हां का झूठा मुखौटा

“Counterfeit Yes: जब लोग कहते हैं ‘हाँ, ज़रूर’ और फिर ग़ायब हो जाते हैं।
यह बुराई नहीं — लोगों को खुश रखने की बीमारी है। और मैं भी यही करता था। 🎭”

उस शाम मैं एक कॉफी शॉप में बैठा था।
मेरे सामने एक दोस्त बैठा था। वह उत्साहित था।
“मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ,” उसने कहा।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“Passion,” उसने कहा।
मैंने सिर हिलाया।

कॉफी ठंडी हो रही थी।
तभी उसने कहा, “तुम मेरे साथ जुड़ोगे?”
मैंने सहजता से कहा — “हाँ, ज़रूर।”
यह शब्द मुँह से निकलते ही मुझे भीतर कुछ टूटता हुआ लगा।
क्योंकि मैं जानता था — मैं यह नहीं करूँगा।

उस रात घर लौटते समय मुझे अचानक एक शब्द याद आया।
Counterfeit Yes.
नकली “हाँ”।
वह “हाँ” जो हम लोगों को खुश रखने के लिए बोलते हैं।
वह “हाँ” जो हम जानते हैं कि झूठ है।
वह “हाँ” जो सामने वाले को उम्मीद देती है और हमें अस्थायी शांति।

अगले दिन उसका फोन आया।
मैंने नहीं उठाया।
फिर मैसेज आया।
“कल जो कहा था — सीरियस हो?”
मैंने जवाब नहीं दिया।
तीसरे दिन फोन फिर आया।
मैंने स्क्रीन देखी। फोन बजता रहा।
और उसी क्षण मुझे एहसास हुआ —
मैं बुरा आदमी नहीं हूँ।
लेकिन मैं ईमानदार भी नहीं हूँ।
मैं बस एक और आदमी हूँ जो लोगों को खुश रखने के लिए छोटे-छोटे झूठ बोलता है।

हम सोचते हैं झूठ बड़ा होता है।
असल में सबसे खतरनाक झूठ छोटे होते हैं।
एक नकली “हाँ”
एक टाली हुई कॉल
एक अधूरा वादा
धीरे-धीरे यह सब मिलकर एक आदमी बना देते हैं जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

रात को आईने में खुद को देखा।
मुझे लगा — मेरे पास बहुत सारे मुखौटे हैं।
सफल आदमी का। शांत आदमी का। समझदार आदमी का।
लेकिन एक मुखौटा सबसे खतरनाक है।
“अच्छा आदमी” का मुखौटा।
क्योंकि इसी के पीछे हम सबसे ज्यादा झूठ बोलते हैं।

उस रात मैंने अपने दोस्त को मैसेज किया।
“कल जो मैंने कहा था — वह सच नहीं था। मैं वह नहीं कर पाऊँगा।”
कुछ देर बाद उसका जवाब आया।
“ठीक है। कम से कम तुमने सच तो कहा।”
बस इतना।
कोई ड्रामा नहीं।
और अचानक मुझे समझ आया —
हम झूठ बोलकर लोगों को नहीं बचाते।
हम सिर्फ़ सच्चाई से डरते हैं।

सत्य तक पहुँचना भी अजीब प्रक्रिया है।
पूर्ण सत्य शायद कभी नहीं मिलता।
पर उसकी तलाश में हम इतना तो पाते हैं कि हम कम गलत होते जाते हैं।

उस रात सोने से पहले एक और विचार आया।

सबसे खतरनाक क्षण कौन-सा होता है?
वह जब आदमी सोचने लगे —
“मैं हक़दार हूँ, मैं डिज़र्व करता हूँ।”
यही वह क्षण है जहाँ गिरावट शुरू होती है।
क्योंकि हक़दार होने का भ्रम आदमी को अंधा बना देता है।

अब मेरे पास एक नया मुखौटा है।
“ईमानदार होने की कोशिश करने वाले आदमी” का मुखौटा।
यह परिपूर्ण नहीं है।
लेकिन यह नकली “हाँ” से बेहतर है।

और मैंने सीखा —
मनुष्य का असली चेहरा उसके बड़े फैसलों में नहीं दिखता।
वह दिखता है उस एक छोटे क्षण में जब फोन बज रहा होता है और वह तय करता है —
“उठाऊँ… या एक और नकली ‘हाँ’ बन जाऊँ।”

रविकांत राऊत
जबलपुर मध्यप्रदेश

 

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