परफेक्ट प्रेमी का मुखौटा

“अगर यह कहानी आपको चुभे…तो शायद यह आपके लिए है।”

“शायद मैं ही गलत थी”—यह वाक्य सबसे ख़तरनाक है।
क्योंकि यह तब बोला जाता है जब कोई आपको इतना तोड़ चुका होता है कि आप अपनी गलती ढूँढने लगते हो।
यह कहानी उस औरत की है जिसने एक नार्सिसिस्ट से प्यार किया।
और आज भी सोचती है—”शायद किस्मत ही ख़राब थी।”

हर इंसान के भीतर एक छोटा-सा नार्सिसिस्ट बैठा होता है।
कुछ उसे छिपाते हैं। कुछ उसे पालते हैं। कुछ उसे इतनी खूबसूरती से सजाते हैं कि वह दानव नहीं,देवता लगने लगता है।
और मैं—मैं उन लोगों में से हूँ जिन्होंने अपने भीतर के उस नार्सिसिस्ट को देखा है। पहचाना है। और कभी-कभी,बहुत शर्म के साथ,उसे खुला भी छोड़ दिया है।

मुझे याद है वह रात।
मैं अपने कमरे में बैठा था। दरवाज़ा बंद था। फोन बज रहा था—बार-बार। लेकिन मैं नहीं उठा।
क्योंकि मुझे पता था—दूसरी तरफ़ वही थी। वही। जिसे मैंने तोड़ा था। जिसकी हिम्मत मैंने चुराई थी। जिसे मैंने पहले आसमान दिखाया था—और फिर ज़मीन पर गिरा दिया था।
और फिर भी—वह फोन कर रही थी।
मुझे।

मेरे पास एक मुखौटा है जिसे मैं “परफेक्ट प्रेमी का मुखौटा” कहता हूँ।
यह बहुत सुंदर मुखौटा है। इस पर मुस्कान है,गर्माहट है,समझ है। यह मुखौटा किसी को भी विश्वास दिला सकता है कि मैं उसकी परवाह करता हूँ।
और सच यह है—मैं करता भी हूँ।
लेकिन उस परवाह में ज़रा सा ज़हर मिला होता है। थोड़ा-सा। इतना कम कि शुरुआत में पता नहीं चलता। लेकिन इतना ज़रूरी,कि जब तक पता चले—बहुत देर हो चुकी होती है।

पहला दिन जब उससे मिलना हुआ था।
हम एक कॉफ़ी शॉप में मिले थे। वह किताब पढ़ रही थी—सिमोन द बोउआर की द सेकंड सेक्स
मैंने मुस्कुराकर कहा,”अच्छी पसंद है।”
उसने देखा। थोड़ा शर्माई। फिर बोली,”आपने पढ़ी है?”
मैंने कहा,”हाँ। लेकिन मुझे लगता है—असली स्वतंत्रता खुद से मिलती है। दूसरों से नहीं।”
उसकी आँखों में चमक आ गई। वह चमक—जो हर उस औरत की आँखों में आती है जिसे लगता है कि उसे कोई अलग इंसान मिल गया है। कोई जो उसे समझता है।
और मैंने अंदाज़ा लगा लिया—यह शिकार आसान होगा।

हफ़्ते भर बाद नियंत्रण की शुरुआत हुई।
मैं उससे रोज़ मिलने लगा। रोज़ बात करने लगा। धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी में घुसने लगा—बिना दस्तक दिए।
“तुम्हारी सहेलियाँ तुम्हें समझती नहीं,”मैंने एक दिन कहा।
“कैसे पता?”उसने पूछा।
“क्योंकि अगर समझतीं—तो तुम इतनी अकेली नहीं होती।”
वह चुप हो गई। मैंने देखा—पहला बीज बो दिया गया था।
अगले हफ़्ते उसने अपनी सहेलियों से मिलना कम कर दिया। मुझसे मिलना ज़्यादा।

महीना भर बाद।
अब मैं उसे इतना प्यार देने लगा कि वह डूबने लगी।
हर सुबह मैसेज। हर शाम फोन। हर मिलने पर—”तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ।”
उसे लगने लगा—शायद यही प्यार है।
लेकिन प्यार और जुनून में फर्क होता है। प्यार आज़ाद करता है। जुनून क़ैद करता है।
और मैं—मैं जुनून दे रहा था। प्यार के नाम पर।

अगले महीने—एक दिन मैंने उससे कहा,”तुम बदल गई हो।”
उसने हैरान होकर पूछा,”कैसे?”
मैंने कहा,”पहले तुम इतनी इमोशनल नहीं थीं। अब तो हर छोटी बात पर उदास हो जाती हो।”
सच यह था—वह नहीं बदली थी। मैंने उसे बदला था। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास तोड़ा था।
लेकिन उसे लग रहा था—गलती उसकी है।
और यही सबसे बड़ी जीत थी।

तीसरा महीना—अलगाव का नाटक।
अब उसके जीवन में सिर्फ़ मैं था।
उसकी सहेलियाँ उससे दूर हो चुकी थीं—क्योंकि मैंने ऐसा उसे बताया था कि वे मुझे पसंद नहीं करती थीं।
उसका परिवार—मुझसे दूर रहने की सलाह देता था।
लेकिन अब वह उनकी नहीं सुनती थी।
क्योंकि मैंने उसे बता दिया था—”ये लोग हमें नहीं समझते। ये हमें अलग करना चाहते हैं।”
और वह मान गई।

इस तरह जब कोई पूरी तरह अकेला हो जाता है—तो उसके पास सिर्फ़ एक ही विकल्प बचता है। उसी के पास लौट जाना जिसने उसे अकेला किया।

