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नोटशीट

 

       

रजिस्टर संख्या 27/1984 को अलमारी के तीसरे खाने में रखा जाता था। यह बात दफ़्तर में किसी नियम-पुस्तिका में नहीं लिखी थी। फिर भी पिछले बयालीस सालों में किसी बाबू ने उसे कभी दूसरी जगह नहीं रखा। जैसे पुरानी फ़ाइलें अपनी जगह खुद चुन लेती हों, और बाद में आने वाले लोग केवल उस निर्णय का पालन करते रहें।

रजिस्टर की जिल्द कभी नीली रही होगी। अब उसका रंग वैसा था जैसा बरसों धूप खाने के बाद आसमान का कोई भूला हुआ टुकड़ा हो जाता है। किनारों का कपड़ा उधड़ चुका था। भीतर के पन्नों में सीलन उतर आई थी। जब उसे खोला जाता, तो काग़ज़ की गंध अकेली नहीं आती थी। उसके साथ धूल, पुराने गोंद, दीमकों की महीन मिट्टी, और उन उँगलियों की अदृश्य चिकनाहट भी बाहर निकलती थी जिन्होंने दशकों तक उस पर “देखा गया”, “आदेशित”, “नियमानुसार” लिखकर अपने दिन पूरे किए थे।

तहसील के पुराने बाबू कहा करते थे,  सरकारी काग़ज़ कभी पूरी तरह मुर्दा नहीं होते। हां, वे बोलते नहीं, केवल याद रखते हैं।

कोई इस बात पर हँस देता। कोई चुप रह जाता। देशमुख भी इस बात पर कभी हँसे थे। पर अब नहीं हँसते ।

आज बुधवार था। बरामदे की तीसरी सीढ़ी पर रद्दाबाई बैठी थीं। वह इसी सीढ़ी पर बैठती थी शायद इसलिये कि यहाँ दोपहर की धूप सबसे देर से पहुँचती थी या फिर इस लिये कि यहां से कमरे की उस आलमारी का वह ऊपरी हिस्सा दिखायी देता था जिसमें  रजिस्टर संख्या 27/1984  रखा जाता है । ठीक उसी वक़्त एक टिटहरी बरामदे की मुँडेर पर आ बैठी, दो-तीन बार तीखी आवाज़ में बोली, पंख फड़फड़ाए, फिर चुप हो गई। दफ़्तर में इसे कोई नोटिस नहीं करता था। शायद इसलिए कि यह हर बुधवार होता था।

पिछले अठारह सालों में तहसील की बहुत-सी चीज़ें बदल चुकी थीं। दीवारों का रंग दो बार बदला। खिड़कियों में लकड़ी की जगह एल्यूमिनियम आ गया। पुराने टाइपराइटरों की जगह कंप्यूटर रख दिए गए, जिन पर काम करने से ज़्यादा समय उन्हें चालू करने में लगता था। इस बीच पाँच तहसीलदार आए और चले गए। चपरासी बदलते रहे।

केवल एक चीज़ नहीं बदली, बुधवार को तीसरी सीढ़ी पर बैठी वह औरत। अब लोग उन्हें नाम से कम, दिन से ज़्यादा पहचानते थे। “अरे… बुधवार वाली बाई आ गई।”

पहले-पहल उस महिला को अपने लिये यह संबोधन सुनकर बुरा लगता था। फिर एक दिन उसने पाया कि उसे  अपने नाम से पुकारे जाने की इच्छा भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जिस इंसान  का नाम सरकारी काग़ज़ों से मिट जाए, उसके घरवालों का नाम भी देर-सबेर आवाज़ों से मिटने लगता है।

उसने अपनी गोद में रखी छोटी-सी कपड़े की थैली खोली। भीतर वही तह की हुई रसीद रखी थी। काग़ज़ इतना पतला हो चुका था कि उसे खोलते समय हमेशा डर लगता कि आज शायद यह दो टुकड़ों में बँट जाएगा।

उस पर लिखा था , खाता क्रमांक १४२। रकबा – २ एकड़ १४ गुंठे। स्वामी – शंकरराव पाटील।

