
रात के दस बज रहे हैं। घर में सब कुछ सामान्य दिख रहा है। टीवी पर कोई कार्यक्रम चल रहा है। भीतर से संगीत आ रहा है। कोई बैठकर अपना दूरभाष देख रहा है। और आप… उसी घर में बैठे हैं।
उस व्यक्ति के सामने, जिसे कभी आपने अपना सबसे निकट का कहा था। लेकिन अब — पता नहीं क्यों — उसके पास बैठते ही आपके भीतर कुछ बंद होने लगता है। एक अजीब-सी घुटन। जैसे मन चुपके से वहाँ से निकल भागना चाहता हो।
वो कुछ पूछता है…आपके भीतर खीझ उठती है।
वो चुप रहता है…फिर भी भीतर एक शोर बना रहता है।
वह उपस्थिति जो भीतर को अशांत करती है
कुछ लोग कुछ करते भी नहीं — फिर भी उनका केवल होना आपके तंत्रिका तंत्र को हिला देता है। और इसकी सबसे पीड़ादायक बात यह है कि ये लोग कोई बाहरी नहीं होते।
— बहन- पति — पत्नी — माँ — पिता — भाई — बहन — या वह सहकर्मी, जिसके साथ रोज बैठना आपकी विवशता है।
— या वह सहकर्मी, जिसके साथ रोज बैठना आपकी विवशता है।
धीरे-धीरे एक विचित्र अवस्था बनती है। आप उनके साथ रहते भी हैं, किंतु भीतर से कहीं विलग होते चले जाते हैं। वे बोल रहे होते हैं — और आपका मन उनकी आवाज़ से बचने के लिए किसी और संसार में चला जाता है। आप अकारण उठकर जल पीने चले जाते हैं। खिड़की के बाहर देखने लगते हैं। जैसे भीतर कुछ लगातार पलायन करना चाहता हो।
“यह अचानक नहीं होता।
यह वर्षों में बनता है।
हर उस रात से, जब आप भीतर से टूटे थे — और चुप रहे।”
अवचेतन — जो सब कुछ अंकित करता है
आपका अवचेतन मन उस व्यक्ति के आसपास अब सहज नहीं रहता। और यह अचानक नहीं हुआ। यह हर छोटी असहमति से बना है। हर अनदेखे भाव से। हर उस क्षण से जब आपने कहा था — “चलो जाने दो।”
ऊपर से जीवन सामान्य चलता रहा। आप हँसते रहे, बात करते रहे, रिश्ता निभाते रहे। लेकिन भीतर — आपका अंतर्मन हर घटना को, हर चोट को, चुपचाप अंकित करता रहा। बिना किसी को बताए।
और फिर एक दिन ऐसा आया — जब आपके अवचेतन ने उस व्यक्ति की उपस्थिति को ही अस्वीकार करना शुरू कर दिया। चाहे वो कितना भी अच्छा व्यवहार करे — भीतर से आवाज़ आती है :
“नहीं… मैं इस पर विश्वास नहीं कर सकता।”
और यहीं — रिश्ते बाहर से नहीं, भीतर से टूटने लगते हैं।
ऊर्जा — जो शब्दों से पहले पहुँचती है
यहाँ एक और सत्य है। जब भी आप भीतरी अवरोध और क्रोध को लेकर किसी के पास बैठते हैं — तो सामने वाला चाहे समझे या न समझे, उसका अवचेतन उस अदृश्य तनाव को पकड़ लेता है।
▸ आप ऊपर से सहज व्यवहार कर रहे होते हैं — भीतर प्रतिरोध चल रहा होता है। सामने वाले का तंत्रिका तंत्र उसे महसूस कर लेता है।
▸ उसका व्यवहार भी बदलने लगता है। वह भी रक्षात्मक हो जाता है। वह भी अनजाने में प्रतिक्रिया करने लगता है।
▸ और दो लोग — जो कभी एक-दूसरे के लिए सुकून हुआ करते थे — धीरे-धीरे एक-दूसरे के लिए “ट्रिगर” का कारण बन जाते हैं।
यहीं से एक विषैला भावनात्मक चक्र आरंभ होता है। आप उसे देखकर तनावग्रस्त होते हैं। वह आपके तनाव को भाँपकर प्रतिक्रिया करता है। उसकी प्रतिक्रिया आपको और अशांत करती है। और आपका अवचेतन कहता है — “देखा? मैं सही था।” यह चक्र बार-बार दोहराता रहता है।
धीरे-धीरे — घर, घर नहीं लगता। रिश्ते, रिश्ते नहीं लगते — दायित्व लगने लगते हैं। और जीवन एक भावनात्मक कारागार जैसा अनुभव होने लगता है।
वर्तमान से विमुख होना
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जहाँ व्यक्ति आपको लगातार पीड़ा देता है — फिर भी आप उसे छोड़ नहीं पाते। क्योंकि कभी उसी व्यक्ति ने आपको इतना प्रेम दिया था, इतना ध्यान, इतनी भावनात्मक ऊँचाई — कि अब आपका अवचेतन उसकी पीड़ा को भी प्रेम समझने लगता है।
दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है — अतीत।
आप वर्तमान में नहीं जी रहे। आप उस व्यक्ति को नहीं देख रहे। आप उसके साथ जुड़े अपने संचित भावों को देख रहे हैं। और जब तक यह ढाँचा नहीं टूटता — जीवन ऐसे ही बीतता रहता है। ऊपर से सब सामान्य दिखता है। भीतर से मनुष्य धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है।
उपचार — एक छोटा, किंतु गहरा प्रयोग
सदा उपचार बातचीत से नहीं होता। कुछ उपचार — केवल उपस्थिति बदलने से होते हैं।
अगली बार जब आप उस व्यक्ति के साथ हों — जिसके प्रति भीतर कोई प्रतिरोध है — तो बीच-बीच में केवल बीस सेकेंड के लिए उनके चेहरे को ध्यान से देखें।
बस देखें। कोई आकलन नहीं। कोई विश्लेषण नहीं। कोई पुराना हिसाब नहीं। केवल उपस्थिति।
आरंभ में बहुत बेचैनी होगी। मन भागेगा। पुरानी बातें याद आएँगी। खीझ बढ़ेगी। लेकिन यदि आप निरंतर ऐसा करते रहे — तो धीरे-धीरे आपका अवचेतन उस व्यक्ति को ‘भय’ की तरह देखना बंद करेगा।
और फिर एक दिन अचानक — आप ध्यान देंगे कि उस व्यक्ति के पास बैठना अब उतना भारी नहीं लगता। भीतर की जकड़न धीरे-धीरे पिघलने लगी है। और शायद — बहुत समय बाद — आप पहली बार उस व्यक्ति को उसकी पुरानी भूलों से नहीं, उसकी मौजूदगी से महसूस करेंगे।
ध्यान रखें — आपके भाव बदलते ही सामने वाले का व्यवहार भी बदलने लगता है। यही वास्तविक उपचार है।
हर रिश्ता शब्दों से नहीं टूटता। कुछ रिश्ते — बार-बार महसूस किए गए भावों से टूटते हैं। और उन्हीं भावों को — धीरे-धीरे रूपांतरित करके — उन्हें फिर से जिया भी जा सकता है।
रविकांत राऊत
