किशोर न्याय का असली इम्तिहान अदालत के भाषणों में नहीं, उस पंद्रह साल के लड़के के इंतज़ार में होता है जो महीनों से एक बोर्ड के सामने अगली तारीख़ गिन रहा है। उसका मामला छोटा हो सकता है, ग़लती गंभीर भी हो सकती है। पर जिस क़ानून ने उससे सुधार का वादा किया था, वह उसे अब तक सिर्फ़ तारीख़ें दे पाया है।
इसी 10-11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति ने UNICEF के साथ मिलकर किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर एक राष्ट्रीय परामर्श किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बच्चों के लिए प्रशिक्षित बचाव वकीलों की एक अलग टुकड़ी बनाने का सुझाव दिया। और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने वह बात कह दी जो आम तौर पर ऐसे समारोहों में नहीं कही जाती: यह क़ानून ज़मीन पर अब भी बड़े हिस्से में सिर्फ़ काग़ज़ पर है।
सालगिरह का मौक़ा अक्सर उपलब्धियाँ गिनाने का होता है। पर इस बार देश की सबसे बड़ी अदालत ने खुद आईना उठाया है। सवाल यह है कि क्या हम उसमें देखने को तैयार हैं।
किशोर न्याय का वादा क्या था
2015 का यह क़ानून एक ग़ुस्से की कोख से निकला था। दिसंबर 2012 की दिल्ली की उस भयावह घटना में एक आरोपी नाबालिग था, और जब वह तीन साल बाद सुधार गृह से बाहर आया, तो देश भर में आक्रोश था। उसी माहौल में नया अधिनियम आया, जिसने 16 से 18 साल के किशोरों को जघन्य अपराधों में “प्रारंभिक आकलन” के बाद वयस्क की तरह मुक़दमे का रास्ता खोल दिया।
पर उसी क़ानून में एक दूसरा, कहीं बड़ा वादा भी था, जिस पर उतनी बहस नहीं हुई। किशोर न्याय की पूरी इमारत इस विचार पर खड़ी है कि बच्चा अपराधी नहीं, “विधि से संघर्षरत बालक” है, और राज्य का काम उसे सज़ा देना नहीं, वापस समाज में लौटाना है। इसके लिए हर ज़िले में किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति, निरीक्षण वाली बाल देखरेख संस्थाएँ और समयबद्ध जाँच का ढाँचा बनाया गया। क़ानून कहता है कि जाँच आम तौर पर चार महीने में पूरी हो जानी चाहिए।
यानी 2015 का अधिनियम दो चेहरों वाला था: एक सख़्ती का, जो सुर्ख़ियों में रहा, और एक संवेदना का, जो चुपचाप पीछे छूट गया।
आँकड़े क्या बताते हैं
पीछे छूटने की कहानी आँकड़ों में साफ़ दिखती है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के नवंबर 2025 के अध्ययन के मुताबिक़ 31 अक्टूबर 2023 तक 362 किशोर न्याय बोर्डों के सामने आए 1,00,904 मामलों में से 55 प्रतिशत लंबित थे। ओडिशा में यह अनुपात 83 प्रतिशत तक था, और सबसे बेहतर कर्नाटक में भी 35 प्रतिशत। मोटे तौर पर पचास हज़ार से ज़्यादा बच्चे फ़ैसले के इंतज़ार में थे।
ढाँचे की हालत भी बहुत अलग नहीं है। देश के 92 प्रतिशत ज़िलों में बोर्ड तो बन गए, पर हर चार में से एक बोर्ड पूरी पीठ के बिना चल रहा था। करीब 30 प्रतिशत बोर्डों के साथ कोई कानूनी सहायता क्लिनिक नहीं था। चौदह राज्यों और जम्मू-कश्मीर में 18 साल पार कर चुके उन किशोरों के लिए “सुरक्षित स्थान” तक नहीं थे, जिनका मामला अभी चल रहा है।
सबसे चिंताजनक तस्वीर बाल देखरेख संस्थाओं की है। रिपोर्ट के अनुसार 166 संस्थाओं में जितने निरीक्षण होने चाहिए थे, उनमें से आधे से भी कम हुए: 1,992 के मुक़ाबले सिर्फ़ 810। और यह सब जानकारी भी किसी राष्ट्रीय डेटाबेस से नहीं, सैकड़ों RTI आवेदनों से जुटानी पड़ी, क्योंकि किशोर न्याय पर कोई एकीकृत राष्ट्रीय डेटा व्यवस्था है ही नहीं। जिस व्यवस्था की गिनती ही न हो, उसकी जवाबदेही कैसे तय होगी?