शंकरराव की लिखावट उन्हें याद नहीं थी। उनकी हँसी याद थी। बारिश में बिना चप्पल खेत में उतरने की आदत याद थी। मरने से दो दिन पहले उन्होंने कहा था — “अगर कभी कोई काग़ज़ माँगें तो यह रसीद संभालकर रखना।” तब रद्दाबाई ने सोचा भी नहीं था कि इंसान  पहले मरेगा या उसका नाम।

पहली बारिश अभी पहुँची नहीं थी। लेकिन हवा बदल चुकी थी। दूर कहीं सूखी मिट्टी ने पानी की गंध पहचान ली थी और बिना भीगे ही महकने लगी थी। रद्दाबाई ने आँखें बंद कर लीं। एक पल के लिए उन्हें अपना खेत याद आया। खेत नहीं , खेत में लगी अरहर। अरहर नहीं , मेड़ों पर उग आई सफ़ेद घास। यादें अक्सर किसी एक कोने से शुरू होती है, वह पूरी चीज़ लेकर कभी नहीं आती।

उसी समय भीतर देशमुख साहब ने रजिस्टर 27/1984 खोला। फ़ाइल का पहला पन्ना साधारण था। दूसरा भी। तीसरे पन्ने पर आते ही उनकी उँगलियाँ अनायास रुक गईं। बीच में वही वाक्य था।

“आदेशित — उपरोक्त भूमि का हस्तांतरण नियमानुसार पूर्ण किया गया।”

उन्होंने उसे न जाने कितनी बार पहले भी पढ़ा था। आज पहली बार उन्हें लगा , यह वाक्य लिखा नहीं गया था। यह धीरे-धीरे जमा था। जैसे हर अधिकारी ने उसमें अपना थोड़ा-सा डर, थोड़ा-सा आलस्य और थोड़ा-सा विश्वास जोड़ दिया हो।

स्याही बयालीस साल पुरानी थी। उन्होंने अनायास उँगली उस पंक्ति पर रख दी। काग़ज़ ठंडा था। लेकिन ठंडक काग़ज़ में नहीं ठहरी। वह उनकी उँगली से होती हुई भीतर चली गई। देशमुख ने हाथ खींच लिया। कमरे में कोई नहीं था। फिर भी उन्हें एक अजीब-सा संकोच हुआ , मानो उन्होंने किसी सोए हुए इंसान  को बिना अनुमति छू लिया हो।

उन्होंने कुर्सी से टिककर आँखें मूँद लीं। उन्हें अचानक अपने प्रशिपल का पहला दिन याद आया। उनके गुरु, वृद्ध नायब तहसीलदार कुलकर्णी, एक फ़ाइल बंद करते हुए बोले थे -“देशमुख, सरकारी दफ़्तर में झूठ हमेशा झूठ की तरह नहीं लिखा जाता। कभी-कभी उसका सबसे शालीन नाम ‘नियमानुसार‘ होता है।”

तब पूरी मेज़ हँस पड़ी थी। देशमुख भी हँसे थे। पर कुलकर्णी नहीं हँसे थे।अब, इतने सालों बाद, उस वाक्य की हँसी कहीं सुनाई नहीं देती थी। केवल उसका अर्थ बचा था।

 

दोपहर की घंटी बजने में अभी कुछ देर थी। तहसील का दफ़्तर उस समय सबसे विचित्र दिखाई देता था। काम रुकता नहीं था, लेकिन चलता हुआ भी नहीं लगता था। कोई बाबू फ़ाइल के ऊपर झुका था, पर उसकी आँखें खिड़की से बाहर थीं। कोई सील-मुहर उठाकर देर तक हवा में रोके रहता, जैसे अगली चोट किसी काग़ज़ पर नहीं, उसके अपने ही दिल पर करनी हो।

देशमुख ने रजिस्टर बंद नहीं किया। उन्होंने उसे थोड़ा-सा अपनी ओर खींच लिया। बयालीस सालों के काग़ज़ों में एक बात उन्हें हमेशा चकित करती थी , सरकारी फ़ाइलों में किसी इंसान की पूरी ज़िंदगी नहीं मिलती । वहाँ उसका सिर्फ़ उतना ही हिस्सा दर्ज होता है जितना किसी आदेश के लिए आवश्यक हो।

