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खुली नाराज़गी

वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे

जिनसे दिल में दर्द उठता है

गोता लगा निराशा के गहरे गर्त से

मैंने उबारा था उसे पर वो तो

‘अमी’ बन मंथन की बंट गयी देवताओं में

बुरा क्यों लगता है अगर

ज़ाहिर करता हूं मैं नाराज़गी खुल के

ज़हर पी के ख़ामखां

‘नीलकण्ठ’ यहां बनना किसे है

रविकांत राऊत
जबलपुर मध्य प्रदेश

 

 

रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

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