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हथकड़ी से हिसाब तक: टैक्स वसूली में भरोसे की परीक्षा

जीएसटी गिरफ़्तारी — व्यापारी के बहीखाते के पास रखी हथकड़ी

जीएसटी गिरफ़्तारी का प्रावधान हटाने का प्रस्ताव आज जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक की मेज़ पर है, और यह सिर्फ़ टैक्स कानून की एक धारा का मामला नहीं है। यह उस पुराने सवाल का नया रूप है कि राज्य अपने नागरिक को पहले कर्ज़दार मानता है या पहले अपराधी। किसी व्यापारी पर टैक्स बकाया हो, तो उससे पैसा वसूलना चाहिए या उसे हथकड़ी पहनानी चाहिए?

नई दिल्ली के भारत मंडपम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में बैठी परिषद के सामने जो प्रस्ताव हैं, वे पिछले नौ साल की जीएसटी व्यवस्था की सबसे बड़ी आत्म-स्वीकृति जैसे हैं। तय होना है कि क्या टैक्स अधिकारी के हस्ताक्षर भर से किसी को जेल भेजने का अधिकार ख़त्म होगा, और क्या आपराधिक मुक़दमे की सीमा एक करोड़ से बढ़ाकर पाँच करोड़ रुपये की जाएगी।

जीएसटी गिरफ़्तारी: प्रस्ताव में असल में क्या है

बिज़नेस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्ताव यह है कि जीएसटी कानून से अधिकारियों का गिरफ़्तारी का अधिकार पूरी तरह हटे। वसूली टैक्स, ब्याज और जुर्माने से हो। नौ अपराध पूरी तरह अपराध की श्रेणी से बाहर हों, चौबीस की सज़ा नरम हो, और न्यूनतम जेल की अनिवार्यता ख़त्म हो, ताकि अदालत चाहे तो सिर्फ़ जुर्माना लगा सके।

गंभीर धोखाधड़ी के मामले फिर भी अदालत तक जाएँगे, भारतीय न्याय संहिता के तहत। फ़र्क़ बस इतना होगा कि गिरफ़्तारी का फ़ैसला किसी विभागीय अफ़सर की क़लम से नहीं, न्यायिक अनुमति से होगा। साथ में दस हज़ार रुपये से कम के मामलों में नोटिस न भेजने और छोटे ऑनलाइन विक्रेताओं का पंजीकरण आसान करने के प्रस्ताव भी हैं।

पहली नज़र में यह कारोबारियों को दी गई राहत लगती है। पर इसके भीतर एक बड़ा सवाल छिपा है: जीएसटी गिरफ़्तारी का डर अब तक टैक्स चोरी रोक रहा था, या सिर्फ़ ईमानदार और बेईमान दोनों को एक ही लाठी से हाँक रहा था?

हथकड़ी से हिसाब तक: डर ने क्या दिया

याद रखना चाहिए कि जीएसटी से पहले के वैट शासन में गिरफ़्तारी का ऐसा प्रावधान नहीं था। जीएसटी ने एक देश, एक टैक्स का वादा किया, पर उसके साथ एक ऐसा अधिकार भी आया जो पहले राज्यों के कर विभागों के पास नहीं था। उसी के साथ शुरू हुआ वह दौर, जिसमें समन, तलाशी और गिरफ़्तारी की आशंका कारोबारी जीवन का हिस्सा बन गई।

फ़रवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राधिका अग्रवाल मामले में साफ़ कहा था कि जीएसटी और कस्टम्स में गिरफ़्तारी के लिए ठोस “विश्वास करने के कारण” ज़रूरी हैं, और गिरफ़्तारी की धमकी देकर टैक्स जमा कराना ग़लत है। अदालत को यह कहने की ज़रूरत पड़ी, यही बताता है कि ज़मीन पर क्या चल रहा था। कारोबारी संगठन बरसों से कहते रहे कि गिरफ़्तारी जाँच का औज़ार कम, जुर्माना निकलवाने का मोलभाव ज़्यादा बन गई है।

आँकड़े भी एक अलग कहानी कहते हैं। संसद में दिए गए सरकारी उत्तर के अनुसार 2024-25 में केंद्र और राज्य के जीएसटी अधिकारियों ने 25,009 फ़र्ज़ी फ़र्मों का पता लगाया, जिन्होंने 61,545 करोड़ रुपये का नकली इनपुट टैक्स क्रेडिट आगे बढ़ाया। इसी साल गिरफ़्तारियाँ हुईं 168, और ब्लॉक किए गए क्रेडिट से वसूली हुई 1,924 करोड़ रुपये।

यानी जीएसटी गिरफ़्तारी का प्रावधान रहते हुए भी फ़र्ज़ी बिलों का कारोबार फलता-फूलता रहा, और जितना नुकसान पकड़ा गया उसका छोटा-सा हिस्सा ही वापस आया। अगर हथकड़ी असली अपराधियों को नहीं रोक पाई, तो उसका डर आख़िर किस पर था? ज़्यादातर उन छोटे और मझोले व्यापारियों पर, जिनके पास न बड़े वकील हैं, न लंबी क़ानूनी लड़ाई की ताक़त।

दूसरा पक्ष: क्या धोखेबाज़ों को खुली छूट मिलेगी?

इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों की चिंता हल्की नहीं है। फ़र्ज़ी इनपुट टैक्स क्रेडिट कोई हिसाब की भूल नहीं, एक संगठित अपराध है। इसमें काग़ज़ी कंपनियाँ बनती हैं, ग़रीबों के आधार और पैन किराए पर लिए जाते हैं, और बिना एक भी माल हिले करोड़ों का क्रेडिट हवा में बेचा जाता है। ऐसे गिरोह के सरगना को अगर तुरंत न पकड़ा जाए, तो वह सबूत मिटाकर, फ़र्में बंद कर ग़ायब हो सकता है।

पाँच करोड़ की नई सीमा पर भी सवाल है। कोई चतुर धोखेबाज़ अपने घोटाले को कई छोटी फ़र्मों में बाँटकर हर एक को सीमा से नीचे रख सकता है। राज्यों के कर विभाग भी यह पूछ सकते हैं कि जब पुलिस पहले से कई तरह के मामलों के बोझ तले है, तो टैक्स धोखाधड़ी की जाँच को कितनी प्राथमिकता मिलेगी।

ये चिंताएँ जायज़ हैं, पर इनका जवाब हर व्यापारी के सिर पर जीएसटी गिरफ़्तारी की तलवार लटकाना नहीं है। इनका जवाब है बेहतर डेटा, तेज़ जाँच और ऐसी न्याय-व्यवस्था जो गंभीर मामलों में जल्दी वारंट दे सके। आज जीएसटी नेटवर्क के पास ई-इनवॉइस, ई-वे बिल और रिटर्न का इतना डेटा है कि फ़र्ज़ी बिलों की कड़ियाँ तकनीक से पकड़ी जा सकती हैं। जो सरकार डेटा का दावा करती है, उसे डर पर कम भरोसा करना चाहिए।

भरोसे का राज्य, जवाबदेह अफ़सर

मेरी राय में जीएसटी गिरफ़्तारी का अधिकार हटाना सही दिशा है, क्योंकि टैक्स मूलतः एक नागरिक और राज्य के बीच का हिसाब है, अपराधी और पुलिस के बीच का रिश्ता नहीं। जहाँ धोखा सच में अपराध है, वहाँ आम आपराधिक कानून है, अदालत है, वारंट है। हर विभाग को अपनी अलग पुलिस-शक्ति देना एक लोकतंत्र में संस्थाओं के संतुलन को बिगाड़ता है।

पर इस सुधार की असली परीक्षा कानून की किताब में नहीं, दफ़्तर की मेज़ पर होगी। उत्पीड़न सिर्फ़ गिरफ़्तारी की धारा से नहीं आता था, उस संस्कृति से आता था जिसमें अफ़सर पर कोई जवाबदेही नहीं होती। अगर हथकड़ी हटी और उसकी जगह बेहिसाब नोटिस, महीनों रुका रिफ़ंड और खाते फ़्रीज़ करने की मनमानी आ गई, तो डर का रूप बदलेगा, डर नहीं जाएगा। इसलिए हर ग़लत या बदनीयत कार्रवाई के लिए अफ़सर की ज़िम्मेदारी तय करने का तंत्र भी उतना ही ज़रूरी है। परीक्षक की परीक्षा कौन लेगा, यह सवाल मैंने एक और संदर्भ में उठाया था, और वह यहाँ भी उतना ही लागू होता है।

एक और बात। यह राहत उसी व्यापारी तक पहुँचनी चाहिए जो सबसे कमज़ोर है। बड़ी कंपनियों के पास कर-सलाहकारों की फ़ौज होती है, उन्हें गिरफ़्तारी से उतना डर कभी नहीं था। डर उस किराना व्यापारी, छोटे निर्माता और ऑनलाइन बेचने वाले युवा उद्यमी को था, जिसकी पूरी पूँजी एक नोटिस में अटक जाती है। जब महंगाई और महँगे कर्ज़ पहले ही छोटे कारोबार की कमर तोड़ रहे हों, तब काग़ज़ी उत्पीड़न का बोझ हटना एक वास्तविक राहत होगी।

जीएसटी गिरफ़्तारी के बाद का भारत

अगर परिषद यह प्रस्ताव मानती है, तो इसका असर जीएसटी से आगे जाएगा। यह 2023 के जन विश्वास कानून वाली उस सोच को आगे बढ़ाएगा, जिसमें छोटी चूक को अपराध नहीं, सुधार योग्य ग़लती माना गया। एक ऐसे देश में जहाँ रुपये की कमज़ोरी और वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशक भरोसा ढूँढ़ रहे हैं, यह संदेश मायने रखता है कि राज्य अपने कारोबारियों को संदिग्ध नहीं, साझेदार मानता है।

पर भरोसा एकतरफ़ा नहीं होता। सरकार भरोसा दिखाए, तो कारोबारियों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे फ़र्ज़ी बिलों के बाज़ार से दूरी बनाएँ, और उद्योग संगठन अपने भीतर के धोखेबाज़ों को बचाने के बजाय उन्हें उजागर करें। राहत को अधिकार मान लेने और ज़िम्मेदारी भूल जाने से अगली बार वही हथकड़ी नए नाम से लौट आएगी।

जीएसटी गिरफ़्तारी का प्रावधान हटाना एक धारा मिटाना भर नहीं है। यह उस राज्य की ओर एक क़दम है जो नागरिक से पहले हिसाब माँगता है, सज़ा बाद में देता है। नौ साल बाद अगर सरकार मान रही है कि हथकड़ी सही औज़ार नहीं थी, तो अगला सवाल अपने-आप खड़ा होता है: उन नौ बरसों में जिन ईमानदार व्यापारियों ने यह डर झेला, उनका हिसाब कौन देगा?

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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