
दीपावली की जगमगाती रात, एक सुनार का तराज़ू और बीस बरस पुराना अपराधबोध — दीपावली की यह कहानी “विश्वगाथा” त्रैमासिक पत्रिका (गुजरात) के अक्टूबर–दिसंबर अंक में प्रकाशित हुई है।
लिम्बड़ी की सुनार गली में दीपावली की शाम कुछ और ही रंग लेकर आती है। दुकानों के शटर सोने के पानी से नहाए हुए लगते हैं, हवा में इत्र, घी और जलते हुए तेल की मिली-जुली गंध तैरती रहती है, और हर दरवाज़े पर एक कतार-सी दीयों की लगी होती है, जैसे पूरी गली ने मिलकर आसमान से कुछ माँगा हो और जवाब में उसे ये टिमटिमाती रोशनी मिली हो।
रमणीकलाल शेठ की दुकान, “शेठ ज्वेलर्स”, उस गली की सबसे पुरानी और सबसे भरोसेमंद दुकान मानी जाती थी। तीन पीढ़ियों से यहाँ सोना तोला जाता रहा था, और रमणीकलाल के बारे में लोग कहते थे “सेठ के तराज़ू में कभी झूठ नहीं तुला।” यह बात उन्हें हर साल दीपावली पर याद दिलाई जाती, मानो एक आशीर्वाद हो, और हर बार रमणीकलाल की मुस्कान थोड़ी देर से आती, थोड़ी बुझी हुई-सी।
धनतेरस की सुबह से ही दुकान का हुलिया बदलना शुरू हो गया था। रमणीकलाल ने खुद अपने हाथों से दरवाज़े पर तोरण बँधवाया, फ़र्श पर रंगोली बनवाई, और हर काउंटर पर नए मखमली कपड़े बिछाए ताकि गहने और भी दमकें। इस पूरी तैयारी में उनका पुराना कारीगर भगवानदास साथ रहा , पंद्रह साल से रमणीकलाल के साथ बैठा हुआ आदमी, जिसकी उँगलियाँ अब भी सोने को छूते ही उसकी शुद्धता बता देती थीं। भगवानदास ने ही, दोपहर के आसपास, पहली बार अपने सेठ के चेहरे पर वह परछाई देखी थी।
“सेठ जी,” उसने हल्के से कहा, तराज़ू साफ़ करते हुए, “तबियत तो ठीक है ना? आज सुबह से आप तीसरी बार वही ज़ेवर तौल चुके हैं जो पहले ही तुल चुका था।”
रमणीकलाल चौंके, फिर हँस दिए, वह हँसी जो किसी बात को टालने के लिए ओढ़ी जाती है। “अरे कुछ नहीं, दीवाली का दिन है, ग्राहकों की भीड़ में ध्यान बँट जाता है। तू अपना काम देख।”
पर भगवानदास ने आगे कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ इतना नोट कर लिया कि आज सेठ जी के हाथ, जो चालीस साल से बिना काँपे तराज़ू सँभालते आए थे, आज सुबह से हल्का-सा कंपन ले चुके थे।
उस साल भी दुकान ग्राहकों से भरी थी। धनतेरस निकल चुकी थी, आज दीपावली की रात थी, और आख़िरी घंटे में वे लोग आ रहे थे जो या तो अंतिम क्षण तक मोल-भाव करते हैं, या जिनके पास पहले पैसों का इंतज़ाम नहीं था। रमणीकलाल की बेटी दीया, जो इस बार कॉलेज से छुट्टी लेकर आई थी, काउंटर के दूसरे छोर से हिसाब सँभाल रही थी।
