उस शाम मैं एक शादी में था।
भारतीय शादियाँ अजीब जगह होती हैं।
यहाँ संगीत भी होता है,मिठाइयाँ भी,और साथ-साथ अदृश्य मंच भी—जहाँ हर कोई अपनी भूमिका निभा रहा होता है।
लॉन में रोशनी की लड़ियाँ लटक रही थीं।
प्लास्टिक की कुर्सियाँ कतार में रखी थीं।
दूर से ढोल की आवाज़ आ रही थी।
मैं एक कोने में खड़ा सब देख रहा था।
तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला।
सम्मान बाहर आया।
उसने बहुत साफ़ कपड़े पहने हुए थे।
चेहरे पर एक स्थिर मुस्कान।
वह बोला,
“ध्यान से देखो।”
मैंने पूछा,
“क्या?”
वह बोला,
“नाटक।”
मैंने इधर-उधर देखा।
एक चाचा दूसरे चाचा से हाथ जोड़कर कह रहे थे—
“अरे नहीं-नहीं,आप बड़े हैं,पहले आप बैठिए।”
दूसरे चाचा उसी विनम्रता से कह रहे थे—
“नहीं-नहीं,आप मेहमान हैं।”
दोनों मुस्कुरा रहे थे।
कोई भी बैठ नहीं रहा था।
सम्मान ने धीरे से कहा,
“देखा?
यह सम्मान नहीं है।
यह अभिनय है।”
थोड़ी दूर पर दो लोग गले मिल रहे थे।
“अरे भाई!कितने दिनों बाद मिल रहे हैं!”
उनकी आवाज़ में गर्मजोशी थी।
लेकिन जैसे ही वे अलग हुए,दोनों ने मोबाइल निकाल लिया।
सम्मान हँसा।
“मनुष्य भी एक अजीब कलाकार है।
वह भावनाओं का अभिनय इतने अभ्यास से करता है कि कभी-कभी खुद भी भूल जाता है कि असली भावना क्या थी।”
मैंने पूछा,
“तो क्या यह सब झूठ है?”
सम्मान ने सिर हिलाया।
“नहीं।
यह झूठ नहीं है।
यह व्यवस्था है।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
वह समझाने लगा।
“समाज ऐसे ही चलता है।
अगर हर व्यक्ति अपनी हर सच्ची भावना बोल दे—
तो बहुत कम रिश्ते बचेंगे।”
मैं चुप रहा।
तभी एक रिश्तेदार मेरे पास आया।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“अरे!आप आ गए!
आपके बिना तो शादी अधूरी थी।”
मैं जानता था कि उसने मुझे पिछले पाँच सालों में शायद ही कभी याद किया होगा।
लेकिन मैंने भी मुस्कुराकर कहा—
“अरे,आपकी खुशी में तो आना ही था।”
और वह संतुष्ट होकर आगे बढ़ गया।
सम्मान ने मेरी तरफ देखा।
“देखा?
अब तुम भी मंच पर हो।”
मैंने पूछा,
“तो क्या हम सब अभिनेता हैं?”
वह बोला,
“काफी हद तक।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“समाज एक रंगमंच है।और सम्मान उसका सबसे लोकप्रिय पात्र।”
मैंने चारों ओर देखा।
हर जगह अभिनय चल रहा था।
कोई बड़े-बुजुर्गों के सामने झुककर बात कर रहा था।
कोई हँस रहा था।
कोई अपनी आवाज़ नरम कर रहा था।
कोई अपनी असहमति छुपा रहा था।
तभी मुझे एक और बात समझ आई।
सम्मान हमेशा सच्चाई का दुश्मन नहीं होता।
कभी-कभी वह शांति का रक्षक भी होता है।
अगर मनुष्य हर क्षण पूरी सच्चाई बोल दे—
तो दुनिया शायद थोड़ी अधिक ईमानदार होगी।
पर शायद थोड़ी ज़्यादा क्रूर भी।
मैंने सम्मान से पूछा,
“तो फिर तुम क्या हो—अभिनेता या रक्षक?”
वह मुस्कुराया।
“दोनों।”
ढोल की आवाज़ तेज़ हो गई।
बारात अंदर आ चुकी थी।
लोग नाच रहे थे।
बच्चे दौड़ रहे थे।
बड़े लोग गंभीर चेहरों से मुस्कुरा रहे थे।
सम्मान ने धीरे से कहा,
“तुम जानते हो सबसे दिलचस्प बात क्या है?”
मैंने पूछा,
“क्या?”
वह बोला—
“इनमें से ज्यादातर लोग अभिनय कर रहे हैं।
लेकिन अगर अभिनय अचानक बंद हो जाए…
तो सबको डर लगेगा।”
मैंने पूछा,
“क्यों?”
सम्मान ने जवाब दिया—
“क्योंकि तब पहली बार असली चेहरे दिखेंगे।”
रात थोड़ी और गहरी हो गई।
मैंने देखा—लोग अब भी मुस्कुरा रहे थे।
गले मिल रहे थे।
एक-दूसरे को आदर दे रहे थे।
और अचानक मुझे समझ आया—
कमरे में बहुत सारे चेहरे थे।
पर उनमें से ज़्यादातर…मुखौटे थे।
सम्मान धीरे-धीरे वापस अपने कमरे में चला गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
लेकिन जाते-जाते उसने एक बात कही—
“याद रखना…
हर अभिनय झूठ नहीं होता।
कभी-कभी वह बस
मनुष्य की कोशिश होती है
दूसरों के साथ शांति से रहने की।”
और मैं सोच रहा था—
शायद यही कारण है कि मनुष्य के पास इतने सारे मुखौटे हैं।
क्योंकि बिना उनके तो
समाज बहुत जल्दी टूट जाएगा।
——रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
