मेरा शहर

यहाँ क्षितिज पर

धरती और आकाश की

दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं

यहाँ क्षितिज
बस एक ही साँस में फैला हुआ
विस्तार लगता है
हवा गुजरती है जब भी यहां से,
ये हरी हरी घास
उसकी भाषा बन जाती है,
और धरती
जैसे बिना शब्दों के
कुछ बहुत गहरा कह जाती है
सुबह की धूप
अटकती नहीं…यहां
कंगूरों पर…
वो उतरती है,
धीरे-धीरे
दीवारों से हो कर
कमरे के भीतर तक
यूं धूप तो
साधारण ही है यहां की,
पर वही…… मेरी रोज की
“गुरु” बन जाती है।
पेड़ खड़े हैं स्थिर यहां ,
पर समय के साथ चलते हुए
वे बताते हैं मुझे कि,
“धैर्य” …..तेज़ी से नहीं बढ़ता,
और गिरना भी
अंत नहीं होता,
क्योंकि
जो गिरता है
वही एक दिन मिट्टी बनकर
वापस जीवन को लौट आता है।
बारिश आती है
तो मेरा शहर
अपनी भाषा बदल लेता है।
छतें बोलने लगती हैं,
मिट्टी
किसी को याद करने लगती है,
और पानी
अपना रास्ता नहीं ,
अपना अर्थ….. खोजने निकल पड़ता है
और रही बात
मेरे शहर की ….रात की
तो —मैं कहुंगा
यहाँ की रातें …. शोर नहीं करती
वो भीतर ले जाती है,
हाथ पकड़ कर
भीड़ के बिना…. रास्तों के बिना,
पर  वहां अंदर जा कर भी
कोई इनसान अकेला नहीं होता—
बल्कि वहां वह …
अपने उन हिस्सों के साथ …होता है
जिन्हें दिन में ….वो सुनना भूल गया था
यहां की रात सिखाती है मुझे ,
कि चुप रहकर भी
खुद को ….कैसे सुना जाता है
ये शहर …..मुझे बदलता नहीं ,
बस रोज़ …….मुझे थोड़ा थोड़ा
वैसा बनाता जाता है
जैसा बनने की कोशिश…मैं
लम्बे वक़्त से कर रहा होता हूं

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top