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सातवी मंज़िल की खिडकी


दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल पर एक कमरा था , कमरे के बाहर सफेद रंग के दरवाजे पर लिखा था- “पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी वार्ड” और उस कमरे में एक बाप था।

सुनील शर्मा। पचासवाँ साल भी पूरा नहीं हुआ था उम्र का अभी। लेकिन आँखें अस्सी साल की थीं, उनमें वह ख़ाली रोशनी थी जो आदमी को तब मिलती है जब वह बहुत ज़्यादा देख चुका होता है।

आठ महीने। इतना वक़्त उसने उस प्लास्टिक की कुर्सी पर गुजारा था , जो खिड़की के ठीक बगल में रखी थी, ठीक उस खिड़की के, जिसके नीचे दुनिया चलती रहती थी। दुनिया जिसे उसका बेटा सोमेश देखता था।

बिस्तर पर आठ साल का एक बच्चा था, घुँघराले बाल, कीमो के बाद झड़ गए थे। गाल , जो कभी पिचकारी चलाते वक़्त फूल जाते थे अब अंदर को धँसे हुए थे। हाथ , जो कभी सुनील के ऑफिस के काग़ज़ों पर रंग पोतते थे . अब नसों के जाल से ढके, पतले हो गए थे। लेकिन मुस्कान। वह नहीं गई। जैसे किसी ने उसे आत्मा से अमृत विचार-23.08.26- सातवीं मंजिल की खिड़कीजड़ दिया हो।

खिड़की के नीचे एक छोटा रेस्टोरेंट था। हर शाम वहाँ रोशनी जल उठती। कॉलेज के लड़के आते, बच्चे पिज़्ज़ा चुराते एक-दूसरे की प्लेट से, जोड़े सेल्फी लेते। भीड़ की खुशी सातवीं मंजिल तक एक धुंधली आवाज़ की तरह आती और सोमेश उसे सुनता।

पहले-पहल सुनिल को उन लोगों से चिढ़ होती थी। कैसे हँस सकते हैं लोग, जब उसके बच्चे की साँसें हर दिन थोड़ी और कम हो रही थीं? लेकिन धीरे-धीरे सुनील को समझ आया कि वे लोग निर्दयी नहीं थे। उन्हें पता ही नहीं था कि उनके सिर के ऊपर, सातवीं मंजिल की एक खिड़की के पीछे, एक छोटा-सा बच्चा धीरे-धीरे जीवन से विदा होने की तैयारी कर रहा है।

और सच कहूँ तो, सुनिल भी उन्हें इसलिए नहीं देखता था क्योंकि उसे उनमें कोई दिलचस्पी थी।वह उन्हें इसलिए देखता था क्योंकि सोमेश उन्हें देखता था और एक बाप दुनिया को अपने बेटे की आँखों से देखना चाहता था।

“पापा, देखो। वो आंटी बच्चे को आइसक्रीम दे रही हैं।”

“हाँ बेटा।”

“पापा, जब मैं ठीक हो जाऊँगा, तो हम नीचे जाएँगे। मैं बड़ा वाला पिज़्ज़ा खाऊँगा और आपको को भी खिलाऊँगा।”

सुनील के गले में कुछ अटका। वह खिड़की के बाहर देखने लगा ताकि सोमेश उसकी आँखें न देख सके।

“और मुझे?” पास से सुमन की आवाज़ आई।

“आपको तो, दो आइसक्रीम।”

वे तीनों हँसे। उस कमरे में, उन सफ़ेद दीवारों के बीच, वह हँसी किसी दवा से ज़्यादा असरदार थी और उतनी ही क्षणिक।

