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बेटे का मुखौटा

माँ ने पूछा—“बेटा,सब ठीक है?”
मैंने कहा—“हाँ माँ।”
झूठ नहीं था।सच भी नहीं था।
बस वो मुखौटा था—जो हम माँ-बाप के लिए पहनते हैं।ताकि वे चिंता न करें।ताकि हम उन्हें कमज़ोर न दिखें।
यही सबसे भारी मुखौटा है।
क्योंकि इसे प्रेम से बनाते हैं।
और प्रेम से पहनते हैं।

रात के ग्यारह बज रहे थे।
माँ का call आया।
मैं उस वक्त छत पर बैठा था।अकेला।एक ऐसी थकान के साथ जिसे नाम देना मुश्किल था।वह थकान नहीं थी जो नींद से जाती है।वह कुछ और थी।
मैंने call उठाया।
“बेटा,खाना खाया?”
“हाँ माँ।”
झूठ था।पर उस वक्त यही सच लगा।
“नींद आ रही है?”
“हाँ माँ,बस काम था थोड़ा।”
एक और झूठ।पर माँ ने मान लिया।क्योंकि वह मानना चाहती थी।और मैं—मैं उन्हें मनाना चाहता था।
यही हमारा अनकहा समझौता था।

माँ ने पूछा,“सब ठीक है न?”
तीन शब्द।
और उन तीन शब्दों में इतना कुछ था—इतनी चिंता,इतना प्रेम,इतना डर—कि मेरा गला भर आया।
पर मैंने कहा—“हाँ माँ,बिल्कुल ठीक हूँ।”
क्यों?
क्योंकि मैं उनकी नींद नहीं छीनना चाहता था।
क्योंकि मैं उनकी आँखों में वह चिंता नहीं देखना चाहता था जो मेरे एक सच से आ जाती।
क्योंकि बेटा होना—कभी-कभी—सबसे मज़बूत दिखने का नाम है।
चाहे भीतर से टूट रहे हों।

Call खत्म हुई।
मैं फिर से अकेला था।छत पर।उसी थकान के साथ।
पर अब एक और बोझ था—
वह मुखौटा।
जो मैंने प्रेम से पहना था।
और जो अब उतर नहीं रहा था।

मैंने सोचा—
क्या माँ को पता है?
शायद हाँ।माएँ जानती हैं।पर वे भी एक मुखौटा पहनती हैं—“मुझे पता नहीं”वाला।ताकि हम बोल सकें।
हम दोनों—माँ और बेटा—एक-दूसरे को बचाने के लिए झूठ बोलते हैं।
और इसी झूठ में—सबसे सच्चा प्रेम छुपा होता है।

यही सबसे भारी मुखौटा है।
जो घृणा से नहीं—प्रेम से बनता है।

—रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश

 

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