आज पूरे दिन किसी ने मुझे नहीं देखा। मैं सड़क पर चला — लोग टकराए नहीं। दुकान में गया — दुकानदार ने पूछा नहीं। ऑफिस पहुँचा — मेरी कुर्सी पर कोई और बैठा था।
मैंने कहा: “यह मेरी सीट है।”
उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं। जैसे आवाज़ हवा में घुल गई। पहले मुझे लगा मज़ाक है। फिर प्रयोग। फिर डर।
मैंने हाथ हिलाया। लोगों के सामने खड़ा हुआ।
मोबाइल लहराया। कुछ नहीं।
मैं मौजूद था — लेकिन किसी की दुनिया में नहीं।
अदृश्य होना फिल्मों में रोमांचक लगता है। असल में वह बेहद शांत त्रासदी है। क्योंकि अस्तित्व का आधा हिस्सा देखे जाने में है।
दोपहर तक मुझे समझ आ गया — मैं गायब नहीं हुआ हूँ।
मैं वही बन गया हूँ जो मैं वर्षों से बनने की कोशिश कर रहा था।
अनदेखा।
मुझे याद आया — मीटिंग में मैं अक्सर चुप रहता था। दोस्तों के बीच अपनी बात रोक लेता था। रिश्तों में आसान बनने के लिए
खुद को छोटा कर लेता था।
धीरे-धीरे मैंने दुनिया को सिखा दिया: “मुझे मत देखो।”
और दुनिया ने आज वह पाठ पूरा सीख लिया।
मैं पार्क में बैठ गया। एक बच्चा मेरे सामने गेंद लेकर आया। गेंद मेरे पैर से टकराई। उसने ऊपर देखा।
सीधा मेरी आँखों में। और बोला — “अंकल, बॉल देंगे?”
मैंने गेंद उठाई। हाथ काँप रहा था।
“तुम मुझे देख सकते हो?” मैंने पूछा।
बच्चा हँसा – “आप यहीं तो बैठे हो।”
उसने गेंद ली और भाग गया।
मैंने आसपास देखा। बाकी सब लोग अब भी मुझे नहीं देख रहे थे।
तभी समझ आया — अदृश्यता उम्र के साथ आती है।
बच्चे अभी मुखौटे नहीं पहचानते। वे चेहरों को देखते हैं।
बड़े लोग भूमिकाएँ देखते हैं। और मैंने इतनी मेहनत से “सुविधाजनक आदमी” का मुखौटा पहना था कि उसके पीछे का चेहरा गायब हो गया।
शाम को घर लौटा। आईने के सामने खड़ा हुआ।
पहली बार डर लगा — अगर आईना भी मुझे न देखे?
लेकिन आईने में मैं था।
थका हुआ। हल्का पारदर्शी। लेकिन मौजूद।
मैंने धीरे से कहा: “मैं यहाँ हूँ।”
कमरे ने जवाब नहीं दिया।
लेकिन भीतर किसी ने दिया।
और वह आवाज़ साफ़ थी- “तो दिखो।”
अगले दिन ऑफिस गया। मीटिंग में पहली बार हाथ उठाया।
दिल तेज़ था। मैंने कहा: “मैं असहमत हूँ।”
कमरा शांत हो गया। सबने मेरी तरफ देखा। सचमुच देखा।
उस क्षण अदृश्यता टूट गई।
मैं वापस आ गया।
शायद नायक बनने का पहला कदम तलवार उठाना नहीं है।
सिर्फ इतना है — कमरे में खड़े होकर कहना: “मैं मौजूद हूँ।”
और दुनिया धीरे-धीरे तुम्हें मान लेती है।