उसका नाम दीया ही क्यों रखा गया था, यह कहानी घर में हर दीपावली पर दोहराई जाती कि वह दीपावली की रात ही जन्मी थी, ठीक उसी क्षण जब आँगन का सबसे बड़ा दीया बुझ गया था और माँ कंचनबेन ने उसे फिर से जलाया था, मानो बेटी के आने के साथ ही उस बुझे दीये को दोबारा साँस मिली हो।
दोपहर करीब तीन बजे, जब दुकान में थोड़ी सुस्ती आई, दीया अपने पिता की मेज़ पर कुछ पुराने बिल ढूँढने गई — उसे पिछले महीने के एक ग्राहक की रसीद चाहिए थी। मेज़ की सबसे निचली दराज़, जो हमेशा हल्की-सी अटकी रहती थी, आज खुद-ब-खुद थोड़ी खुल गई। अंदर बिलों के नीचे एक पुरानी, फटे किनारों वाली बहीखाता दबी थी, जिसका रंग बाकी सब कागज़ों से अलग, पीला और बरसों पुराना था।
दीया ने उसे उठाकर देखा — कुछ नाम, कुछ तारीख़ें, और एक पन्ने पर लाल स्याही से घेरा हुआ एक नाम: “देवजी भाई पटेल, चूड़ियाँ, 20 तोला, वज़न विवाद।” उसके नीचे कुछ शब्द काटकर फिर से लिखे गए थे, इतनी बार कि कागज़ वहाँ से लगभग फट चुका था।
उसी वक़्त रमणीकलाल पीछे से आ गए। उन्होंने बहीखाता दीया के हाथ से लगभग छीन लिया इतनी तेज़ी से कि दीया हैरान रह गई।
“यह… यह पुराना हिसाब है, बेटा, बहुत पुराना। तुझे इससे कोई मतलब नहीं।” उन्होंने बहीखाता वापस दराज़ में रखा, और इस बार उसे ताले में बंद कर दिया , वह ताला जो दीया ने पहले कभी उस दराज़ पर नहीं देखा था।
दीया कुछ नहीं बोली, पर उस शाम पहली बार उसके भीतर एक सवाल जन्मा, जिसे वह खुद भी नाम नहीं दे पा रही थी।
शाम साढ़े छह बजे के करीब रमणीकलाल का फ़ोन तीसरी बार बजा। हर बार वे दुकान से बाहर, गली के मोड़ पर जाकर बात करते, और हर बार लौटते समय उनके चेहरे पर वह भाव होता जो किसी आदमी के चेहरे पर तब आता है जब वह एक भारी बोरा कंधे पर टाँगे चल रहा हो और यह दिखाने की कोशिश कर रहा हो कि बोरा हल्का है। कंचनबेन ने दो बार पूछा — “किसका फ़ोन था?” और दोनों बार जवाब मिला, “व्यापार का, कुछ खास नहीं।”
तीसरी बार जब वे लौटे, तो उनके पीछे-पीछे दुकान के बाहर खड़ा एक जान-पहचान वाला चेहरा भी अंदर आया- मगनभाई, जो पास ही कपड़े की दुकान चलाता था। “सेठ जी,” उसने हँसते हुए कहा, “आज सुबह बाज़ार में एक अजीब बूढ़ा आदमी घूम रहा था, बार-बार पूछ रहा था, ‘शेठ रमणीकलाल की दुकान कहाँ है?’ मैंने रास्ता बता दिया, पर उसका चेहरा-मोहरा देखकर लगा जैसे किसी पुरानी फ़िल्म का कोई भूला हुआ किरदार अचानक सड़क पर उतर आया हो। आपसे कोई पुराना नाता तो नहीं?”