यहाँ यह कह देना आसान होगा कि सरकारें लापरवाह हैं और बात ख़त्म। पर तस्वीर इतनी सरल नहीं। किशोर न्याय बोर्ड में एक मजिस्ट्रेट के साथ दो सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य होते हैं, और कई राज्यों में ये पद महीनों ख़ाली रहते हैं, क्योंकि मानदेय कम है और काम भारी। प्रारंभिक आकलन के लिए मनोवैज्ञानिक चाहिए, जो ज़िला स्तर पर मिलते ही नहीं। पुलिस का बड़ा हिस्सा आज भी बच्चे से वैसे ही पूछताछ करता है जैसे किसी आदतन अपराधी से।
यानी समस्या सिर्फ़ इच्छाशक्ति की नहीं, क्षमता की भी है। और क्षमता पैसे, प्रशिक्षण और प्राथमिकता से बनती है। मुख्य न्यायाधीश का पुलिस और बोर्ड सदस्यों के संयुक्त प्रशिक्षण का सुझाव इसी कमी की ओर इशारा करता है।
दूसरा पक्ष: सख़्ती की माँग
ईमानदारी से कहें तो समाज का एक बड़ा तबका किशोर न्याय को “अपराधियों के लिए नरमी” की तरह देखता है। 2024 में पुणे की पोर्श कार दुर्घटना में, जब नाबालिग आरोपी को कुछ ही घंटों में ज़मानत और सड़क सुरक्षा पर निबंध लिखने की शर्त मिली, तो लोगों का ग़ुस्सा जायज़ था। उस मामले ने दिखाया कि रसूख़ वाले परिवार इस क़ानून की नरमी का इस्तेमाल ढाल की तरह कर सकते हैं।
इस तर्क में दम है, और इसे ख़ारिज नहीं करना चाहिए। पर इसका निष्कर्ष उलटा निकाला जाता है। पुणे जैसा मामला अपवाद है, जिसमें पैसा और पहुँच दोनों थे। बोर्डों के सामने खड़े ज़्यादातर बच्चे ग़रीब, कम पढ़े, टूटे परिवारों से आते हैं, जिनके पास न वकील है, न ज़मानत भरने वाला। उनके लिए समस्या नरमी नहीं, अनदेखी है। जैसे साइबर ठगी में नुकसान का बोझ आख़िर में सबसे कमज़ोर पर गिरता है, वैसे ही व्यवस्था की देरी की कीमत भी वही बच्चा चुकाता है जिसकी आवाज़ सबसे धीमी है।
सख़्ती बनाम संवेदना की यह बहस दरअसल ग़लत सवाल पर टिकी है। असली सवाल यह है कि क्या व्यवस्था किसी भी बच्चे के साथ, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, समय पर और गंभीरता से पेश आ रही है। पुणे में जल्दबाज़ी नाइंसाफ़ी थी, और ओडिशा में 83 प्रतिशत लंबित मामले भी नाइंसाफ़ी हैं।
किशोर न्याय को काग़ज़ से ज़मीन तक कैसे लाएँ
मेरी समझ में किशोर न्याय की विफलता किसी एक धारा की नहीं, उस सोच की है जो बच्चों के मामलों को अदालती व्यवस्था का “छोटा” हिस्सा मानती है। जज बड़े मामलों से नापे जाते हैं, पुलिस बड़ी गिरफ़्तारियों से, और नेता बड़ी घोषणाओं से। एक किशोर का पुनर्वास किसी की उपलब्धि की सूची में नहीं आता, इसलिए वह किसी की प्राथमिकता भी नहीं बनता।
पहला कदम गिनती है। सुप्रीम कोर्ट के इस परामर्श में मुख्य न्यायाधीश ने यह स्वतंत्र आकलन करने की बात कही कि कितने किशोर सच में अपनी ज़िंदगी दोबारा बना पाए। यह सवाल आज तक किसी ने व्यवस्थित ढंग से पूछा ही नहीं। एक राष्ट्रीय, सार्वजनिक डैशबोर्ड, जिसमें हर बोर्ड की लंबित संख्या, ख़ाली पद और निरीक्षण दिखें, उतना ही ज़रूरी है जितना अदालतों का राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड।
दूसरा कदम लोग हैं: बोर्ड के सदस्य पूर्णकालिक और ठीक मानदेय वाले हों, हर बोर्ड से कानूनी सहायता जुड़ी हो, और बच्चों के लिए प्रशिक्षित बचाव वकीलों की अलग टुकड़ी बने। तीसरा कदम बाद की ज़िंदगी है। सुधार गृह से निकलने के बाद अगर किशोर के पास न पढ़ाई का रास्ता है, न हुनर और रोज़गार का, तो वह उसी गली में लौटेगा जहाँ से आया था।
आगे क्या दाँव पर है
भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, और हम इसे अपनी सबसे बड़ी ताक़त कहते नहीं थकते। पर जिस देश में भटके हुए किशोर को लौटाने की व्यवस्था बरसों की तारीख़ों में उलझी हो, वहाँ यह ताक़त किसी दिन बोझ भी बन सकती है। किशोर न्याय सिर्फ़ अपराध का विषय नहीं, जनसांख्यिकी और भविष्य का भी विषय है।
दस साल पहले हमने ग़ुस्से में एक क़ानून बनाया था। उसका सख़्त हिस्सा तुरंत लागू हो गया, क्योंकि सख़्ती सस्ती पड़ती है। संवेदना वाला हिस्सा आज भी इंतज़ार में है, क्योंकि संवेदना पर पैसा, धैर्य और ईमानदारी तीनों लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बार अपने ही क़ानून की कमियाँ खुलकर गिनाई हैं, यह शुभ संकेत है। पर परामर्श के सुझाव आदेश नहीं हैं। उन्हें राज्यों और ज़िलों तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी अब सरकारों की है। किसी समाज की परख इस बात से नहीं होती कि वह अपने सबसे अच्छे बच्चों के साथ कैसा बर्ताव करता है। परख इस बात से होती है कि वह उस बच्चे के साथ क्या करता है जिससे ग़लती हो गई। अभी तक हमारा जवाब है: इंतज़ार।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