शंकरराव पाटील, महज़ दो शब्द। रद्दाबाई, इस नाम का कहीं ज़िक्र नहीं ।

किसी नोटशीट में यह दर्ज नहीं था कि शंकरराव को बैलों के नाम याद रहते थे, लेकिन गाँव के बच्चों के नहीं। कहीं यह नहीं लिखा था कि उन्हें पहली बारिश के बाद मिट्टी को हाथ में लेकर सूँघने की आदत थी। कहीं यह भी नहीं कि उनकी मौत के बाद रद्दाबाई ने कई महीनों तक घर की दहलीज़ नहीं बुहारी थी। उन्हें लगता था, झाड़ू लगाने से उनके पैरों के निशान भी मिट जाएँगे।

फ़ाइलें इंसान को याद नहीं रखतीं। वे केवल उसके बारे में लिये गये फ़ैसले को सँभालकर रखती हैं।

देशमुख ने अगला पन्ना पलटा। एक आवेदन। फिर दूसरा। फिर तीसरा। हर आवेदन के नीचे लगभग एक जैसी आवाज़ें ,

“पुनः प्रस्तुत।” “विवरण स्पष्ट नहीं।” “अगली सुनवाई।” “जवाब की प्रतीक्षा।”

उन्हें अचानक लगा, यह फ़ाइल आगे नहीं बढ़ रही। यह गोल-गोल घूम रही है। जैसे किसी ने काग़ज़ पर समय का एक छोटा-सा कुआँ खोद दिया हो, और जो भी आवेदन उसमें गिरता, बाहर निकलने के बजाय उसी के चक्कर काटता रहता।

उन्होंने बीते सालों में सैकड़ों फ़ाइलें देखी थीं। कुछ में भ्रष्टाचार था। कुछ में जल्दबाज़ी। कुछ में मूर्खता। लेकिन कुछ फ़ाइलें ऐसी भी होती हैं जिनमें कोई एक अपराध नहीं मिलता। केवल बहुत सारे छोटे-छोटे डर मिलते हैं। जब हर अधिकारी ने सोचा होगा – “मैं क्यों जोखिम लूँ? अगला देख लेगा।” और वह “अगला” चार दशक तक आता रहा।

खिड़की के बाहर हवा तेज़ हुई। नीम की सबसे ऊपरी डाल पहले हिली। फिर नीचे की। फिर पूरा पेड़। देशमुख को अपने गुरु कुलकर्णी की एक और बात याद आई। एक बार उन्होंने पूछा था – “सर, सबसे कठिन आदेश कौन-सा होता है?”

कुलकर्णी ने बिना सिर उठाए उत्तर दिया था – “जिसे लिखने में केवल एक मिनट लगे, पर उसके साथ किसी इंसान  की पूरी उम्र बँधी हो।”तब देशमुख को यह वाक्य कुछ अधिक साहित्यिक लगा था। पर आज उन्हें लगा , वह अनुभव था।

बरामदे में रद्दाबाई ने धीरे से अपनी पीठ दीवार से टिकाई। नया चपरासी उन्हें नहीं पहचानता था। वह पास आया। “अम्मा, किस काम से आई हो?”रद्दाबाई ने उत्तर देने से पहले कुछ पल उसे देखा। उन्हें लगा, शायद सचमुच यह लड़का नहीं जानता। उन्होंने कहा, “ज़मीन का काम है।”

“कब से चल रहा है?”

रद्दाबाई ने पहले फ़ाइल वाली उस आलमारी  की ओर देखा, फिर उसकी ओर –  “इतने बरस से कि अब तो मुझे साल भी याद नहीं रहते।”

चपरासी मुस्कराया। उसे लगा, बूढ़ी औरत बढ़ा-चढ़ाकर कह रही है। वह चला गया। रद्दाबाई ने कुछ नहीं कहा। उन्हें अचानक याद आया । उनका बड़ा बेटा एक बार इसी बरामदे में खड़ा होकर बोला था – “आई, रहने दो। दो एकड़ के लिए कब तक जाओगी?”