रमणीकलाल की हथेलियाँ, जो अभी तक एक ग्राहक के गहने तौल रही थीं, अचानक स्थिर हो गईं इतनी स्थिर कि तराज़ू का काँटा भी हिलना भूल गया।
“नहीं-नहीं,” उन्होंने कहा, आवाज़ को जितना हो सके सहज बनाते हुए, “बहुत से लोग हैं जो पुराने ग्राहकों को ढूँढते फिरते हैं। दीवाली का समय है, हर कोई किसी न किसी से मिलना चाहता है।”
मगनभाई हँसकर चला गया, पर उसके जाने के बाद रमणीकलाल कुछ देर तक तराज़ू के सामने खड़े रहे, जैसे भूल गए हों कि उनके हाथ में क्या तौला जाना है।
बीस बरस पहले की एक शाम अचानक उनके भीतर उतर आई। तब दुकान इतनी बड़ी नहीं थी, बस एक छोटा-सा गल्ला, दो तराज़ू, और पिता का बिस्तर पीछे के कमरे में, जहाँ से खाँसी की आवाज़ें दिन-रात आती रहती थीं। पिता बीमार थे, और परिवार पर एक साहूकार का इतना कर्ज़ था कि अगली दीपावली से पहले दुकान का शटर हमेशा के लिए गिर सकता था।
उन्हीं दिनों देवजी भाई नाम का एक ग़रीब बुनकर अपनी बेटी की शादी के लिए पुश्तैनी सोने की दो चूड़ियाँ बेचने आया था, उसकी मरी हुई पत्नी की आख़िरी निशानी। देवजी भाई ने बड़े जतन से उन चूड़ियों को एक फटे कपड़े में लपेटकर लाया था, और तराज़ू पर रखते हुए उसकी आँखों में वह चमक थी जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होती है जो अपने बच्चे का भविष्य किसी और की ईमानदारी पर टाँग रहा हो।
“सेठ जी,” उसने उस शाम कहा था, “इसी से मेरी बेटी की डोली उठेगी। ठीक से तौलिएगा।”
रमणीकलाल ने चूड़ियों को तौला, उनकी शुद्धता जाँची, और फिर, एक पल के उस अंधेरे में जो हर आदमी के भीतर कहीं छुपा रहता है, उन्होंने तराज़ू के पलड़े के नीचे हल्के से अपनी उंगली दबा दी थी। भार कम दिखा, दाम भी कम मिला, इतना कम कि देवजी भाई अपनी बेटी की शादी वक़्त पर न कर सके, रिश्ता टूट गया। सुना था कि लड़का वाले रुके नहीं, कि देवजी भाई की बेटी बरसों तक कुँवारी बैठी रही, और एक दिन देवजी भाई अपना घर-बार समेटकर, बिना किसी को बताए, गाँव छोड़कर कहीं और चला गया था, कुछ कहते थे सूरत, कुछ कहते थे भावनगर, कोई ठीक-ठीक नहीं जानता था।
रमणीकलाल का परिवार उस बेईमानी की बुनियाद पर फिर खड़ा हो गया। पिता की दवा हुई, कर्ज़ उतरा, दुकान बची, नाम बढ़ा, “सेठ के तराज़ू में झूठ नहीं तुलता” यह कहावत हर साल एक नए घाव की तरह उनके सीने में गड़ती रही। बरसों तक रमणीकलाल हर दीपावली की रात इसी डर के साथ सोते थे कि किसी दिन देवजी भाई दरवाज़े पर खड़ा मिलेगा न शिकायत लेकर, न झगड़ा लेकर, बस खड़ा होगा, जैसे कोई परछाई अपने मालिक को ढूँढ़ते हुए आ पहुँची हो।
और आज, ठीक बीस साल बाद, मगनभाई के शब्दों ने उसी डर को फिर से जगा दिया था।
रात के करीब पौने सात बजे दुकान का फ़ोन एक बार फिर बजा। इस बार रमणीकलाल ने खुद उठाया, उम्मीद और डर के मिले-जुले भाव से। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई “सेठ जी, मैं मूलचंद साहूकार बोल रहा हूँ, याद है ना, पिछले महीने वाला उधार? दीवाली की रात से पहले निपटा दीजिएगा, वरना…”
