किसी भी इमारत में सबसे नाज़ुक क्षण वह होता है जब उसकी छत ढाली जा रही होती है। सरिया बँध चुका होता है, शटरिंग खड़ी होती है, मसाले से भरी तसलियाँ एक हाथ से दूसरे हाथ तक दौड़ रही होती हैं, और पूरा ढाँचा उस वक़्त अपने सबसे ज़्यादा वज़न के नीचे होता है। जो लोग उस क्षण उस छत पर और उसके नीचे खड़े होते हैं, वे जानते हैं कि उनकी जान कुछ बल्लियों, कुछ तख़्तों और किसी ठेकेदार की ईमानदारी पर टिकी है। रविवार की दोपहर अंबाला के पास धूलकोट गाँव में यही भरोसा टूट गया।
एक तीन मंज़िला निर्माणाधीन इमारत की तीसरी मंज़िल पर लिंटर डाला जा रहा था। मौक़े पर पैंतीस-चालीस मज़दूर काम कर रहे थे। अचानक ऊपर की मंज़िल बैठी और उसका बोझ नीचे की मंज़िलों को भी ले गया। शुरुआती ख़बरों में चार मौतें बताई गईं, सोमवार तक यह आँकड़ा छह तक पहुँचने की ख़बरें आईं और एक दर्जन से ज़्यादा घायल अस्पताल में हैं। NDRF और SDRF की टीमें रात भर मलबा हटाती रहीं। जिनकी पहचान हुई, उनमें राजिन्दर कुमार (50), कालिया राम (48), शास्त्री राम (50) और रूप सिंह (55) के नाम हैं। दो उत्तर प्रदेश से आकर आसपास के गाँवों में रह रहे थे। और प्रशासन के मुताबिक़ हादसे के तुरंत बाद इमारत का मालिक और ठेकेदार दोनों मौक़े से ग़ायब हो गए।
इस आख़िरी बात पर थोड़ा ठहरना चाहिए। जिस घड़ी दर्जनों लोग मलबे में दबे थे, उस घड़ी जिन दो लोगों पर उस साइट की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी थी, उन्होंने बचाव की जगह भागना चुना। यह किसी एक व्यक्ति की कायरता भर नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें निर्माण मज़दूर की जान एक ऐसी लागत है जिसका हिसाब कोई नहीं रखता, इसलिए जब वह जाती है तो जवाब देने के लिए भी कोई नहीं रुकता।
तो असली सवाल यह नहीं है कि धूलकोट की इमारत क्यों गिरी। उसकी जाँच होगी, हो सकता है घटिया सामग्री निकले, हो सकता है शटरिंग कमज़ोर रही हो, हो सकता है नक्शा पास ही न हुआ हो। असली सवाल यह है कि जिस देश में निर्माण क्षेत्र खेती के बाद सबसे बड़ा रोज़गार देने वाला क्षेत्र है, जहाँ हर शहर और अब हर क़स्बा किसी न किसी निर्माण में डूबा है, वहाँ निर्माण मज़दूर सुरक्षा आज भी काग़ज़ों की चीज़ क्यों है, साइट की नहीं?
