।
और हम अनुवाद में बात करते हैं।
“तुम ठीक हो?” → कहना तो चाहती होती है कि “मैं तुमसे प्यार करती हूँ।”
“हाँ माँ, मैं ठीक हूँ।” → मैं भी कहना चाहता होता हूं कि “मुझे भी तुमसे प्यार है, लेकिन मैं यह कह नहीं पाता।”
कभी-कभी रात को मैं सोचता हूँ —
अगर मैं अपनी असली भाषा बोल पाता, तो क्या कहता?
शायद कहता — “माँ, मैं अकेला हूँ।”
शायद कहता — “माँ, मुझे डर लगता है।”
शायद कहता — “माँ, मैं तुम्हारे बिना यहाँ खो गया हूँ।”
लेकिन वह भाषा अब मेरे पास नहीं है।
या शायद है, लेकिन उसे बोलने का तरीका मैं भूल गया हूँ।
आज फिर माँ का फोन आया।
“खाना खा लिए?”
“हाँ।”
“सो जाओ।”
“हाँ।”
लेकिन इस बार मैंने कुछ और जोड़ा — बहुत धीरे से, जैसे एक अनुवाद हो:
“माँ… मैं अगले महीने घर आऊंगा।”
थोड़ी देर ख़ामोशी रही।
फिर माँ बोलीं, “अच्छा। आ जाना।”
लेकिन उनकी आवाज़ में जो था — वह अनुवाद में नहीं आता। कुछ चीज़ें अनुवाद में खो जाती हैं।
लेकिन कुछ चीज़ें जैसे — माँ की आवाज़, घर की महक, एक अनकही माफ़ी — वे किसी भाषा में नहीं होतीं। वे बस… होती हैं।
कहानी सुनने के लिये –
