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जब तिजोरी की चाबी ही बिक जाए

पेपर लीक — जब तिजोरी की चाबी ही बिक जाए

किसी बैंक में डकैती हो जाए तो हम पहले ताले देखते हैं, फिर दीवारें, फिर पहरेदार। पर अगर पता चले कि तिजोरी किसी ने तोड़ी ही नहीं, बल्कि उसकी चाबी रखने वाले कर्मचारी ने ख़ुद पार्किंग में खड़े होकर किसी को थमा दी थी, तब सवाल ताले का नहीं रह जाता। तब सवाल उस पूरे भरोसे का हो जाता है जिसके सहारे बैंक चलता है। महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के साथ इस समय ठीक यही हो रहा है।

पिछले हफ़्ते भर से पुणे की सड़कों पर हज़ारों प्रतियोगी छात्र बैठे हैं। उनकी माँग है कि आयोग के अध्यक्ष इस्तीफ़ा दें। सोमवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से सिफ़ारिश की कि संविधान के अनुच्छेद 317 के तहत आयोग के मौजूदा और पूर्व अध्यक्षों तथा सदस्यों के ख़िलाफ़ जाँच के लिए हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बने, जो तीन महीने में रिपोर्ट दे। विपक्ष इसे देर से उठाया गया क़दम बता रहा है, सरकार इसे अपनी गंभीरता का सबूत। पर इस राजनीतिक खींचतान के नीचे जो असली कहानी दबी है, वह कहीं ज़्यादा परेशान करने वाली है।

कहानी ड्रग इंस्पेक्टर की 154 नौकरियों की है। 22 मार्च 2026 को इनके लिए परीक्षा हुई, जिसमें क़रीब साढ़े चौवालीस हज़ार उम्मीदवार बैठे। मुंबई क्राइम ब्रांच की जाँच के मुताबिक़ विशेषज्ञों ने इस परीक्षा के लिए 294 गोपनीय प्रश्नों का एक बड़ा सेट तैयार किया था, जिसमें से असली पर्चे के सौ सवाल चुने गए। आयोग के ही एक कर्मचारी ने यह सेट अपने लैपटॉप पर टाइप किया और आयोग की पार्किंग में अपने वरिष्ठ अधिकारी, एक अवर सचिव, को सौंप दिया। वहाँ से यह आयोग के एक और कर्मचारी के हाथों होता हुआ एक कोचिंग संस्थान के निदेशक तक पहुँचा। फिर एक पिता ने पाँच लाख रुपये देकर इसे ख़रीदा और अपनी बेटी को दिया। बेटी ने व्हाट्सऐप पर अपने दोस्त को भेजा। परीक्षा से दो दिन पहले, 20 मार्च को, ये सवाल उम्मीदवार के हाथ में थे। वह मेरिट सूची में सातवें नंबर पर आई और इंटरव्यू तक पहुँची।

और यह सब खुला कैसे? किसी निगरानी तंत्र से नहीं, किसी ऑडिट से नहीं, आयोग की किसी आंतरिक सतर्कता से भी नहीं। पुलिस के मुताबिक़ लड़की और उसके दोस्त का रिश्ता टूट गया और उस दोस्त ने शिकायत कर दी। जुलाई के आख़िर में शिकायतें आईं तो आयोग ने शुरुआत में किसी सुरक्षा चूक से इनकार किया। फिर 25 अगस्त को FIR हुई, अगले दिन आयोग के तीन अधिकारियों समेत छह लोग गिरफ़्तार हुए, और पूरी भर्ती रद्द कर दी गई। यानी जो साढ़े चौवालीस हज़ार युवा ईमानदारी से परीक्षा में बैठे थे, उनके पाँच महीने, उनकी तैयारी, उनका पैसा और उनकी उम्मीद, सब कुछ उस सच्चाई की भेंट चढ़ गया जो एक टूटे रिश्ते की वजह से बाहर आई।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। हम हर पेपर लीक को एक अपराध की तरह देखते हैं: कोई गिरोह था, कुछ लालची लोग थे, पुलिस ने पकड़ लिया। पर जब सेंध परीक्षा लेने वाली संस्था के भीतर से लगे, तो यह अपराध से ज़्यादा संस्थागत विफलता है। सवाल यह नहीं कि चोर कौन था। सवाल यह है कि जिस संस्था पर लाखों युवाओं का भविष्य तौलने की ज़िम्मेदारी है, उसकी अपनी परीक्षा कौन लेता है?