रमणीकलाल ने राहत की एक लंबी साँस ली यह वह डर नहीं था जिसकी उन्हें आशंका थी, बस एक साधारण व्यापारिक तकाज़ा। उन्होंने जल्दी से हामी भरी और फ़ोन रख दिया। पर राहत की वह साँस बहुत देर तक नहीं टिकी, क्योंकि जब वे दुकान की तरफ़ मुड़े, उनकी नज़र सीढ़ियों की तरफ़ गई, और वहाँ एक परछाई खड़ी थी।
वह दुबला था, उसकी धोती मैली पर करीने से लपेटी हुई, कंधे पर एक फटी हुई काली शॉल, और आँखों में वह चमक जो भूख से नहीं, बल्कि किसी बहुत पुरानी थकान से आती है। उसने हाथ नहीं फैलाया। बस खड़ा रहा, दुकान के अंदर जगमगाते सोने को देखता हुआ, जैसे किसी पुरानी किताब का कोई पन्ना पढ़ रहा हो जिसे वह बरसों पहले पढ़ चुका है और अब सिर्फ़ यह याद करने आया है कि कहानी कैसे ख़त्म हुई थी।
रमणीकलाल की नज़र जब उस पर पड़ी, तो तराज़ू उनके हाथ से लगभग छूट गया। दुकान में बैठे बाकी सब लोग – भगवानदास, दीया, दो-चार ग्राहक, अपने-अपने काम में लगे रहे, किसी ने उस बूढ़े आदमी की तरफ़ ध्यान तक नहीं दिया, जैसे वह इस भीड़-भरी शाम का हिस्सा ही न हो। पर रमणीकलाल के लिए वह क्षण मानो ठहर गया।
क्या यह सचमुच देवजी भाई था, या सिर्फ़ एक बूढ़ा भिखारी जो हर साल इस मौसम में यहाँ आ जाता है? रमणीकलाल पक्के तौर पर नहीं कह सकते थे। बीस साल एक चेहरे को बहुत बदल देते हैं, और अपराधबोध आदमी को हर परछाई में उसका पीड़ित दिखाने लगता है। शायद यही वह आदमी था, शायद कोई और। पर इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि जो सवाल रमणीकलाल के भीतर उठ रहा था, वह उस बूढ़े आदमी की पहचान का नहीं, बल्कि अपनी ही आत्मा की पहचान का था।
भगवानदास ने अपने सेठ को यूँ ठिठके देखा तो पूछ बैठा – “सेठ जी, कोई बात है क्या?”
“नहीं, कुछ नहीं,” रमणीकलाल ने कहा, आवाज़ में वह कँपकँपाहट छुपाते हुए जो अब उनके हाथों तक उतर आई थी। “दीया,” उन्होंने बेटी को धीरे से आवाज़ दी, “वो पीतल की डिब्बी ला, जो अलमारी में सबसे ऊपर रखी है।”
दीया हैरान हुई, पर बिना कुछ पूछे ले आई। उस डिब्बी में सोने के दस छोटे सिक्के थे , दुकान का वह “सुरक्षित हिस्सा” जिसे कभी बेचा नहीं जाता, बुरे वक़्त के लिए रखा जाता है। रमणीकलाल ने उसमें से एक सिक्का निकाला, हथेली में इतनी देर तक दबाए रखा जैसे उसका वज़न अचानक बहुत बढ़ गया हो, और फिर सीढ़ियाँ उतर गए।
दीया ने दोपहर वाली बहीखाता को याद किया “देवजी भाई पटेल” और अब इस अजनबी बूढ़े आदमी को देखकर उसके भीतर वह अधूरा सवाल फिर से जाग उठा। उसने चुपचाप, बिना किसी को बताए, दुकान के दरवाज़े की ओट से देखना शुरू किया।
कंचनबेन ऊपर बालकनी से यह सब देख रही थीं, हाथ में दीये की थाली लिए। उन्होंने अपने पति को उस बूढ़े आदमी के पास झुकते देखा, कुछ कहते देखा जो नीचे तक सुनाई नहीं दिया। पास खड़े रमणीकलाल के होंठ हिले — “क्षमा करना” जैसा कुछ, इतना धीमा कि हवा भी उसे पूरी तरह नहीं ले जा सकी। बूढ़े आदमी की आँखें एक पल के लिए रमणीकलाल के चेहरे पर टिकीं, गहरी, थकी हुई, कुछ पहचानती हुई-सी और फिर उसने हथेली में सिक्का लिया, उसे मुट्ठी में भींचा, और बिना कुछ बोले, बिना धन्यवाद के एक शब्द के भी, अंधेरी गली में मुड़ गया।
