6-प्रतीक्षा का मुखौटा

उस दिन मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था। ट्रेन पैंतीस मिनट लेट थी। बोर्ड पर लिखा था — “प्रतीक्षा करें।” जैसे यह कोई सूचना नहीं, बल्कि जीवन का एकमात्र निर्देश हो।

मेरे बगल में एक बूढ़ी औरत बैठी थी जो एक पीली साड़ी पहने हुए थी और उसके हाथ में एक पुरानी घड़ी थी जो बंद पड़ी थी। वह घड़ी देखती रहती थी। बार-बार। जैसे समय उसके लिए चल भी रहा हो और रुका भी हो — दोनों एक साथ।

मैंने सोचा — क्या वह किसी का इंतज़ार कर रही है, या इंतज़ार करना ही उसका अस्तित्व बन चुका है?
और फिर मुझे अहसास हुआ — मैं भी तो यही कर रहा हूँ। हमेशा से।
मेरे पास एक मुखौटा है जिसे मैं “धैर्यवान” कहता हूँ।
यह बड़ा सुंदर मुखौटा है। इस पर कोई रेखा नहीं, कोई शिकन नहीं। जो भी इसे देखता है, कहता है — “वाह, यह इंसान कितना शांत है।”
लेकिन मुखौटे के पीछे जो चेहरा है, वह जानता है सच्चाई।
वह जानता है कि धैर्य और थकान में बस एक पतली-सी दीवार होती है। और कभी-कभी रात के तीन बजे वह दीवार इतनी पारदर्शी हो जाती है कि दोनों एक ही लगने लगते हैं।

प्लेटफ़ॉर्म पर एक कुत्ता आया। भूरे रंग का, दुबला-पतला।
वह किसी का नहीं था — या शायद सबका था। उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में न भूख थी, न याचना। बस एक अजीब-सी पहचान थी। जैसे वह कह रहा हो — “तू भी?”
मैंने उसे बिस्किट का एक टुकड़ा दिया।
उसने लिया। और चला गया।
बिना धन्यवाद के। बिना पीछे मुड़े।
मुझे उससे ईर्ष्या हुई।

ट्रेन आई। भीड़ उमड़ी। वह बूढ़ी औरत उठी और भीड़ में खो गई।
उसने अपनी बंद घड़ी को एक बार और देखा — जाते-जाते।
मैं सोचता रहा — उस घड़ी में कौन-सा वक़्त रुका हुआ है? कोई बिछड़ा हुआ? कोई चला गया हुआ पल? या वह इसलिए देखती है क्योंकि समय के रुक जाने में भी एक अजीब सुकून होता है?

मैं ट्रेन में चढ़ा।
खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता गया। वह बेंच खाली हो गई। वह कुत्ता कहीं और चला गया।
लेकिन प्रतीक्षा — वह मेरे साथ चढ़ आई।
वह हमेशा चढ़ आती है।
मुझे लगता है यह मुखौटा — “धैर्यवान” का मुखौटा — दरअसल प्रतीक्षा का दूसरा नाम है।

हम जिसे धैर्य कहते हैं, वह अक्सर सिर्फ यह होता है कि हमें अभी तक कोई रास्ता नहीं मिला। तो हम इंतज़ार करते हैं।और इंतज़ार को एक सुंदर नाम दे देते हैं।

रात को जब मैं सोने की कोशिश कर रहा था, तो वह बूढ़ी औरत याद आई।
मैंने सोचा — काश मैं उससे पूछ पाता: उस घड़ी में कितने बजे हैं?
शायद वह मुस्कुराती। शायद कहती — “वही, जो तुम्हारी घड़ी में भी हैं।”

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