यह सवाल सिर्फ़ महाराष्ट्र का नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल ने 2024 में बताया था कि पिछले पाँच साल में पंद्रह राज्यों में भर्ती परीक्षाओं के 41 पेपर लीक के मामले सामने आए, जिनसे एक लाख से ज़्यादा पदों के लिए आवेदन करने वाले क़रीब 1.4 करोड़ युवा प्रभावित हुए। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, लगभग कोई बड़ा राज्य अछूता नहीं रहा। 2024 में NEET-UG के विवाद ने तो पूरे देश को हिला दिया था। उसी साल केंद्र ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने का क़ानून बनाया, और महाराष्ट्र ने भी अपना अलग क़ानून पास किया, जिसमें तीन से पाँच साल की सज़ा, दस लाख रुपये तक जुर्माना और ऐसे अपराधों को ग़ैर-ज़मानती बनाने का प्रावधान है। क़ानून बने दो साल हो गए। MPSC का यह पर्चा उसी क़ानून के रहते, उसी राज्य में, आयोग के अपने दफ़्तर से बाहर गया।

इससे एक बात साफ़ होती है: सज़ा का डर अकेले काफ़ी नहीं है। जिस कर्मचारी के हाथ में सवालों का पूरा भंडार हो, उसके लिए पाँच लाख रुपये का लालच और पकड़े जाने की कम संभावना, यह हिसाब अक्सर सज़ा की कड़ाई पर भारी पड़ता है। और पकड़े जाने की संभावना तब कम ही रहती है जब पूरी व्यवस्था में कोई ऐसा बिंदु ही न हो जहाँ यह पता चले कि गोपनीय फ़ाइल किसने, कब, किस डिवाइस पर खोली। अगर 294 सवालों का सेट किसी के निजी लैपटॉप तक पहुँच सकता है, तो ताले तो हैं, पर उनकी चाबियों का कोई हिसाब नहीं है।

अब इस मामले का दूसरा, कठिन पहलू। छात्रों की माँग है कि अध्यक्ष इस्तीफ़ा दें। भावनात्मक रूप से यह माँग समझ में आती है, जवाबदेही कहीं तो तय होनी चाहिए। पर यहाँ एक ईमानदार विपरीत तर्क भी है, और उसे सुनना ज़रूरी है। लोक सेवा आयोगों को संविधान ने जानबूझकर सरकार की पहुँच से दूर रखा है। अनुच्छेद 317 के तहत किसी अध्यक्ष या सदस्य को “दुर्व्यवहार” के आधार पर हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की जाँच ज़रूरी है, और राज्यपाल केवल उस जाँच के दौरान निलंबित कर सकते हैं। यह सुरक्षा इसलिए है कि कोई सरकार अपनी पसंद की भर्तियाँ करवाने के लिए आयोग पर दबाव न डाल सके। अगर हर विवाद पर सड़क के दबाव में अध्यक्ष बदले जाने लगें, तो कल कोई सरकार इसी रास्ते से आयोग को अपनी जेब में डाल सकती है। अधीनस्थ कर्मचारियों के अपराध के लिए मुखिया को बिना जाँच के सज़ा देना न्याय नहीं, भीड़ का फ़ैसला होगा।

यह तर्क वज़नदार है। पर इसकी सीमा भी है। स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही से छूट नहीं होता। संविधान ने आयोग को सरकार से स्वतंत्र रखा है, उम्मीदवारों से नहीं। जिस संस्था ने शिकायत आने पर पहले इनकार किया, जिसके अवर सचिव स्तर के अधिकारी गिरफ़्तार हुए, और जिसकी अपनी व्यवस्था एक निजी झगड़े के बिना यह चोरी पकड़ ही नहीं पाई, वह यह नहीं कह सकती कि उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कुछ “भटके हुए कर्मचारियों” तक सीमित है। नेतृत्व की ज़िम्मेदारी यही होती है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें एक व्यक्ति की बेईमानी पूरे तंत्र को न डुबो सके।

