संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा

संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा

बसंती देवी के हाथों में अब वह ताकत नहीं रही जो कभी पांच किलो आटे को सानते वक्त दिखती थी। पर आज उन्होंने फिर भी चूल्हा जलाया। गैस वाला नहीं,लकड़ी वाला। आँगन के कोने में जो मिट्टी का चूल्हा था, जिसे बहुओं ने कई बार “गंदा और धुएँदार” कहा था, उसे उन्होंने गीली-मिट्टी से भीगे कपड़े से पोंछा, सूखी लकड़ियाँ जमाईं और दियासलाई की एक तीली से आग लगाई।
धुआँ उठा। आँखों में चुभा। उन्होंने पोंछा नहीं।
आज बड़का बेटा रमेश आने वाला था। नोएडा से। छोटका सुरेश भी,पुणे से। और मँझला दीपक… दीपक का पता नहीं। उसने कहा था “देखता हूँ।” पर “देखता हूँ” का मतलब बसंती देवी को अब पता था।
बहुएँ भी आतीं,रमेश की पत्नी स्नेहलता, जो हमेशा “ग़्लूटन-फ्री” खाती थी और गेहूँ के आटे को ऐसे देखती थी जैसे वह कोई शत्रु हो। सुरेश की पत्नी प्रीति, जो हर बात पर “एक्चुअली” से शुरुआत करती थी,”एक्चुअली माँजी, इस घर में प्रॉपर-वेंटिलेशन नहीं है।”
पर आज बसंती देवी को उनकी परवाह नहीं थी। आज वह वही बनाएँगी जो चालीस साल पहले बनाती थीं,जब इसी आँगन में सात बच्चे दौड़ते थे, जब जेठ,देवर के परिवार भी साथ रहते थे, जब एक वक्त के खाने के लिए दो बड़े पतीलों में दाल चढ़ती थी।
उन्होंने मेथी के पत्ते तोड़े,बगीचे के कोने में जो मेथी उगाई थी, वही। बेसन घोला। मिर्च कूटी,ओखली में, मिक्सर में नहीं। उनकी पड़ोसन ललिता ने एक बार कहा था, “दीदी, मिक्सर से जल्दी हो जाता है।” उन्होंने जवाब दिया था,                                    “जल्दी का खाना जल्दी खत्म हो जाता है।”
चूल्हे की आँच पर मेथी के पकौड़े तलने लगे। उनकी खुशबू,भुनी हुई मेथी और देसी घी की, जिसे बसंती देवी ने खुद बिलोया था,आँगन से निकलकर गली तक फैल गई।
रमेश दोपहर में आया। उसके साथ स्नेहलता थी और दो बच्चे,जो आते ही अपने-अपने “टैबलेट” में खो गए। रमेश ने माँ के पैर छुए, फिर फोन देखने लगा।
“ऑफिस का काम है,” उसने बताया, बिना पूछे।
शाम को सुरेश आया। प्रीति उसके साथ थी, जो “एक्चुअली” इस बार लेट नहीं आई, बल्कि “एक्चुअली ट्रेफ़िक बहुत था।”
दीपक नहीं आया।
रात के खाने पर सब बैठे। बसंती देवी ने वही परोसा जो बनाया था,मेथी के पकौड़े, सरसों का साग, मक्के की रोटी, देसी घी की कढ़ी। स्नेहलता ने धीरे से पूछा, “माँजी, कुछ “लाइट”, मेरा मतलब कुछ हल्का-फुल्का है?” प्रीति ने रोटी की जगह खिचड़ी माँगी।
रमेश खाते-खाते इ-मेल पढ़ रहा था। सुरेश किसी से कॉल पर था,बाहर निकल गया। बच्चे अपनी प्लेट्स लेकर अंदर कमरे में चले गए।
बसंती देवी अकेली बैठी रहीं।
उन्होंने एक पकौड़ा उठाया। धीरे से खाया। उसकी खुशबू अब वैसी नहीं लग रही थी जैसी चूल्हे पर तलते वक्त लग रही थी। या शायद लग रही थी, पर कोई उसे महसूस नहीं कर रहा था।
उनकी आँखें नम हुईं। उन्होंने पोंछ लिया। कोई नहीं देख रहा था।
बाद में, जब सब सो गए,रमेश और स्नेहलता बड़े कमरे में, सुरेश और प्रीति छोटे में, बच्चे बीच वाले में,बसंती देवी फिर आँगन में आईं। चूल्हा ठंडा हो गया था। राख बची थी। उन्होंने उस पर हाथ रखा। थोड़ी गर्मी अभी भी थी।
वह बहुत देर बैठी रहीं।
कल सुबह रमेश जल्दी निकलेगा,”मीटिंग” है। सुरेश दोपहर तक,”फ़्लाइट” है। प्रीति कुछ कहेगी जो “एक्चुअली” से शुरू होगा।
और चूल्हा फिर ठंडा रहेगा।
बसंती देवी ने राख में एक उँगली घुमाई। फिर आँगन की दीवार को देखा जहाँ बच्चों की लम्बाई के निशान थे,हर साल मार्क किए जाते थे, पेन्सिल से। रमेश के, सुरेश के, दीपक के। आखिरी निशान उस साल का था जब दीपक दिल्ली चला गया था। उसके बाद किसी ने मार्क नहीं किया।
वह दीवार अब भी वैसी ही थी।
बस निशान रुक गए थे।

— रविकांत राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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