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जब अमेरिका का सपना एक करोड़ का हो जाए

आज से ठीक एक साल पहले, 21 सितंबर 2025 को, अमेरिका ने एक ऐसा फैसला सुनाया था जिसकी गूंज बेंगलुरु के पीजी कमरों से लेकर हैदराबाद के कोचिंग सेंटरों तक सुनाई दी थी — हर नई H-1B वीज़ा याचिका पर एक लाख डॉलर, यानी करीब एक करोड़ रुपये का शुल्क। इस हफ्ते, ठीक उसी तारीख पर, वॉशिंगटन ने इस शुल्क को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। जो फैसला कभी एक अस्थायी झटके जैसा लग रहा था, वह अब एक स्थायी नीति की शक्ल लेता दिख रहा है। और इसके साथ ही भारत के सामने एक सवाल फिर खड़ा हो गया है, जिसका जवाब देश ने पिछले तीन दशकों में कभी ठीक से नहीं ढूंढा — हमारी सबसे होनहार पीढ़ी आखिर किसके लिए तैयार हो रही है, भारत के लिए या निर्यात के लिए?

आंकड़े इस सवाल को टालने नहीं देते। अमेरिका में हर साल जारी होने वाले H-1B वीज़ा में से लगभग 71 से 72 प्रतिशत भारतीयों के हिस्से आते हैं। वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत हुई करीब 4.06 लाख याचिकाओं में से 2.91 लाख केवल वीज़ा एक्सटेंशन से जुड़ी थीं, और इनमें से 2.26 लाख यानी करीब 78 प्रतिशत भारतीय नागरिकों की थीं। मतलब यह नीति किसी और देश से ज़्यादा भारत को चुभती है, बाकी सबको छूती हुई निकल जाती है। भारतीय आईटी कंपनियों ने इस बदलाव को भांपते हुए नए आवेदन लगभग रोक ही दिए हैं — रजिस्ट्रेशन में 38 से 92 प्रतिशत तक की गिरावट अलग-अलग रिपोर्टों में दर्ज हुई है। तीन लाख से ज़्यादा भारतीय छात्र अभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, ज़्यादातर विज्ञान और तकनीक की शाखाओं में, और उनमें से हर किसी के मन में अब यही सवाल कौंध रहा है कि डिग्री के बाद आगे क्या।

यह सिर्फ वीज़ा फीस की खबर नहीं है। यह भारत के मध्यवर्ग की सबसे पुरानी और सबसे भरोसेमंद कहानी पर लगी चोट है — कि मेहनत से पढ़ो, अच्छे अंक लाओ, इंजीनियरिंग करो, और एक दिन अमेरिका जाने का टिकट अपने आप कट जाएगा। तीन पीढ़ियों से यह कहानी भारतीय घरों की महत्वाकांक्षा को दिशा देती रही है। कोटा के हॉस्टलों में, दक्षिण भारत के इंजीनियरिंग कॉलेजों में, दिल्ली और पुणे के कोचिंग बाज़ारों में — यह सपना एक अर्थव्यवस्था बन चुका था। अब जब वह दरवाज़ा एक करोड़ रुपये की चौखट पर आकर अटक गया है, तो सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कितने लोग बाहर नहीं जा पाएंगे, बल्कि यह कि भारत उस ऊर्जा का क्या करेगा जो अब तक बाहर जाने की तैयारी में खर्च होती थी।

इतिहास में झांकें तो यह पहली बार नहीं है कि भारत की प्रतिभा-निर्यात नीति पर बाहर से चोट पड़ी हो। नब्बे के दशक के उदारीकरण के बाद से भारत ने जानबूझकर एक ऐसा मॉडल अपनाया जिसमें आईटी और इंजीनियरिंग स्नातकों की सबसे बड़ी खेप विदेश भेजी जाती रही, और बदले में आने वाला रेमिटेंस — करीब 125 अरब डॉलर सालाना, दुनिया में सबसे ज़्यादा — अर्थव्यवस्था की एक मज़बूत कड़ी बन गया। यह मॉडल काम भी किया, क्योंकि घर बैठे नौकरियां उतनी नहीं थीं जितनी हर साल कॉलेजों से निकलने वाली फौज को चाहिए थीं। लेकिन इसी मॉडल की एक कीमत भी रही — भारत ने अपने सबसे प्रतिभाशाली लोगों को ऐसी व्यवस्थाओं, शोध संस्थानों और कंपनियों के लिए तैयार किया जो यहां नहीं, कहीं और थीं। जब वह बाहरी दरवाज़ा अचानक तंग होता है, तो भीतर की कमी उघड़ आती है — क्या हमारे पास उतने अच्छे शोध संस्थान हैं, उतनी गहरी तकनीकी कंपनियां, उतने ऊंचे वेतन, जो इस प्रतिभा को यहीं रोक सकें?