इसलिए मेरा मानना है कि इस बहस को “इस्तीफ़ा दो या न दो” के दो खानों से निकालना होगा। मुख्यमंत्री की प्रस्तावित जाँच एक ज़रूरी क़दम है, पर याद रखना चाहिए कि अनुच्छेद 317 में हटाने का रास्ता आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट की जाँच से होकर ही जाता है, और यह प्रक्रिया लंबी है। तब तक छात्रों का भरोसा लौटाने के लिए कुछ ठोस और तुरंत किए जा सकने वाले काम हैं। पहला, प्रश्न-पत्र तैयार करने से लेकर छपाई तक हर क़दम का डिजिटल रिकॉर्ड हो, ताकि पता रहे कि कौन-सी फ़ाइल किसने, कब खोली, और किसी एक व्यक्ति के पास पूरा प्रश्न-भंडार न हो। दूसरा, आयोगों का स्वतंत्र, बाहरी सुरक्षा ऑडिट हर साल हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो। तीसरा, और शायद सबसे अनदेखा, जिन ईमानदार उम्मीदवारों की परीक्षा किसी और की बेईमानी से रद्द हुई, उन्हें फ़ीस वापसी, यात्रा ख़र्च और ज़रूरत हो तो आयु सीमा में छूट मिले। आज की व्यवस्था में लीक का सारा बोझ उसी पर पड़ता है जिसने कोई ग़लती नहीं की।

इस मामले का असर ड्रग इंस्पेक्टर की 154 कुर्सियों से कहीं बड़ा है। सोचिए, ये वे अधिकारी होते जिनकी ज़िम्मेदारी बाज़ार में बिकने वाली दवाओं की गुणवत्ता जाँचना है। जो व्यक्ति पाँच लाख रुपये देकर यह नौकरी पाता, उससे यह उम्मीद करना कि वह नक़ली दवा बेचने वाले से रिश्वत नहीं लेगा, भोलापन होता। भ्रष्ट भर्ती सिर्फ़ एक योग्य युवा की सीट नहीं छीनती, वह आने वाले तीस साल के लिए एक समझौतावादी अफ़सर व्यवस्था में बिठा देती है। पेपर लीक इसलिए सिर्फ़ शिक्षा या रोज़गार का मुद्दा नहीं, शासन की गुणवत्ता का मुद्दा है।

और एक बात उन युवाओं के बारे में, जो पुणे के किराये के कमरों में, लाइब्रेरियों में, चाय की टपरियों पर बरसों से अपनी ज़िंदगी इन परीक्षाओं के नाम कर चुके हैं। उनमें से ज़्यादातर किसी बड़े शहर के अमीर परिवार से नहीं आते। उनके लिए सरकारी नौकरी सिर्फ़ रोज़गार नहीं, एक सामाजिक सीढ़ी है, कई बार पूरे परिवार की इकलौती उम्मीद। जब वे देखते हैं कि उनकी मेहनत से ज़्यादा कीमत किसी के पाँच लाख रुपये की है, तो उनका भरोसा सिर्फ़ एक आयोग से नहीं, उस पूरे विचार से उठने लगता है कि इस देश में मेहनत से आगे बढ़ा जा सकता है। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह सबसे महँगा नुकसान है।

इस मामले में सबसे चुभने वाली बात यही है कि सच एक टूटे रिश्ते की वजह से बाहर आया। अगर वह रिश्ता न टूटता, तो आज सातवीं रैंक वाली उम्मीदवार शायद किसी ज़िले में ड्रग इंस्पेक्टर की कुर्सी पर बैठी होती, और साढ़े चौवालीस हज़ार युवा यह मानकर अपनी अगली तैयारी में लगे होते कि वे ईमानदार मुक़ाबले में हारे। जो व्यवस्था अपनी ईमानदारी के लिए इत्तफ़ाक़ों पर टिकी हो, वह असल में कोई व्यवस्था नहीं। अगली बार पर्चा फिर लीक होगा, और हो सकता है तब किसी का दिल न टूटे।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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