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चॉक की धूल में एक उम्र

बरसों पुरानी वह उंगलियां,
जो श्याम्पट्ट पर अ, आ लिखती थीं,
सफेद धूल में सनी होती थी
मास्टर जी की आवाज में
कोई मिठास नहीं होती थी दिखावे की.
न कोई डांट होती थी नफरत की,
बस एक जिद होती थी कि
यह बच्चा कुछ बन कर दिखाए
हमें बस याद है वह छड़ी
जो कभी लगी नहीं.
बस हवा में लहराई,
और हमें सीधा कर गई।
हमने उनकी थकान कभी नहीं गिनी,
न उनकी तनख्वाह पूछी,
न यह जाना कि शाम को घर जाकर
वे किस कुर्सी पर बैठते थे।
आज जब अपने बच्चों को
कोई सबक सिखाता हूं,
तो हाथ अपने आप
उसी अंदाज में उठ जाता है.
जैसे वह चॉक अब भी
मेरी उंगलियों में फंसी हो।
और जब कोई पूछता है मुझरो कि
गुरु किसे कहते हैं,
तो मैं किसी किताब का
पन्ना नहीं पलटता,
बस चॉक की उस धूल को
याद कर लेता हूं,
जो मेरी उंगलियों से कभी

मिटी ही नहीं।

Ravikant Raut

9425611243

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