उन्होंने उससे पूछा था – “तू क्या छोड़ने को कह रहा है?”

बेटे ने उत्तर नहीं दिया। वह शहर चला गया। फिर वहीं बस गया। अब वह पैसे भेज देता था। लेकिन कभी यह नहीं पूछता था – “इस बुधवार गई थीं?”

समय केवल खेत नहीं बाँटता। वह प्रतीक्षा भी बाँट देता है।

 

कमरे के भीतर देशमुख उसी वाक्य पर लौट आए।

“उपरोक्त भूमि का हस्तांतरण नियमानुसार पूर्ण किया गया।”

उन्होंने पहली बार ध्यान दिया कि उस लाइन के ठीक नीचे एक हल्का-सा दबाव था। जैसे लिखने वाले ने अंतिम शब्द पर कलम कुछ ज़्यादा देर तक रोक रखी हो।

उन्होंने पन्ना तिरछा किया। रोशनी का कोण बदलते ही दबे हुए अक्षरों की परछाइयाँ उभर आईं। लगता था, इस पन्ने के नीचे कभी कोई और नोटशीट रखी गई होगी। किसी और ने कुछ और लिखा होगा। उसका पाठ मिट चुका था। उसका दबाव बचा था। देशमुख देर तक उसे देखते रहे। काग़ज़ अपने पर लिखा भूल जाता है, पर उसके रेशे खुद पर पड़े दबाव को कभी नहीं भूलते।

पहली बारिश अब सचमुच शुरू हो चुकी थी। बड़ी-बड़ी बूँदें टीन की छत पर अलग-अलग नहीं गिर रही थीं। वे एक साथ गिरकर एक ही आवाज़ बन गई थीं। दफ़्तर के भीतर बैठे लोगों ने अपनी-अपनी बातचीत रोक दी। कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिनके सामने भाषा थोड़ी देर के लिए बेकार हो जाती है।

देशमुख ने फ़ाइल बंद नहीं की। उन्होंने केवल हथेली उस पर रख दी। उन्हें पहली बार लगा , आज अगर यह फ़ाइल फिर से अलमारी में चली गई, तो केवल एक आवेदन नहीं लौटेगा। उसके भीतर का एक इंसान भी उसी अलमारी में बंद हो जाएगा।

कुछ देर बाद , बारिश अब थम चुकी थी। टीन की छत से पानी की आख़िरी बूँदें एक निश्चित अंतराल पर गिर रही थीं,  जैसे कोई पुरानी घड़ी, जो वक़्त नहीं, केवल अपनी बची हुई साँसें गिन रही हो।

दफ़्तर के भीतर फिर वही आवाज़ें लौट आई थीं। स्टेपलर। मुहर। कीबोर्ड। कुर्सी खिसकने की खराश। देशमुख ने घंटी नहीं बजाई। उन्होंने खुद उठकर दरवाज़ा खोला।

बरामदे में बैठी रद्दाबाई ने उन्हें पहली बार अपनी ओर आते देखा। एक पल के लिए उन्हें लगा,  शायद कोई और अधिकारी होगा। अधिकारी तो अक्सर लोगों को बुलाते हैं। उनके पास कम ही आते हैं।

“आइए, बाई।” देशमुख ने इतना ही कहा। रद्दाबाई धीरे-धीरे उठीं। उनके घुटनों से आई हल्की-सी चरमराहट कमरे तक साथ आई। देशमुख ने पहली बार उस आवाज़ को सुना। उन्हें लगा, अठारह साल केवल फ़ाइल पर नहीं बीते थे। शरीर पर भी लिखे गए थे।

कमरे में कुर्सी आगे खिसकाई गई। पर रद्दाबाई बैठीं नहीं। उसने पूछा, “खड़े-खड़े सुन लूँ?”

देशमुख ने आग्रह नहीं किया। कुछ लोगों का खड़ा रहना आदत नहीं, इतिहास होता है।

उन्होंने फ़ाइल खोली। कुछ पल तक दोनों के बीच केवल पन्ने पलटने की आवाज़ रही। फिर देशमुख ने कहा, “बाई… मैं आपसे एक बात पूछूँ?” रद्दाबाई ने सिर हिलाया। “अगर यह ज़मीन आपको आज मिल जाए… तो क्या करेंगी?”

