मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था।
और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे — हर बहस में, हर बैठक में, हर WhatsApp ग्रुप में।
उनका प्रिय वाक्य था — “मैंने तो पहले ही कह दिया था।”
मुझ जैसे कईयों के पास एक मुखौटा होता है, जिसे मैं “सर्वज्ञ का मुखौटा” कहता हूँ।
यह बहुत चमकदार मुखौटा है — सोने जैसा।
इस पर लिखा है — “मैं जानता हूँ।”
जब भी कोई इसे पहनता है, तो उसे लगता है कि वह हर सवाल का जवाब जानता है।
मेरे पास भी ऐसा ही एक मुखौटा है, जिसे पहनने के बाद मुझे लगता है कि मैं हर समस्या का हल जानता हूँ, हर रास्ते का अंत जानता हूँ।
लेकिन इस मुखौटे की एक खासियत है —
यह धीरे-धीरे आपके असली चेहरे से चिपक जाता है, और फिर उतरता नहीं।
आशुतोष को यह पता नहीं था।
लेकिन आज मुझे पता है।
क्योंकि मैं भी कभी उनकी तरह था।
दफ़्तर में लोग उनसे डरते थे — या यूँ कहें, चिढ़ते थे।
जब कोई कहता, “शायद ऐसा हो सकता है—”
आशुतोष तुरंत टोकते — “शायद? भाई साहब, या तो है या नहीं है। ‘शायद’ तो कोई जवाब नहीं होता।”
और फिर वे अपनी कुर्सी पर पीछे झुक जाते, मुस्कुराते हुए — जैसे उन्होंने अभी-अभी किसी को शतरंज में मात दे दी हो।
मुझे उनमें अपनी परछाई दिखती है —
वह परछाई जो मैं कभी था, जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से छोड़ा था।
एक दिन उनकी पत्नी ने कहा, “आपको पता है न, आशुतोष जी, कभी-कभी ग़लत होना भी ठीक है।”
आशुतोष ने अख़बार से आँखें उठाईं।
“ग़लत? मैं? मुझे तो याद नहीं आता कि आखिरी बार मैं कब ग़लत हुआ था।”
पत्नी ने कहा, “बस, यही तो दिक्कत है।”
लेकिन आशुतोष सुन नहीं रहे थे — वे फिर अख़बार में खो गए थे, अपनी रची सही वाली दुनिया में।
फिर एक रात कुछ अजीब हुआ।
आशुतोष सपना देख रहे थे।
सपने में वे एक बड़े हॉल में खड़े थे — सामने एक मेज़, और मेज़ के पीछे बैठे थे तीन लोग:
एक बूढ़ा आदमी, एक औरत, और एक बच्चा।
(मुझे भी एक बार ऐसा ही सपना आया था — बहुत साल पहले, जब मेरा मुखौटा इतना चिपक गया था कि मुझे साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी थी।)
बूढ़े ने कहा, “तो, रमेश बाबू। आप तो हमेशा सही रहे हैं?”
आशुतोष ने गर्व से सीना फुलाया — “जी हाँ। हमेशा।”
औरत ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलिए, एक टेस्ट करते हैं।”
सवाल #1
बूढ़े ने पूछा, “2+2 कितना होता है?”
आशुतोष हँसे — “यह भी कोई सवाल है? चार।”
“ग़लत।”
आशुतोष का मुँह खुला रह गया।
बूढ़े ने कहा, “यहाँ 2+2 = 5 होता है — क्योंकि यहाँ नियम हम बनाते हैं, तुम नहीं।”
सवाल #2
औरत ने पूछा, “आपकी पत्नी खुश है?”
आशुतोष ने कहा, “बिल्कुल। मैं तो उनका बहुत ख्याल रखता हूँ।”
“ग़लत।”
आशुतोष अब परेशान होने लगे।
औरत ने कहा, “वे पिछले दस सालों से दुखी हैं — लेकिन आपने कभी पूछा ही नहीं।”
सवाल #3
अब बच्चे ने पूछा, “आप कौन हैं?”
आशुतोष ने आत्मविश्वास से कहा, “मैं आशुतोष हूँ — सीनियर मैनेजर, IIT से पढ़ा हुआ, तीन अवार्ड विनर।”
“ग़लत।”
बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप बस एक आदमी हो जो डरा हुआ है — इतना डरा कि अगर ग़लत हो गया, तो लोग हँसेंगे।”
आशुतोष की आँखें खुल गईं।
पसीना आ रहा था। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
बगल में पत्नी सो रही थीं।
मुझे याद है जब मेरी भी आँखें खुली थीं उस रात।
मैंने तुरंत आईने की तरफ़ देखा था — और पहली बार मैंने अपना मुखौटा देखा था — वह सुनहरा, चमकदार, झूठा चेहरा।
और मुझे पता चल गया था —
यह मेरा चेहरा नहीं है, यह मेरा डर है।
आशुतोष उठे, रसोई में गए, पानी पिया।
फिर आईने में अपना चेहरा देखा —
और पहली बार उन्हें अपनी आँखों में कुछ दिखा — डर, बहुत गहरा डर।
अगली सुबह ऑफ़िस में बैठक थी।
एक जूनियर ने प्रेजेंटेशन दी — कुछ आंकड़े ग़लत थे।
आशुतोष उठने ही वाले थे कि —
उन्होंने रुक कर सोचा।
क्या यह इतना ज़रूरी है?
क्या इससे कुछ बदलेगा?
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बैठक ख़त्म हुई — लेकिन उनके अंदर कुछ बदल गया था।
(मैं जानता हूँ इस अहसास को — जब मुखौटा पहली बार ढीला पड़ता है, जब रोशनी की एक पतली-सी किरण अंदर आती है।)
उस रात आशुतोष घर पहुँचे।
पत्नी ने पूछा, “चाय?”
आशुतोष ने कहा, “हाँ। और… सुनो।”
पत्नी रुक गईं।
“मुझे लगता है… मैं ग़लत था — बहुत सारी चीज़ों में।”
पत्नी चुप रहीं, फिर धीरे से मुस्कुराईं —
“पता है आशुतोष जी, यह पहली बार है जब आप सही हैं।”
लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती।
अगली सुबह आशुतोष फिर से वही बन गए —
वही मुखौटा, वही आवाज़, वही अकड़।
क्योंकि पुरानी आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं।
और शायद — बस शायद — यही सबसे डरावनी बात है।
मैं यह कहानी इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ —
सर्वज्ञ का मुखौटा सबसे खतरनाक मुखौटा है।
यह आपको सुरक्षित महसूस कराता है, ताकतवर महसूस कराता है —
लेकिन असल में यह आपको अकेला बना देता है।
क्योंकि जो हमेशा सही होता है —
उसे किसी की ज़रूरत नहीं होती।
और जिसे किसी की ज़रूरत नहीं होती —
वह इंसान नहीं रहता, वह मशीन बन जाता है।
आजकल मैं यह मुखौटा अक्सर नहीं पहनता।
कभी-कभी पहनता हूँ — जब बहुत ज़रूरी हो।
लेकिन पहनने के बावजूद अब मुझे पता होता है कि यह मुखौटा है।
और मुखौटे उतारे जा सकते हैं — बस उतारने की हिम्मत चाहिए।
क्या आपके पास भी यह मुखौटा है?
क्या आप भी आशुतोष हैं?
अगर हाँ, तो याद रखिए —
हमेशा सही होना ही सही नहीं होता, ग़लत होना जानना भी ठीक है।
इस सबसे ऊपर — आपका इंसान होना ज़्यादा ज़रूरी है।