ऐसा नहीं कि क़ानून नहीं है। 1996 में संसद ने भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार (BOCW) अधिनियम बनाया था। उसके साथ एक सेस क़ानून आया, जिसके तहत हर निर्माण परियोजना की लागत का एक प्रतिशत मज़दूरों के कल्याण के लिए वसूला जाता है। इस पैसे से राज्यों के कल्याण बोर्ड मज़दूरों को दुर्घटना मुआवज़ा, पेंशन, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और सुरक्षा प्रशिक्षण जैसी सुविधाएँ देने वाले थे। अब यह पुराना ढाँचा नई व्यावसायिक सुरक्षा संहिता (OSH Code) में समा गया है, जिसमें सुरक्षा समितियों, साइट पर सुरक्षा अधिकारी और नियोक्ता की जवाबदेही जैसी बातें और साफ़ शब्दों में लिखी गई हैं। यानी नियमों की किताब मोटी है। दिक़्क़त किताब और मचान के बीच की दूरी में है।
उस दूरी को आँकड़ों से नापा जा सकता है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार मार्च 2024 तक देश भर के कल्याण बोर्ड सेस के रूप में करीब 1.12 लाख करोड़ रुपये जमा कर चुके थे, पर उसमें से लगभग 57 प्रतिशत ही ख़र्च हुआ। गुजरात ने सोलह वर्षों में 4,700 करोड़ रुपये से ज़्यादा का सेस वसूला और मज़दूरों पर लगभग 808 करोड़ ही लगा पाया। दिल्ली में CAG ने पाया कि 2019 से 2023 के बीच 1,174 करोड़ की वसूली के मुक़ाबले सिर्फ़ 605 करोड़ ख़र्च हुए। और हमारे अपने मध्यप्रदेश में CAG ने बताया कि मज़दूरों के इसी कोष से 416 करोड़ रुपये से ज़्यादा बिजली बिल माफ़ी जैसी लोकलुभावन योजना में लगा दिए गए, जबकि बोर्ड के पास लगभग दो हज़ार करोड़ रुपये बिना ख़र्च पड़े थे। मतलब साफ़ है: मज़दूर के नाम पर पैसे की कमी नहीं है, मज़दूर की परवाह की कमी है।
मौतों की गिनती भी इसी उदासीनता की गवाही देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2023 में देश में ढाँचे ढहने के 1,587 मामले दर्ज हुए। पर यह तस्वीर का सिर्फ़ एक कोना है। मचान से गिरना, बिजली का करंट, खुदाई में मिट्टी धँसना, ऐसी हज़ारों मौतें अलग-अलग ख़ानों में बिखर जाती हैं, और बहुत सी तो दर्ज ही नहीं होतीं, क्योंकि मरने वाला मज़दूर किसी रजिस्टर में था ही नहीं। जिस मज़दूर का पंजीयन कल्याण बोर्ड में नहीं, उसकी मौत पर बोर्ड का मुआवज़ा भी नहीं। और पंजीयन का हाल यह है कि ज़्यादातर मज़दूर एक राज्य से दूसरे राज्य, एक ठेकेदार से दूसरे ठेकेदार के बीच घूमते रहते हैं। धूलकोट में मरने वालों में दो उत्तर प्रदेश के थे। उनका पंजीयन हरियाणा में था या नहीं, यह सवाल शायद अब कोई पूछेगा भी नहीं।
फिर भी यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना किसी एक दोषी को ढूँढ लेने से लगता है। धूलकोट जैसी जगहें न पूरी तरह गाँव हैं, न पूरी तरह शहर। ये वे इलाक़े हैं जहाँ शहर फैलता जा रहा है, पर शहर का नियमन अभी पहुँचा नहीं है। यहाँ नक्शा पास कराने, संरचना की जाँच कराने और काम के दौरान निरीक्षण की व्यवस्था या तो कमज़ोर है या है ही नहीं। छोटे मालिक अक्सर किसी इंजीनियर की जगह अनुभवी मिस्त्री के भरोसे मकान खड़ा करते हैं। यह लापरवाही से ज़्यादा आदत है, और यह आदत पीढ़ियों से चली आ रही है। ऊपर से, हमारे देश में श्रम निरीक्षकों की संख्या इतनी कम है कि हर साइट पर निगरानी की उम्मीद करना व्यावहारिक भी नहीं लगता।