कमरे में कुछ देर मौन पसरा रहा। ऐसा सवाल तो  उनसे कभी किसी अधिकारी ने नहीं पूछा था। आज तक सबने यही पूछा था -“काग़ज़ लाईं?” “गवाह कौन है?” “आवेदन कब दिया?” किसी ने कभी नहीं पूछा ,”ज़मीन मिले तो उसका क्या होगा?”

रद्दाबाई ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश के बाद नीम के पत्ते पहले से अधिक हरे दिखाई दे रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा – “खेती तो नहीं कर पाऊँगी।”

देशमुख चुप रहे।

“घुटने जवाब दे चुके हैं।”फिर थोड़ी देर बाद उसने जोड़ा,”शायद… एक बार जाकर उसकी मिट्टी छू लूँ।”

बस इतना। न अनाज। न पैदावार। न कीमत। केवल –  मिट्टी छू लेना।

किसी ने अठारह साल तक मुक़दमा दो एकड़ के लिए नहीं लड़ा था। किसी ने अपनी यादों की आखरी परत को बचाए रखने के लिए लड़ा था।

उन्होंने फिर वही नोटशीट सामने रखी। ऊपर पुरानी लिखावट। नीचे खाली जगह। इतनी खाली कि उसमें एक वाक्य लिखा जा सकता था, और इतना भरा हुआ कि उसमें चालीस सालों की चुप्पी भी समा सकती थी।

उन्होंने पेन खोला। निब काग़ज़ पर रखी। लेकिन शब्द नहीं आए। उन्होंने काग़ज़ से पेन हटा लिया। अचानक कुलकर्णी की आवाज़ जैसे फिर सुनाई दी- “देशमुख, फ़ाइलें कभी झूठ नहीं बोलतीं। झूठ हम उन्हें बोलना सिखाते हैं।”

वह वाक्य उन्होंने सालों पहले सुना था। पर आज पहली बार उन्हें उसकी शर्म महसूस हुई।

उन्होंने फ़ाइल के पिछले पन्ने निकाले। पुराने नक़्शे। खसरा। पंचनामा। एक कोने में लगी फीकी-सी कार्बन कॉपी। कार्बन की लिखावट लगभग मिट चुकी थी। लेकिन एक नाम अब भी पढ़ा जा सकता था। गवाह – गजानन भोसले।

देशमुख ठिठक गए। यह नाम उन्होंने कहीं और भी देखा था। उन्होंने याद करने की कोशिश की। फिर अचानक स्मृति खुली।

तीन साल पहले, सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सूची में। गजानन भोसले। पटवारी। सेवानिवृत्त। दिवंगत।

देशमुख ने आँखें बंद कर लीं। एक-एक करके सारे लोग जा चुके थे। जिसने लिखा, वह नहीं रहा। जिसने देखा – वह भी नहीं। । जिसने नापा, वह भी नहीं। । जिसने गवाही दी, वह भी नहीं।

केवल एक औरत बची थी, और जिसका नाम अधिकांश काग़ज़ों में था ही नहीं। उन्हें पहली बार महसूस हुआ –

 सरकारी अभिलेखों में सबसे कम दर्ज वही लोग होते हैं जो सबसे अधिक भुगतते हैं।

 

उन्होंने नई नोटशीट खींची। काग़ज़ बिल्कुल सफ़ेद था। इतना सफ़ेद कि उस पर कोई भी वाक्य निर्दोष दिखाई देता। देशमुख ने धीरे-धीरे लिखा —

“प्रकरण के पुनरीक्षण से यह प्रतीत होता है कि पूर्व आदेश, तथ्य एवं उपलब्ध अभिलेखों से पूर्णतः समर्थित नहीं है। अतः पूर्व आदेश के पुनरीक्षण हेतु प्रकरण सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।”

उन्होंने पढ़ा। फिर दूसरी बार पढ़ा। फिर पेन उठाकर केवल एक शब्द जोड़ा, ” अनिवार्यतः।”

वे जानते थे,  यहीं से कठिनाई शुरू होगी। स्पष्टीकरण माँगा जाएगा। पुराने अभिलेख निकलेंगे। शायद विभागीय प्रश्न भी उठेंगे। हो सकता है कोई कहे – “इतने सालों बाद अब क्या आवश्यकता थी?”