दीया दरवाज़े की ओट से यह सब देख चुकी थी। उसने अपने पिता की आँखों में वह देखा जो किसी और ने नहीं देखा एक ऐसी उदासी, जो दान से नहीं, बल्कि किसी बहुत पुराने हिसाब से जुड़ी थी। उसने बहीखाता का वह नाम फिर याद किया, और अचानक, बिना किसी को कुछ कहे, उसे लगा जैसे बीस साल पुरानी कोई कहानी अभी-अभी उसकी आँखों के सामने अपना आख़िरी पन्ना पलट गई हो।
“देखा,” कंचनबेन ने ऊपर से बेटी को मुस्कुराकर कहा, जब रमणीकलाल सीढ़ियाँ चढ़कर लौटे, “तेरे बाबा का दिल कितना बड़ा है। इतनी भीड़ में, इतने काम में, फिर भी एक बूढ़े भिखारी को यूँ ही नहीं जाने दिया। दीपावली की असली रोशनी यही है, बेटा।”
रमणीकलाल कुछ नहीं बोले। वे सीढ़ियों के पास खड़े रहे, उस अंधेरी गली की तरफ़ देखते हुए जहाँ बूढ़ा आदमी अब दिखना बंद हो चुका था। उनके भीतर कोई हल्कापन नहीं उतरा था, जैसा पश्चाताप की कहानियों में होता है। एक सिक्का, चाहे वह कितना भी भारी क्यों न हो, बीस साल की टूटी हुई ज़िंदगी को वापस नहीं जोड़ सकता। वे जानते थे कि यह कोई मुक्ति नहीं थी, सिर्फ़ एक बोझ को थोड़ी देर के लिए कंधे बदलना था।
दीया ने आगे बढ़कर, बिना कुछ पूछे, अपने पिता का हाथ थाम लिया, वैसे ही जैसे कोई बच्चा किसी को गिरने से बचाने के लिए थामता है, बिना यह जाने कि गिरने वाला कौन है। उसने पिता की आँखों में देखा, और पिता ने बेटी की आँखों में और उस एक पल में, बिना एक शब्द कहे, मानो दोनों के बीच कुछ अनकहा तय हो गया कि यह बात यहीं दफ़्न रहेगी, इस गली की अंधेरी परछाइयों के साथ।
रात के नौ बजे, जब पूरा घर दीयों से जगमगा उठा था और आतिशबाज़ी की रोशनी आसमान में फूल की तरह खिल रही थी, घर में रिश्तेदारों की चहल-पहल भी बढ़ गई थी। कंचनबेन के भाई का परिवार, पड़ोस के दो-तीन बच्चे, सब मिलकर आँगन में पटाखे छुड़ा रहे थे, हँसी की आवाज़ें दीवारों से टकराकर लौट रही थीं। इसी हँसी और शोर के बीच, कंचनबेन ने आँगन की आख़िरी दीया जलाने की रस्म शुरू की वही दीया जो हर साल दीया के जन्म की याद में जलाया जाता था। हवा का एक हल्का झोंका आया और दीया बुझ गया।
कंचनबेन ने हँसकर उसे फिर से जलाया। “देखो,” उन्होंने कहा, “ये दीया हर साल एक बार बुझता है, और हर बार फिर जल उठता है। बस इसी तरह ज़िंदगी चलती है।”
रमणीकलाल ने वह जलता हुआ दीया देखा, और पहली बार उस रात उनकी आँखों में नमी आई, इस बात की ख़ुशी में नहीं कि दीया दोबारा जल उठा था, बल्कि इस डर में कि कुछ चीज़ें, एक बार बुझ जाने के बाद, चाहे जितनी बार फिर से जलाई जाएँ, अपनी पहली रोशनी कभी वापस नहीं पातीं।
गली में पटाखों की आवाज़ बढ़ती गई, और उस शोर में, अंधेरी गली के आख़िरी छोर पर, एक बूढ़ा आदमी अपनी मुट्ठी में एक सोने का सिक्का दबाए, बिना पीछे मुड़े, चुपचाप चलता चला गया।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243
“आख़िरी दीया” विश्वगाथा त्रैमासिक पत्रिका (गुजरात), अक्टूबर–दिसंबर अंक में प्रकाशित:





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