इसका एक विपरीत तर्क भी ईमानदारी से सुनना चाहिए। कहा जाता है कि निर्माण पर ज़्यादा नियम लादे गए तो छोटे मकान और छोटे बिल्डर इंस्पेक्टर-राज के शिकार हो जाएँगे, लागत बढ़ेगी, घर महँगे होंगे और आख़िर में नुक़सान उन्हीं मज़दूरों का होगा जिनका काम घट जाएगा। ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के दौर में निरीक्षण को बोझ की तरह देखा गया है और स्व-प्रमाणन को सुधार की तरह। इस तर्क में इतना सच ज़रूर है कि पुराना निरीक्षण तंत्र सुरक्षा कम, वसूली ज़्यादा करता था।
पर यहीं मेरी असहमति है। भ्रष्ट निरीक्षण का इलाज निरीक्षण ख़त्म करना नहीं, उसे जवाबदेह बनाना है। और सुरक्षा के सबसे बुनियादी उपाय महँगे भी नहीं हैं। हेलमेट, सेफ़्टी बेल्ट, ठीक से बँधी शटरिंग, लिंटर डालते वक़्त नीचे की मंज़िलों से लोगों को हटा देना, और किसी योग्य व्यक्ति से ढाँचे की जाँच, इन सबकी लागत किसी मकान की कुल लागत में नगण्य है। कमी पैसे की नहीं, इस सोच की है कि मज़दूर की जान भी उसी तरह परियोजना की लागत में शामिल है जैसे सीमेंट और सरिया। जिस दिन किसी मालिक को यह डर होगा कि उसकी साइट पर मौत का मतलब सख़्त आपराधिक जवाबदेही और भारी मुआवज़ा है, और यह डर हर साल दो-चार बार की ख़बर न होकर नियमित अनुभव बन जाएगा, उस दिन शटरिंग अपने-आप मज़बूत होने लगेगी।
कुछ क़दम तुरंत उठाए जा सकते हैं। सेस का जो पैसा बोर्डों के खातों में पड़ा है, उसका एक निश्चित हिस्सा साइट-स्तर की सुरक्षा, प्रशिक्षण और स्वतंत्र संरचनात्मक जाँच पर ख़र्च करना अनिवार्य हो। पंजीयन को मज़दूर के साथ चलने वाला बनाया जाए, ताकि उत्तर प्रदेश का मज़दूर हरियाणा में मरे तो उसका परिवार दो राज्यों के दफ़्तरों के बीच न भटके। शहरी सीमा से सटे इलाक़ों में, जहाँ सबसे तेज़ निर्माण हो रहा है, एक से ज़्यादा मंज़िल की हर इमारत के लिए साधारण पर अनिवार्य संरचनात्मक प्रमाणन हो। और हर ऐसी दुर्घटना की सार्वजनिक, समयबद्ध जाँच रिपोर्ट आए, ताकि यह पता चले कि किस कड़ी में क्या टूटा, सिर्फ़ यह नहीं कि कितने मरे।
इस बहस का दायरा अंबाला से कहीं बड़ा है। भारत आने वाले दो दशकों में जितना निर्माण करने जा रहा है, उतना शायद उसने अपने पूरे इतिहास में नहीं किया। सड़कें, मेट्रो, आवास योजनाएँ, और हर क़स्बे के बाहर उगती नई कॉलोनियाँ, यह सब उन्हीं हाथों से बनेगा जो आज किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं। अगर विकास की इस इमारत की नींव में मज़दूरों की अनगिनत, अनदर्ज मौतें दबती रहीं, तो वह इमारत चाहे जितनी ऊँची हो, नैतिक रूप से खोखली रहेगी।
धूलकोट की उस इमारत में, जब वह पूरी होती, राजिन्दर, कालिया राम, शास्त्री राम और रूप सिंह में से कोई भी कभी रहने नहीं आता। मज़दूर जो छत बनाता है, उसके नीचे कभी नहीं सोता। वह बस इतनी उम्मीद करता है कि बनाते वक़्त वह छत उस पर न गिरे। एक सभ्य समाज की पहली पहचान यही है कि वह इस छोटी-सी उम्मीद को पूरा कर सके। अभी तक हम यह भी नहीं कर पाए हैं।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