वे यह भी जानते थे कि इस एक नोट से रद्दाबाई को ज़मीन आज नहीं मिलने वाली। आज उन्हें केवल एक और प्रतीक्षा मिलेगी।लेकिन यह पहली प्रतीक्षा होगी जिसके अंत में किसी ने दरवाज़ा बंद नहीं किया होगा।

उन्होंने नोटशीट रद्दाबाई की ओर नहीं बढ़ाई। उन्होंने केवल कहा, “बाई…” रद्दाबाई ने उनकी ओर देखा।”आज पहली बार आपकी फ़ाइल आगे गई है।” रद्दाबाई कुछ देर उन्हें देखती रहीं। फिर पूछा, “पक्की बात?”

देशमुख मुस्कराए नहीं। उन्होंने केवल सिर झुका दिया। “सरकारी दफ़्तर में ‘पक्की‘ बात कहने का अधिकार किसी के पास नहीं होता।” रद्दाबाई ने भी सिर हिला दिया। उन्हें यह उत्तर झूठ नहीं लगा। शायद इसलिए कि पहली बार किसी अधिकारी ने उनसे आश्वासन नहीं, सच बोला था।

उन्होंने धीरे से अपनी कपड़े की थैली उठाई। रसीद वापस तह की। फिर एक पल रुककर बोलीं — “अगले बुधवार आऊँ?”

देशमुख ने उत्तर देने में देर की। फिर बोले, “हाँ।”

“लेकिन इस बार…” – वे आगे कुछ कहना चाहते थे। कह नहीं पाए। रद्दाबाई समझ गईं। उन्होंने वाक्य पूरा नहीं कराया।

कुछ वाक्य पूरे न हों तो अधिक सच्चे रहते हैं।

वह दरवाज़े तक गईं। फिर लौटकर एक बार फ़ाइल की ओर देखा, जैसे किसी बीमार इंसान  को अस्पताल में छोड़ते समय लोग आख़िरी बार देखते हैं।

फिर चली गईं। मुँडेर पर बैठी टिटहरी भी उसी पल उड़ी, एक चक्कर, एक आख़िरी आवाज़, और फिर आसमान में कहीं खो गई।

देशमुख देर तक उस सफ़ेद नोटशीट को देखते रहे। उन्हें लगा, उन्होंने किसी की ज़मीन वापस नहीं की। उन्होंने केवल एक शब्द से दूसरे शब्द तक जाने का साहस किया है, “नियमानुसार” से ” पुनरीक्षण” तक।

 

नोटशीट सक्षम प्राधिकारी के पास पहुँचने में ग्यारह दिन लगे। सरकारी दफ़्तर में ग्यारह दिन किसी फ़ाइल के लिए कुछ भी नहीं होते। पर देशमुख के लिए वे ग्यारह दिन ऐसे बीते जैसे कोई अपनी ही लिखी चिट्ठी के जवाब का इंतज़ार कर रहा हो, यह जानते हुए भी कि जवाब अच्छा नहीं आएगा।

बारहवें दिन बुलावा आया। उपविभागीय अधिकारी कदम साहेब की मेज़ पर फ़ाइल खुली पड़ी थी, ठीक उसी पन्ने पर जहाँ देशमुख ने “अनिवार्यतः” लिखा था।

“यह शब्द,” कदम साहेब ने पूछा, “किस आधार पर?”

देशमुख ने उत्तर तैयार रखा था। दस्तावेज़। कार्बन कॉपी। गवाह का नाम, जो अब क़ब्र में था। दबे हुए अक्षरों का ज़िक्र उन्होंने नहीं किया , उसे किसी नोटशीट में कैसे लिखा जाता, यह वे स्वयं नहीं जानते थे।

कदम साहेब ने देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोले –  “बयालीस साल पुराना मामला दुबारा खोलने से पहले आपने ऊपर पूछा क्यों नहीं?”

