एक समय था जब घर सिर्फ एक पता नहीं होता था। वह एक साँस होता था,साझा, उलझी हुई, एक,दूसरे में गुँथी हुई साँस। दादा की खाँसी, चूल्हे की धीमी आँच, बच्चों की वह हँसी जो आधी रात में भी किसी को नहीं डराती थी,ये सब मिलकर एक ऐसी भाषा बनाते थे जिसे कोई शब्दकोश नहीं समझा सकता। वह भाषा अब धीरे,धीरे खामोश हो रही है।
परिवार टूटते नहीं अचानक। जैसे किसी पुरानी इमारत की नींव में दरारें पड़ती हैं,पहले अदृश्य, फिर महीन,सी, फिर इतनी गहरी कि दीवारें खुद ही झुकने लगती हैं,वैसे ही रिश्ते भी टूटते हैं। एक दिन आप पाते हैं कि बेटा उसी शहर में है जहाँ आप हैं, पर महीनों से मिला नहीं। बेटी रोज़ “okay, fine, hm” टाइप करती है,और आप नहीं जानते कि उसकी आँखों के भीतर क्या हो रहा है।
हम इसे “व्यस्तता” कहते हैं। यह एक सुविधाजनक झूठ है।
असल बात यह है कि हमने परिवार को एक परियोजना में बदल दिया है। बच्चे “प्रोज़ेक्ट” हैं जिन्हें “लॉन्च” करना है। माँ,बाप “रिस्पॉन्सिबिलिटी” हैं जिन्हें “मेंनेज़” करना है। पति,पत्नी “पार्टनर्शिप” हैं जिसे “त्रैमासिकी,समीक्षा” की ज़रूरत है। भाव, जो कभी इस सारे ढाँचे की जड़ में थे, कहीं “स्प्रेडशीट” की किसी “सेल” में दर्ज हो गए हैं,और वह सेल अब “ब्लैंक” है।
समाजशास्त्री इसे “न्यूक्लियर,फैमिली का उदय” कहते हैं। जैसे यह कोई वैज्ञानिक उपलब्धि हो। पर न्यूक्लियर शब्द पर ध्यान दीजिए न्यूक्लियर का अर्थ केवल “केंद्रीय” नहीं होता, उसका अर्थ “विभाजित” भी होता है। परमाणु तब ऊर्जा छोड़ता है जब वह टूटता है। हमारे परिवार भी टूट रहे हैं ,और इस टूटन की ऊर्जा से हम इकोनॉमी चला रहे हैं, “जीडीपी” बढ़ा रहे हैं, “विकास” का जश्न मना रहे हैं।
पर इस जश्न में कोई पूछता नहीं कि उस बुज़ुर्ग का क्या हुआ जिसे “ओल्ड-एज़-होम”में छोड़ा गया, इस आश्वासन के साथ कि “हम हर रविवार आएँगे।” और वह रविवार अक्सर नहीं आता।
भारत में संयुक्त परिवार का विघटन कोई नई घटना नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही औद्योगीकरण ने गाँव से शहर की ओर पलायन शुरू किया था। पर तब भी एक धागा था,चिट्ठियाँ लिखी जाती थीं, गर्मियों में बच्चे गाँव भेजे जाते थे, शादी,ब्याह में पूरा खानदान इकट्ठा होता था। वह धागा अब “व्हाट्स-एप-ग्रुप”बन गया है,जहाँ कोई “हैप्पी-दिवाली” या “हैप्पी-मदर्स-डे” का मेसेज़ फॉर्वर्ड करता है और सोचता है कि रिश्ता निभ गया।
व्हाट्स-एप पर “❤️” भेजने से प्रेम नहीं होता। प्रेम तब होता है जब आप किसी बीमार माँ के सिरहाने रात भर बैठते हैं, जब आप किसी रोते बच्चे की पीठ थपथपाते हैं बिना यह सोचे कि कल सुबह ऑफ़िस में “प्र्ज़ेंटेशन” है। प्रेम समय माँगता है,और यही वह चीज़ है जो हम सबसे कंजूसी से देते हैं।
एक आँकड़ा है जो मुझे बार,बार चौंकाता है। भारत में अकेलेपन का संकट अब केवल पश्चिम की समस्या नहीं रहा। महानगरों में एकल परिवारों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। “अवसाद” की दर बढ़ रही है। “एंग्ज़ाइटी” अब मध्यवर्गीय शब्दकोश का हिस्सा बन गई है। बच्चे थेरेपी में जा रहे हैं,ऐसी बातें कहने के लिए जो कभी किसी चाचा, मामी, या दादी को बताई जाती थीं।
थेरेपिस्ट ने परिवार की जगह नहीं ली है। उसने सिर्फ वह जगह भरने की कोशिश की है जो हमने खाली कर दी।
यह प्रश्न पूछना ज़रूरी है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। “व्यक्तिगत-स्वतंत्रता” की जो आकांक्षा है, वह मनुष्य की सबसे गहरी इच्छाओं में से एक है,इसे नकारा नहीं जा सकता, नकारना चाहिए भी नहीं। पर क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हम सारे बंधन काट दें? बंधन और बेड़ियाँ एक नहीं होते। परिवार बंधन है,पर वह बेड़ी नहीं, वह जड़ है। जड़ काटकर पेड़ “आज़ाद” नहीं होता, वह बस उखड़ जाता है।
आज जब 15 मई को “अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस” मनाया जाता है, तो यह दिन एक उत्सव से ज़्यादा एक चेतावनी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि परिवार कोई पुरानी परंपरा नहीं है जिसे “मॉर्डेनाज़्ड” करना है,परिवार वह मिट्टी है जिसमें मनुष्य का व्यक्तित्व बनता है, टूटता है, फिर बनता है। उस मिट्टी को बचाना होगा।
न इसलिए कि संस्कृति खतरे में है। न इसलिए कि परंपरा टूट रही है।
बल्कि इसलिए कि अकेला मनुष्य बहुत थका हुआ होता है।
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