कुछ आंकड़े उम्मीद जगाते हैं। लिंक्डइन के आंकड़ों के मुताबिक 2025 के आखिरी महीनों में अमेरिका से भारत लौटने वाले तकनीकी पेशेवरों की संख्या में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। गूगल, अमेज़न और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां बेंगलुरु में अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर तेज़ी से बढ़ा रही हैं, और अब यहां ऐसी भूमिकाएं भी आ रही हैं जो पहले सिर्फ सिलिकॉन वैली में मिलती थीं — एआई रिसर्च, डीप टेक, प्रोडक्ट लीडरशिप। कुछ अर्थशास्त्री इसे अब ‘ब्रेन ड्रेन’ नहीं बल्कि ‘ब्रेन सर्कुलेशन’ कहना पसंद करते हैं — यानी प्रतिभा का एकतरफा बहाव नहीं, बल्कि आना-जाना। यह नज़रिया लुभावना है, और पूरी तरह गलत भी नहीं।

लेकिन इसे बहुत जल्दी जीत मान लेना भी एक तरह की आत्मतुष्टि होगी। संसद में फरवरी 2026 में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि 2025 में ही करीब 3,800 भारतीय नागरिकों को अमेरिका से निर्वासित किया गया — यह कोई छोटी संख्या नहीं, यह उन हज़ारों परिवारों की कहानी है जिनके लिए यह सिर्फ करियर का मोड़ नहीं, बल्कि एक टूटा हुआ भरोसा है। नैसकॉम ने भी चेताया है कि यह नीति अचानक लागू होने से पूरी वैश्विक इनोवेशन व्यवस्था पर असर डाल सकती है, और भारत के लिए भी इसका मतलब सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि तात्कालिक झटका भी है — रेमिटेंस में कमी की आशंका, आईटी कंपनियों की अमेरिकी परियोजनाओं पर असर, और उन लाखों युवाओं की उलझन जिन्होंने वर्षों पहले अपने करियर की योजना इसी वीज़ा के भरोसे बनाई थी। ब्रेन सर्कुलेशन की कहानी बेंगलुरु के उन इंजीनियरों के लिए सच हो सकती है जिनके पास पहले से ही अमेरिकी अनुभव और अच्छा रिज़्यूमे है। लेकिन उस 22 साल के लड़के के लिए जो अभी-अभी कैंपस प्लेसमेंट से गुज़रा है और जिसके पास अमेरिका जाने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं था, यह कहानी उतनी आसान नहीं।

असली सवाल यही है — क्या भारत सिर्फ एक “बैकअप” बनकर रह जाएगा, जहां तभी रुका जाता है जब बाहर का रास्ता महंगा हो जाए? या यह वाकई वह मौका है जब देश अपनी नीतियों को इस तरह मोड़े कि प्रतिभा घर पर रुकना खुद चुने, मजबूरी में नहीं, संभावना देखकर? इसके लिए सिर्फ जीसीसी दफ्तर खोलना काफी नहीं है। इसके लिए ऐसी शोध संस्कृति चाहिए जहां एक होनहार वैज्ञानिक को विदेशी लैब जितनी आज़ादी और फंडिंग मिले, ऐसी स्टार्टअप व्यवस्था चाहिए जहां जोखिम लेना सज़ा नहीं समझा जाए, और ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जो सिर्फ परीक्षा पास कराने की फैक्ट्री न रहकर सोचने वाले दिमाग बनाए। अभी तक भारत ने इनमें से किसी दिशा में ठोस और निरंतर निवेश नहीं किया है — नीतिगत बयान बहुत मिलते हैं, बुनियादी ढांचा कम।

यह भी याद रखने लायक है कि अमेरिका का यह फैसला स्थायी सच नहीं है। नीतियां बदलती हैं, चुनाव बदलते हैं, आज का एक लाख डॉलर कल किसी और अंक में बदल सकता है। भारत की रणनीति इस एक फैसले पर टिकी होनी भी नहीं चाहिए। असली सवाल अमेरिका के दरवाज़े का नहीं है, भारत के अपने दरवाज़ों का है — क्या हम इतने आत्मविश्वासी बन पाएंगे कि अपनी प्रतिभा को यह कहने की ज़रूरत ही न पड़े कि “अभी अमेरिका महंगा हो गया है, इसलिए यहीं रुक जाओ”। जिस दिन भारत में रुकना मजबूरी नहीं, पहली पसंद बन जाएगा, उस दिन यह एक करोड़ रुपये का वीज़ा शुल्क सिर्फ एक ऐतिहासिक फुटनोट रह जाएगा। फिलहाल, वह दिन दूर दिखता है — और इस बीच लाखों युवा एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहां सपना वही है, पर रास्ता धुंधला हो चुका है।

रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

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