“पूछता तो शायद जवाब आने में उतने ही साल और लग जाते, साहब।”

यह वाक्य देशमुख की ज़ुबान से अपने आप निकल गया। बोलते ही उन्हें लगा – यह जवाब नहीं था, यह स्वीकारोक्ति थी। कदम साहेब ने चश्मे के ऊपर से उन्हें देखा, कुछ पल तक, जैसे इस वाक्य को अपने बत्तीस साल के अनुभव में कहीं रखने की जगह ढूँढ़ रहे हों। उन्होंने फ़ाइल पर दस्तख़त नहीं किए। उन्होंने लिखा, “आगामी राजस्व शिविर में स्थलीय जाँच सहित पुनः प्रस्तुत करें।”

देशमुख समझ गए। यह न हाँ थी, न ना। यह वही पुराना कुआँ था, बस अब की बार उसकी गहराई थोड़ी कम हो गई थी।

अगले हफ़्ते बुधवार को रद्दाबाई नहीं आईं। चपरासी ने पहली बार गौर किया कि तीसरी सीढ़ी ख़ाली है। उसने किसी से कुछ नहीं कहा,  उसे रद्दाबाई का नाम भी ठीक से याद नहीं था। पर देशमुख ने, फ़ाइल हाथ में लिए, बरामदे की तरफ़ देखा, और उस ख़ाली सीढ़ी को देखकर उन्हें वैसा ही अटपटा लगा जैसा किसी परिचित कमरे में कोई पुरानी अलमारी हटा दिए जाने पर लगता है।

अगले बुधवार भी वे नहीं आईं। तीसरे बुधवार, देशमुख ने पटवारी से गाँव का पता लिखवाया, और दोपहर के खाने के समय स्वयं मोटर-साइकिल पर निकल पड़े। यह उनके पूरे सेवाकाल में पहली बार था कि वे किसी आवेदक के घर गए हों। रास्ते में उन्हें यह अजीब भी लगा और साफ़ भी  जैसे किसी नियम को तोड़ने में जो डर लगना चाहिए था, वह नहीं लगा।

रद्दाबाई खटिया पर लेटी थीं। बुख़ार उतर चुका था, पर शरीर उतना ही कमज़ोर था जितना बरसों की प्रतीक्षा के बाद कोई शरीर हो सकता है। बेटे को ख़बर भेजी गई थी। वह अभी शहर से आया नहीं था। देशमुख को देखकर रद्दाबाई हैरान नहीं हुईं। जैसे किसी दिन इस तरह आने की उन्होंने कल्पना पहले ही कर रखी हो।

“स्थलीय जाँच होगी,” देशमुख ने कहा, “आपको खेत तक चलना होगा। तभी नाप-जोख पूरी मानी जाएगी।”

रद्दाबाई ने छत की तरफ़ देखा। “चल तो नहीं पाऊँगी, साहब।”

“डोली मँगवा लेंगे।”

रद्दाबाई कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “आप ख़ुद आए। यह भी काफ़ी है।”

देशमुख ने कुछ नहीं कहा। उन्हें लगा, इस एक वाक्य में उतना वज़न था जितना बयालीस साल के रजिस्टर में नहीं था।

राजस्व शिविर की तारीख़ आई। सुबह से आसमान भारी था,  मानसून लौट रहा था, अपनी आख़िरी बारिशों के साथ। डोली दो आदमियों ने उठाई। रद्दाबाई का बेटा भी आ चुका था, चुप, कुछ शर्मिंदा-सा,  मानो अपने आई से माफ़ी माँगने का कोई तरीक़ा ढूँढ रहा हो और न पा रहा हो।

खेत तक पहुँचते-पहुँचते हल्की फुहार शुरू हो गई। पटवारी ने फ़ीता खींचा। कदम साहेब ख़ुद आए थे,  यह भी असामान्य था, पर देशमुख जानते थे कि कुछ जाँच अधिकारी अपनी उपस्थिति से यह दिखाना चाहते हैं कि निर्णय में उनकी भी उतनी ही भागीदारी है जितनी अस्वीकृति में होती।

