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जब एफआईआर ‘पदक’ बन जाए, सवाल कौन पूछेगा?

चुनाव आयोग पर सवाल उठाता सुनहरा पदक और मतपेटी का प्रतीकात्मक चित्र — रविकान्त राऊत का संपादकीय

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठा सवाल इस हफ़्ते दिल्ली की सड़कों तक पहुँच गया, पर सड़क पर पहुँचते-पहुँचते वह सवाल किसी और ही चीज़ में बदल गया।

जंतर-मंतर पर बैरिकेड चढ़ते हुए राहुल गांधी की तस्वीर, सड़क पर लेटे सांसदों को खींचकर हटाती पुलिस, प्रियंका गांधी वाड्रा का यह दावा कि उन्हें धकेला और खरोंचा गया – इन तीन दिनों की यह तस्वीरें टीवी पर खूब चलीं। और फिर आया वह जुमला, जो शायद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे यादगार हिस्सा बन गया: “हर एफआईआर मेरे लिए एक पदक है, मेरे पास अभी पैंतालीस हैं, मुझे सौ चाहिए।” तालियां बजीं, हैशटैग ट्रेंड हुए, और असली सवाल — चुनाव आयोग निष्पक्ष है या नहीं — धीरे-धीरे पीछे खिसक गया।

चुनाव आयोग पर सवाल झूठा नहीं है

यह दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि सवाल झूठा नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग किसी सनक से नहीं उठी। जून 2025 से चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर जो आपत्तियां विपक्ष उठा रहा है, वे काफी हद तक ज़मीनी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भले इस अभियान को कानूनी तौर पर वैध ठहराया हो, पर साथ ही यह भी साफ कहा कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है।

इसके बावजूद भाजपा शासित कई राज्यों से खबरें आई हैं कि सूची से नाम हटने के बाद लोगों के राशन कार्ड रद्द हुए, पासपोर्ट रिन्यूअल में पुलिस ने आड़े हाथ लिए। मतलब यह कागज़ी कसरत नहीं है — इसका सीधा असर किसी गरीब, किसी मजदूर, किसी बुज़ुर्ग के नागरिक अस्तित्व पर पड़ रहा है। और जब दो सौ चालीस सांसद मिलकर आयोग से मिलना चाहें, और आयोग इसे “असामान्य” कहकर टाल दे – तो सवाल और गहरा होता है: आखिर एक संवैधानिक संस्था आम जनप्रतिनिधियों से बात करने से क्यों कतरा रही है?

जब तमाशा तथ्य को निगल ले

मगर यहीं से विपक्ष की रणनीति कमजोर पड़ने लगती है। किसी संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाना एक गंभीर संवैधानिक मसला है, जिसे संसद में बहस, सुप्रीम कोर्ट में याचिका, आंकड़ों की पड़ताल और महाभियोग जैसी वैधानिक प्रक्रिया से लड़ा जाना चाहिए था। इसके बजाय यह लड़ाई बैरिकेड कूदने, पुलिस से भिड़ने और गिरफ्तारियों की गिनती बताने तक सिमट गई।

जब राहुल गांधी अपनी प्राथमिकियों की संख्या को तमगे की तरह गिनाते हैं, तो वे अनजाने में ही पूरे मसले को अपने बनाम ज्ञानेश कुमार के निजी टकराव में बदल देते हैं। टीवी बहस इस पर होने लगती है कि पुलिस ने प्रियंका गांधी को धकेला या नहीं, कोई यह नहीं पूछता कि आखिर सूची से हटाए गए लाखों नामों की सच्चाई क्या है, उनकी स्वतंत्र जांच कौन करेगा। तमाशे ने तथ्य को निगल लिया है।

चुनाव आयोग का बंद दरवाज़ा

दूसरी तरफ सरकार और आयोग का रुख भी कम निराशाजनक नहीं। किसी लोकतांत्रिक संस्था की साख इस बात से बनती है कि वह असहमति से कैसे निपटती है, न कि इस बात से कि वह कितनी बार “हम स्वतंत्र हैं” कहती है। दो सौ चालीस निर्वाचित प्रतिनिधियों की मुलाकात की मांग को “असामान्य” बताकर टाल देना, और इसके बदले सबसे वरिष्ठ अधिकारी से ज्ञापन लेने की पेशकश करना – यह बात संवाद से बचने की चेष्टा ज़्यादा लगती है, पारदर्शिता कम। अगर आयोग को सच में कुछ छिपाना नहीं है, तो मिलने से इनकार किस बात का डर है?

असल मुद्दा यह है कि भारत में संस्थागत निष्पक्षता के संकट अक्सर इसी तरह निपटाए जाते हैं – एक पक्ष सड़क पर नाटक करता है, दूसरा पक्ष दरवाज़ा बंद करके बैठ जाता है, और बीच में जो नागरिक अपना वोट देने के अधिकार से बेदखल हो चुका है, उसकी आवाज़ कहीं खो जाती है। न विपक्ष को यह याद रहता है कि उसका काम सिर्फ फुटेज बनाना नहीं, सबूत जुटाना है; न सत्ता पक्ष को यह समझ आता है कि चुप्पी भी एक तरह की स्वीकारोक्ति होती है।

आगे का रास्ता: बैरिकेड नहीं, सबूत

अगर विपक्ष वाकई इस लड़ाई को गंभीरता से लेना चाहता है, तो रास्ता साफ है – हर हटाए गए नाम का ज़िला-वार, बूथ-वार आंकड़ा सार्वजनिक हो, स्वतंत्र पर्यवेक्षकों से इसकी जांच हो, और संसद की संयुक्त समिति इसकी सुनवाई करे। यह काम बैरिकेड पर चढ़कर नहीं, आरटीआई और रिपोर्ट कार्ड से होगा। और चुनाव आयोग अगर वास्तव में तटस्थ दिखना चाहता है, तो उसे असहमति से डरने की जगह उसका सामना करना सीखना होगा – एक बैठक से इनकार करना सबसे ज़्यादा यही संदेश देता है कि डर किस तरफ है।

जब तक यह बहस सिर्फ गिरफ्तारियों की गिनती और टीवी पर गुस्से के प्रदर्शन तक सिमटी रहेगी, तब तक असली हारेगा वह मतदाता, जिसका नाम सूची से गायब है और जिसे पता भी नहीं कि क्यों। पदक गिनने से लोकतंत्र नहीं बचता, सवाल पूछने से बचता है – और अभी सवाल पूछने वाला कोई नहीं दिख रहा।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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