देश में साइबर ठगी अब किसी इक्का-दुक्का बदक़िस्मत की कहानी नहीं रह गई है। अपने आसपास ही नज़र डालिए। किसी रिटायर्ड शिक्षक को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर दो दिन वीडियो कॉल पर बंधक रखा गया। किसी छोटे दुकानदार का खाता “KYC अपडेट” वाले एक लिंक से ख़ाली हो गया। किसी कॉलेज के लड़के ने कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता किराये पर दे दिया।
इन सब कहानियों का अंत लगभग एक-सा होता है। पुलिस थाने में शिकायत दर्ज होती है, बैंक “हम जाँच करेंगे” कहता है, और कुछ हफ़्तों बाद ठगे गए आदमी को समझा दिया जाता है कि भुगतान तो उसने ख़ुद मंज़ूर किया था। पैसा गया, और साथ में यह सबक भी थमा दिया गया कि ग़लती उसी की थी।
साइबर ठगी पर इस हफ़्ते की बहस
इसी हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने GSMA बोर्ड के साथ बैठक में और फिर इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 के मंच से साइबर धोखाधड़ी और डीपफ़ेक को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा वैश्विक नियमों की बात कही। उनका कहना था कि यह अपराध सरहदें नहीं मानता, इसलिए सरकारों, टेलीकॉम कंपनियों, टेक कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। उसी दिन IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि AI नियमन पर एक consultation paper एक महीने में आएगा।
बात सही है, और समय पर भी है। पर इसी दिन की एक और ख़बर बताती है कि समस्या की जड़ सिर्फ़ सरहद-पार नहीं है। गुजरात साइबर पुलिस ने 27 साल के एक युवक को पकड़ा, जिसके ज़रिए 79 म्यूल खातों में करीब 11.03 करोड़ रुपये घुमाए गए। इस मामले में 18 राज्यों से 53 शिकायतें जुड़ी हैं। ये खाते किसी विदेशी सर्वर पर नहीं खुले थे। ये हमारे ही बैंकों में, हमारे ही KYC नियमों के तहत खुले थे।
असली सवाल: नुक़सान का बोझ किसके कंधे पर?
तो असली सवाल यह नहीं कि साइबर ठगी रोकने के लिए दुनिया एकजुट हो या नहीं। असली सवाल यह है कि जब ठगी हो जाए, तो उसका नुक़सान कौन उठाए। आज भारत में इसका जवाब लगभग हमेशा एक ही है: वह ग्राहक, जो सबसे कमज़ोर कड़ी है और जिसके पास न तकनीकी जानकारी है, न क़ानूनी ताक़त।
हमारी व्यवस्था ने डिजिटल भुगतान को जितनी तेज़ी से घर-घर पहुँचाया, उतनी तेज़ी से उसके जोखिम का बँटवारा नहीं किया। UPI ने लेन-देन को एक सेकंड का बना दिया। पर उस एक सेकंड में अगर कोई ठगा जाए, तो उसकी भरपाई की ज़िम्मेदारी किसकी है, यह आज भी धुँधला है। जोखिम नीचे खिसका दिया गया, और मुनाफ़ा ऊपर रह गया। यह वही पुराना पैटर्न है जिस पर मैंने गिरते रुपये के बिल के बारे में लिखते हुए भी सवाल उठाया था।
साइबर ठगी के आँकड़े क्या कहते हैं
गृह मंत्रालय ने संसद में बताया था कि 2024 में नागरिकों ने साइबर ठगी में 22,845 करोड़ रुपये गँवाए, जबकि 2023 में यह रक़म 7,465 करोड़ थी। यानी एक साल में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई। वित्तीय साइबर अपराध की शिकायतें 20.6 लाख से बढ़कर 36.37 लाख तक पहुँच गईं।
सरकार ने कुछ अच्छे काम भी किए हैं, और उन्हें मानना चाहिए। उसी जवाब के मुताबिक़ 1930 हेल्पलाइन और CFCFRMS प्रणाली से 2024 में 17.8 लाख शिकायतों में 5,489 करोड़ रुपये बचाए गए। I4C की संदिग्ध रजिस्ट्री ने करीब 24 लाख म्यूल खातों की पहचान की। पर 22,845 करोड़ के सामने 5,489 करोड़ का मतलब यह भी है कि ज़्यादातर पैसा लौटकर नहीं आया।
अब इसके बरक्स RBI की तस्वीर देखिए। RBI की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार कार्ड, नेटबैंकिंग और डिजिटल भुगतान से जुड़ी धोखाधड़ी के केवल 293 मामले दर्ज हुए, जिनमें 29 करोड़ रुपये शामिल थे। दोनों आँकड़ों की परिभाषाएँ अलग हैं, यह सच है। पर हज़ारों करोड़ और 29 करोड़ के बीच की यह खाई ख़ुद एक कहानी कहती है। बैंकों के बही-खाते में साइबर ठगी लगभग दिखती ही नहीं, क्योंकि ज़्यादातर मामलों में भुगतान “ग्राहक ने ख़ुद मंज़ूर” किया होता है।