सुमन। जिस औरत ने कभी घर में चाय बनाते हुए गाने गुनगुनाए थे, वह अब मंदिर और अस्पताल के बीच बँटी हुई थी दोनों जगह हाथ जोड़े, दोनों जगह आँखें नम। वह सोमेश के कपड़े रोज़ बदलती, जैसे उसे तैयार करना हो कहीं जाने के लिए। उसके झड़े हुए बालों की जगह पर हाथ फेरती धीरे-धीरे, जैसे बाल अभी भी वहाँ हों। और सुनील भीतर-ही-भीतर भगवान से सौदेबाजी करता रहता।

“हे भगवान, मेरी उम्र ले लो… बस इसे बचा लो।” लेकिन भगवान शायद सौदे नहीं करते।

डॉक्टर ने एक शाम केबिन में बुलाया। उनके चेहरे पर वह दया थी जो शब्दों से पहले पहुँचती है।

“हमने पूरी कोशिश की है…” बाकी वाक्य सुनील के कानों तक पहुँचे ज़रूर, लेकिन उसे सुनाई नहीं दिये ।

वह सीढ़ियों में बैठा। रोया। इतना, कि आवाज़ बंद हो गई जैसे नदी इतनी भर जाए कि बहना भूल जाए। जब कमरे में लौटा, सोमेश जाग रहा था।

“पापा, आप रो रहे थे?”

“नहीं। आँख में कुछ चला गया था।”

सोमेश मुस्कुराया- “आप झूठ बोलते वक़्त अच्छे नहीं लगते।”

और फिर उसने अपनी पतली उँगलियों से सुनील के गाल पर बचे एक आँसू को पोंछ दिया। उस क्षण पिता कौन था, यह तय करना मुश्किल था।

मार्च की एक दोपहर। सुमन मंदिर गई थी। कमरे में सिर्फ वे दोनों थे। नीचे रेस्टोरेंट में किसी का जन्मदिन था गुब्बारे, तालियाँ, गाना।

सोमेश बहुत देर तक उन्हें देखता रहा। फिर उसने सुनील का हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं जैसे नवम्बर की कोई सुबह उन्हें छूकर वहीं रुक गई हो।

“पापा…”

“हाँ बेटा।”

“उन्हें मत बताना।”

“किसे?”

उसने खिड़की के बाहर इशारा किया।

“उन्हें… कि मैं जा रहा हूँ। उन्हें खुश रहने देना।”

सुनील को उस दिन पता चला , मृत्यु हमेशा दहाड़ती हुई नहीं आती। कभी-कभी वह एक आठ साल के बच्चे की धीमी आवाज़ में आती है, जिसके हाथ ठंडे हैं और जिसकी फ़िक्र दुनिया के लिए है, अपने लिए नहीं।

उस रात मशीन की आवाज़ एक सीधी रेखा में बदल गई। सुनील की दुनिया उसी क्षण रुकी। लेकिन नीचे , उसी वक़्त शायद , किसी बच्चे ने पिज़्ज़ा का पहला टुकड़ा उठाया होगा। किसी माँ ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा होगा। किसी प्रेमी ने तस्वीर खींची होगी।

और यह सब सोमेश के शब्दों में “ठीक” था।

चार साल गुज़र गए। घर पर सोमेश का कमरा वैसे ही है – साइकिल, किताबें, वो टूटा हुआ क्रिकेट का बल्ला जिसे वह ‘ठीक करवाएँगे’ कहता था। सुमन ने कुछ नहीं बदला। सुनील ने भी नहीं।

अब जब भी किसी रेस्टोरेंट के बाहर भीड़ दिखती है , हँसते चेहरे, बच्चे, रोशनी , सुनील रुकता है। उसे नाराज़गी नहीं होती। चिढ़ नहीं होती। बस एक पुरानी याद , जो घाव नहीं, परछाईं है। जो दर्द नहीं देती, साथ चलती है।

एक बाप अपने बच्चे को कभी नहीं खोता।

वह बस उसकी आँखें उधार ले लेता है और फिर , सारी उम्र , उन्हीं मासूम नज़रों से दुनिया देखता रहता है।

 

 

 

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