
यह कथा हर उस लेखक, कलाकार, इंसान की है जो किसी दोस्त की सफलता पर ताली बजाते हुए भीतर से कुछ महसूस करता है जिसे वह नाम नहीं देना चाहता।
ईर्ष्या कभी चिल्लाती नहीं।
वह बस चुपचाप तुम्हारे पास बैठ जाती है — और तुम्हारी चाय पीने लगती है।
यह कथा हर उस लेखक, कलाकार और मनुष्य की है, जो किसी अपने की सफलता पर ताली तो बजाता है, लेकिन भीतर कहीं एक धीमी टीस भी महसूस करता है — ऐसी टीस, जिसे वह नाम नहीं देना चाहता।
मेरे मित्र रमेश के उपन्यास का विमोचन था।
मैं भी गया था।
हम दोनों एक ही मोहल्ले में पले थे।
एक ही मास्टर से हिंदी सीखी थी।
एक ही पुरानी किताबों की दुकान से प्रेमचंद की किताबें खरीदी थीं — दस रुपये में, रद्दी के भाव।
उन दिनों हम दोनों लिखते थे।
रात को, लालटेन के नीचे नहीं, ट्यूबलाइट की फीकी रोशनी में।
लेकिन उस रोशनी में भी एक ऐसा सुकून था, जिसे हम दोनों महसूस करते थे।
फिर रमेश का उपन्यास छप गया।
मैंने ताली बजाई — शायद सबसे ज़्यादा ज़ोर से।
घर लौटकर खाना खाया।
सोने की कोशिश की।
तकिया पलटा। फिर पलटा।
उठकर पानी पिया।
फिर लेट गया।
सुबह उठकर अपनी अधूरी कहानी खोली — वही, जो छह महीने से खुली थी, पर आगे नहीं बढ़ी थी।
मैंने एक वाक्य लिखा।
फिर काट दिया।
दूसरा लिखा।
उसे भी काट दिया।
तीसरी बार लिखा—
“वह आदमी सुबह उठा और उसने खिड़की से बाहर देखा।”
अचानक लगा, यह वाक्य रमेश के उपन्यास जैसा है।
हालाँकि उसके उपन्यास में ऐसा कोई वाक्य नहीं था।
मैंने लैपटॉप बंद कर दिया।
दो हफ़्ते बाद रमेश मिला।
चाय पर।
उसने मुस्कराकर कहा—
“यार, मैंने अगला उपन्यास शुरू कर दिया। पाँच हज़ार शब्द हो गए।”
मैंने कहा—
“वाह!”
उसने पूछा—
“तू भी लिख रहा है न?”
मैंने जवाब दिया—
“हाँ।”
यह झूठ नहीं था।
मैं लिख रहा था।
लेकिन जितना लिख रहा था, उससे ज़्यादा काट रहा था।
रमेश चला गया।
उसकी प्याली में आधी चाय बची रह गई।
मैं देर तक उसे देखता रहा।
उस रात मैंने सपना देखा —
मेरी कहानी एक पुराने ट्रंक में बंद है और उसकी चाबी रमेश के पास है।
हालाँकि रमेश को खुद यह पता नहीं।
एक महीने बाद एक पत्रिका में रमेश की कहानी छपी।
मैंने पढ़ी।
अच्छी थी।
लेकिन यह स्वीकार करने के लिए मुझे उसे तीन बार पढ़ना पड़ा।
पहली बार पढ़ा — तो सिर्फ़ गलतियाँ ढूँढता रहा।
दूसरी बार पढ़ा — गलतियाँ कम मिलीं।
तीसरी बार पढ़ा — कहानी सचमुच अच्छी लगी।
और तीसरी बार के बाद भीतर एक अजीब-सी थकान उतर आई।
जैसे किसी ने चुपचाप भीतर से कुछ खींच लिया हो।
उस शाम मैंने माँ को फ़ोन किया।
उसने पूछा—
“कैसा है?”
मैंने कहा—
“ठीक हूँ।”
उसने पूछा—
“लिख रहा है न?”
मैं कुछ क्षण चुप रहा।
फिर धीरे से कहा—
“हाँ, माँ।”
वह भी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
“रमेश का उपन्यास देखा। अच्छा है। तू भी लिख। तू उससे कम नहीं है।”
उसका यह वाक्य प्यार से कहा गया था,
लेकिन उसने मेरे भीतर कुछ ऐसा छू दिया, जिसे मैं महीनों से छिपाए बैठा था।
मुझे लगा —
माँ को भी पता है।
मुझे भी पता है।
और जो बातें कही नहीं जातीं, वे अक्सर सबसे ज़्यादा गूँजती हैं।
उस रात मैंने फिर लैपटॉप खोला।
स्क्रीन पर वही वाक्य चमक रहा था—
“वह आदमी सुबह उठा और उसने खिड़की से बाहर देखा।”
इस बार मैंने उसे नहीं काटा।
उसके नीचे लिखा—
“बाहर रमेश का घर था। उसमें रोशनी थी।”
फिर कुछ देर रुका।
फिर लिखा—
“उसने सोचा — यह रोशनी मेरे लिए भी है… अगर मैं चलूँ तो।”
मुझे नहीं पता यह कहानी कब पूरी होगी।
लेकिन उस रात, छह महीनों में पहली बार, मैं लगातार तीन बजे तक लिखता रहा।
रमेश के घर की रोशनी खिड़की में जलती रही।
और एक रोशनी मेरे भीतर भी।
ईर्ष्या मनुष्य को जलाती है।
लेकिन कभी-कभी वही जलन, भीतर एक नया चराग़ भी जला देती है।
शायद मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ।
बस इस रोशनी तक पहुँचने के लिए मुझे थोड़ा लंबा अँधेरा पार करना पड़ा।
— रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