रद्दाबाई को डोली से नीचे उतारा गया।

ठीक उसी पल कहीं पास की मेड़ से एक टिटहरी उड़ी, सिर के ऊपर एक चक्कर लगाया, तीखी आवाज़ में बोली, और खेत की दूसरी छोर पर जा बैठी ,  मानो वह भी उतनी ही देर से यहाँ किसी का इंतज़ार कर रही हो।

उन्होंने किसी से सहारा नहीं माँगा। घुटनों के बल झुकीं, एक हाथ ज़मीन पर टिकाया, और भीगी हुई मिट्टी को उँगलियों के बीच धीरे-धीरे मला,  जैसे किसी पुराने ख़त की स्याही परखी जा रही हो।

कोई नहीं बोला। पटवारी का फ़ीता भी एक पल के लिए रुक गया। दूर कहीं पैसेंजर ट्रेन की सीटी बजी , सवा तीन का वही समय, वही आवाज़, जो बरसों से बरामदे तक पहुँचती रही थी। यहाँ खेत में वह आवाज़ थोड़ी धीमी थी, पर पहचानी हुई।

रद्दाबाई ने आँखें बंद कर लीं। मेड़ पर बैठी टिटहरी एक बार फिर बोली, फिर उड़ी, और सीटी की आवाज़ में कहीं घुलकर खो गई।

काग़ज़ी कार्यवाही पूरी होने में एक महीना और लगा। अंतिम आदेश की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि देशमुख ने रजिस्टर 27/1984 को आख़िरी बार खोला। उन्होंने उसमें नया पन्ना जोड़ा, उस पर मुहर लगाई, और फ़ाइल को उसकी सामान्य जगह – अलमारी की तीसरी खाने में – वापस रखने से पहले एक पल रुके।

उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि इस एक सुधार से रजिस्टर के भीतर मौजूद बाक़ी अन्याय ठीक नहीं हो जाएँगे। अलमारी अब भी वैसी ही भरी थी — 19/1979, 44/1988, 03/1991, हर फ़ाइल पर धूल की वही पुरानी परत, हर जिल्द के भीतर किसी और की अधूरी प्रतीक्षा।

रद्दाबाई की ज़मीन उनके नाम हो चुकी थी। देशमुख ने अलमारी बंद की। कब्ज़े फिर चरचराए। इस बार वह आवाज़ उन्हें सवाल जैसी नहीं लगी। बस एक आवाज़ लगी, जो अपने पीछे एक हिसाब कम छोड़ गई थी।

रद्दाबाई अगले बुधवार दफ़्तर नहीं आईं। न उसके अगले बुधवार। चपरासी ने अब उस ख़ाली सीढ़ी पर ध्यान देना बंद कर दिया था। किसी ने यह भी नहीं देखा कि मुँडेर पर अब कोई टिटहरी नहीं आती , न बुलाने के लिए, न इंतज़ार करने के लिए। जिसका काम पूरा हो गया हो, वह शायद दुबारा आवाज़ नहीं देता। कुछ हफ़्तों बाद वहाँ कोई और आवेदक बैठने लगा –  एक जवान युवक , अपने पिता की पेंशन के काग़ज़ लिए, अधीर, बार-बार घड़ी देखता हुआ।

देशमुख ने उसे एक दिन देखा, और बिना किसी ख़ास वजह के, उससे पूछ लिया, “कब से आ रहे हो?”

“तीसरा हफ़्ता है, साहब।”

देशमुख ने सिर हिलाया, और अपनी मेज़ पर लौट गए। उन्होंने रजिस्टर 27/1984 नहीं खोला। उसकी अब ज़रूरत नहीं थी। पर उस शाम, दफ़्तर बंद करने से पहले, उन्होंने एक बार फिर अलमारी की तरफ़ देखा,  उन बंद, धूल-भरी रीढ़ों की तरफ़, जो अब भी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थीं।

उन्होंने तुरंत बत्ती बुझाई नहीं। एक पल रुके। फिर बुझा दी।

रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
9425611243


 


 

 

 

 

 

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