चौथा महीना:ठंडी चुप्पी।
एक दिन मैं अचानक ग़ायब हो गया।
तीन दिन तक कोई फोन नहीं। कोई मैसेज नहीं।
वह पागल हो गई। रो रही थी। डर रही थी। सोच रही थी—कहीं मैं छोड़कर तो नहीं गया।
चौथे दिन जब मैं मिला—तो उसने पूछा,”कहाँ थे आप?”
मैंने ठंडी आवाज़ में कहा,”मुझे अकेले रहने की ज़रूरत थी। तुम बहुत ज़्यादा clingy हो रही हो।”
और उसने माफ़ी माँगी।
बिना अपनी किसी गलती के—माफ़ी माँगी।

पाँचवाँ महीना:Stockholm Syndrome।
अब कुछ अजीब हो रहा था।
वह समझ रही थी—मैं उसे तोड़ रहा हूँ।
उसकी सहेलियाँ बता रही थीं उससे—यह रिश्ता toxic है।
लेकिन फिर भी—
जब मैं उसके पास लौटता—वह मुझे गले लगा लेती।
जब मैं थोड़ा-सा प्यार दिखाता—उसे लगता यह दुनिया की सबसे बड़ी दया है।
जब मैं माफ़ी माँगता—वह सोचती शायद मैं बदल रहा हूँ।

यह क्यों हो रहा था?
क्योंकि उसका दिमाग survival mode में जा चुका था।
वह पूरी तरह नियंत्रण खो चुकी थी।
वह भाग नहीं सकती थी—क्योंकि उसे लगता था कहीं और कोई नहीं।
कोई और उपलब्ध नहीं—क्योंकि सबको दूर कर दिया गया था।
तो मस्तिष्क खतरे को कम करने के लिए भावनात्मक जुड़ाव बना लेता है।

पीड़ित खुद को समझाता है—”वह इतना बुरा नहीं है। कभी-कभी तो बहुत अच्छा है।”

यह ट्रोमा बोंडिंग है।
यह स्टॉकहोम सिंड्रोम है।

इसकी मुख्य विशेषताएँ:
• अत्याचार करने वाले के प्रति सहानुभूति
• बचाने वालों(दोस्त,परिवार)के प्रति नकारात्मक भाव
• अत्याचार को उचित ठहराना—”शायद मैं ही गलत हूँ”
• अत्याचारी की विचारधारा से सहमति

छठा महीना:टूटना।
एक रात वह फूट पड़ी।
रोते हुए बोली,”मैं नहीं जानती—मुझे क्या हो गया है। मैं खुद को पहचान नहीं पा रही।”
मैंने उसे गले लगाया। धीरे से कहा,”मैं यहाँ हूँ। मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”
और उस पल—मुझे नफ़रत हुई खुद से।
क्योंकि मैं जानता था—यह झूठ था।
लेकिन मैं बोल नहीं पाया।
क्योंकि मेरे भीतर का नार्सिसिस्ट—अब भी ज़िंदा था।

सातवाँ महीना:आख़िरी झटका।
एक दिन मैंने उससे कहा,”हमें थोड़ा ब्रेक लेना चाहिए।”
उसने कहा,”क्यों?”
मैंने कहा,”तुम बहुत ज़्यादा निर्भर हो गई हो। तुम्हें खुद को खोजने की ज़रूरत है।”
विडंबना देखिए—जिसने उसे लाचार बनाया वही उसे इस बात का ताना दे रहा था।
वह रोने लगी। गिड़गिड़ाने लगी।
और मैं—मैं चला गया।
क्योंकि अब मुझे नया शिकार मिल चुका था।

आज—तीन साल बाद।
आज मैं उसे रास्ते में देखता हूँ—कभी-कभी।
वह अब ठीक है। नई ज़िंदगी शुरू की है उसने। नए दोस्त बनाए हैं। शायद किसी नए से मिल भी रही है।
लेकिन जब हमारी नज़रें मिलती हैं—
उसकी आँखों में अब भी वही देखता हूँ।
डर नहीं। नफ़रत नहीं।
बल्कि—एक अजीब-सा लगाव। और एक गहरा सवाल।

“शायद मैं ही गलत थी।”
“शायद मुझमें ही कोई कमी थी।”
“प्यारे तो तुम आज भी हो यार।”
“पर क्या करें—किस्मत अपनी।”

और फिर वह एक गहरी साँस छोड़ती है।
उस साँस में छिपे हुए शब्द—मैं बखूबी सुन सकता हूँ:

“शायद अगली बार तुम बदल जाओ।”
“शायद अगली बार मैं तुम्हारे लायक बन जाऊँ।”
“शायद…”

और मैं—
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
क्योंकि मैं जानता हूँ—
मैंने जो सिखाया था,वह आज भी काम कर रहा है।

क्योंकि सच यह है—
हर इंसान के भीतर एक छोटा-सा नार्सिसिस्ट होता है।
कुछ उसे क़ाबू में रखते हैं।
कुछ उसे खुला छोड़ देते हैं—जंगली।
और जब वह जंगली हो जाता है—
तो वह सिर्फ़ दूसरों को नहीं—
खुद को भी तोड़ देता है।

और शायद—
यही सबसे बड़ी सज़ा है।
कि तुम जानते हो तुम क्या कर रहे हो—
लेकिन रोक नहीं सकते।

मैं उससे प्यार करता था।
लेकिन अपने तरीके से।
और मेरा तरीका—toxic था।
और फिर भी—वह आज भी सोचती है—
“शायद गलती उसी की थी।”
क्योंकि मैंने उसे ऐसा ही सिखाया था।

रविकांत राऊत
जबलपुर मध्यप्रदेश

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