RBI का 2017 का नियम कहता है कि अगर कोई अनधिकृत लेन-देन बैंक या सिस्टम की कमी से हुआ हो, या ग्राहक तीन दिन के भीतर सूचना दे दे, तो ग्राहक की देनदारी शून्य होगी। सुनने में यह अच्छा लगता है। पर आज की साइबर ठगी ज़्यादातर “अनधिकृत” होती ही नहीं। ठग ग्राहक से ही OTP बताने को कहता है, उसी से QR कोड स्कैन करवाता है, उसी से पैसे “सुरक्षित खाते” में भिजवाता है। काग़ज़ पर यह भुगतान ग्राहक का अपना फ़ैसला दर्ज होता है।
यानी क़ानून चोरी से तो बचाता है, पर धोखे से नहीं। और धोखा ही आज का मुख्य हथियार है। जिस बुज़ुर्ग को डर दिखाकर दो दिन वीडियो कॉल पर रोके रखा गया, उसकी “मंज़ूरी” को सचमुच मंज़ूरी कहना, शब्दों के साथ बेईमानी है।
दूसरा पक्ष भी सुनना ज़रूरी
बैंकों का तर्क हल्का नहीं है। अगर हर ठगी का पैसा बैंक लौटाने लगें, तो लापरवाही बढ़ सकती है। कुछ लोग मिलीभगत करके झूठे दावे भी कर सकते हैं। फिर उस बोझ की क़ीमत आख़िर में सभी ग्राहकों से फ़ीस के रूप में वसूली जाएगी। छोटे बैंक और नए फ़िनटेक इस बोझ से दब भी सकते हैं।
यह चिंता जायज़ है, पर इसका हल मौजूद है, और दुनिया ने उसे आज़माया भी है। ब्रिटेन में 7 अक्टूबर 2024 से नियम लागू है कि ऐसे “मंज़ूर किए गए” धोखे के शिकार ग्राहकों को बैंक 85,000 पाउंड तक लौटाएँगे। ब्रिटेन के पेमेंट सिस्टम्स रेगुलेटर के इस ढाँचे में आधी रक़म उस बैंक को देनी होती है जिसमें ठग का खाता था। गंभीर लापरवाही और धोखेबाज़ दावों के लिए अपवाद रखे गए हैं।
इस एक प्रावधान का असर देखिए। जिस बैंक में म्यूल खाता खुला, उसकी जेब से पैसा जाता है। अचानक KYC की ढिलाई महँगी पड़ने लगती है। हमारे यहाँ गुजरात जैसे मामलों में 79 म्यूल खाते खोलने वाले बैंकों पर कोई आर्थिक ज़िम्मेदारी नहीं आती। यही वह कड़ी है जिस पर भरोसे की पूरी व्यवस्था टिकी है, जैसा मैंने टैक्स वसूली में भरोसे की परीक्षा पर लिखते हुए कहा था।
साइबर ठगी से लड़ाई: जागरूकता काफ़ी नहीं
मेरा मानना साफ़ है। साइबर ठगी के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई अब तक लगभग पूरी तरह “जागरूकता” पर टिकी रही है। कॉलर ट्यून में चेतावनी, SMS में चेतावनी, विज्ञापनों में चेतावनी। जागरूकता ज़रूरी है, पर यह ज़िम्मेदारी को नागरिक की ओर धकेलने का एक सुविधाजनक तरीक़ा भी बन गई है। जब संदेश यह हो कि “सावधान रहिए”, तो ठगी होने पर निष्कर्ष अपने-आप निकल आता है कि आप सावधान नहीं थे।
जो संस्था पैसा रखती है, खाते खोलती है, SIM जारी करती है, और लेन-देन से कमाती है, सबसे बेहतर जोखिम-प्रबंधन भी वही कर सकती है। उसके पास डेटा है, तकनीक है, असामान्य लेन-देन पकड़ने के औज़ार हैं। RBI का MuleHunter.AI जैसा प्रयोग इसी दिशा में एक क़दम है। पर औज़ार तभी असरदार होते हैं, जब उन्हें न चलाने की क़ीमत चुकानी पड़े।
इसलिए भारत को तीन काम करने चाहिए। पहला, धोखे से करवाए गए भुगतान के लिए एक तय सीमा तक भरपाई का स्पष्ट नियम बने। दूसरा, म्यूल खाता खोलने वाले बैंक और फ़र्ज़ी SIM जारी करने वाली टेलीकॉम कंपनी पर साझा आर्थिक ज़िम्मेदारी तय हो। तीसरा, शिकायत के निपटारे की समय-सीमा तय हो, ताकि पीड़ित महीनों दफ़्तरों के चक्कर न काटे।
डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी पूँजी तकनीक नहीं, भरोसा है। एक चायवाला QR कोड इसलिए लगाता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि पैसा पहुँचेगा। एक बुज़ुर्ग पेंशन मोबाइल पर इसलिए देखता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि खाता सुरक्षित है। हर अनसुलझी साइबर ठगी इस भरोसे में एक छोटी दरार डालती है। जब लाखों दरारें जुड़ती हैं, तो लोग नक़दी की ओर लौटने लगते हैं, या डर के मारे डिजिटल दुनिया से ही बाहर रह जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बात अच्छी है। पर दुनिया से नियम माँगने से पहले हमें अपने घर का एक सीधा नियम तय करना होगा: जो व्यवस्था लेन-देन से कमाती है, वह उसके जोखिम से भाग नहीं सकती। जब तक साइबर ठगी का बिल अकेले ठगे गए आदमी के नाम कटता रहेगा, तब तक हम ठगों से नहीं लड़ रहे। हम सिर्फ़ ठगी के शिकार लोगों को सावधान रहने का उपदेश दे रहे हैं।
अगर आप या आपका कोई परिचित साइबर ठगी का शिकार हुआ है, तो तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। पहले कुछ घंटे सबसे क़ीमती होते हैं।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243


एक टिप्पणी