
“‘Follow your passion’—सबसे बड़ा झूठ है।Passion पेट नहीं भरता, और झूठा passion आपको तोड़ देता है।मैंने 5 साल बर्बाद किए।फिर सच जाना।
जब पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने नौकरी न करने की बात कही,तब
सबने कहा—”पागल हो गया है क्या?”
मैंने कहा—”नहीं।मैं अपना passion follow कर रहा हूँ।”
मेरा passion था—लिखना।कहानियाँ।किताबें।वो सब जो “सफल” लेखक अपने ब्लॉग और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं।
मैंने सोचा—अगर मैं पूरी तरह समर्पित हो गया,तो ज़रूर कुछ होगा।
यह सोच—मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।
पहले तीन महीने शानदार थे।
मैं रोज़ सुबह 6 बजे उठता।कॉफ़ी बनाता।कम्प्यूटर खोलता।और लिखता—घंटों।
कोई बॉस नहीं।कोई मीटिंग नहीं।बस मैं और मेरी कहानियाँ।
सोशल मीडिया पर पोस्ट करता—”Day 47 of my writing journey 🖋️✨”
लाइक्स आते।कमेंट आते।”So inspiring! “”Keep going!””You’re amazing!”
मुझे लगा—बस,यही है ज़िंदगी।
लेकिन दूसरे साल आते-आते—बैंक बैलेंस ख़त्म हो गया।
अब मुझे पैसों की ज़रूरत थी।तो मैंने अपनी कहानियाँ publishers को भेजीं।
पहले publisher ने कहा—”बहुत अच्छा लिखते हो।हम ज़रूर consider करेंगे।”
मैं खुश हो गया।
दो महीने बाद—कोई जवाब नहीं।
मैंने फोन किया।उन्होंने कहा—”हाँ हाँ,देख रहे हैं।जल्दी ही बताएँगे।”
फिर कभी जवाब नहीं आया।
यही हुआ अगले पाँच publishers के साथ।
हर बार—”बहुत अच्छा है।ज़रूर करेंगे।”
हर बार—ख़ामोशी।
लोग “ना” नहीं बोलना चाहते क्योंकि “ना” से तकलीफ़ होती है।
तो वे “हाँ” बोलते हैं—और फिर ग़ायब हो जाते हैं।
यह बुराई नहीं है।यह लोगों को खुश रखने की बीमारी है।
और मैं भी यही करता था।दोस्तों से।परिवार से।
“हाँ भाई,अगले हफ़्ते मिलते हैं।”
“हाँ,ज़रूर मदद करूँगा।”
“हाँ,तुम्हारा startup idea बहुत बढ़िया है।”
और फिर—कभी फोन नहीं उठाता।
तीसरे साल—मेरी एक पुरानी दोस्त की startup fail हुई।
वह रो रही थी।फोन पर।
मैंने सांत्वना दी।”कोई बात नहीं।अगली बार हो जाएगा।”
लेकिन जब फोन काटा—मैंने अपने चेहरे पर एक अजीब मुस्कान देखी।
बहुत हल्की।बहुत छोटी।
लेकिन थी।
मैं चौंका।मैं खुश क्यों हूँ?
फिर समझ आया।
क्योंकि अगर वह सफल हो जाती—तो मैं और पीछे रह जाता।
और मेरा ego—मेरा छिपा हुआ,गंदा ego—यह बर्दाश्त नहीं कर पाता।
यह था मेरा “Out of Character moment”
जब आप ‘सामान्य’ नहीं रहते—वही आपका असली रूप होता है।
गुस्से में बोला गया एक वाक्य।
ईर्ष्या में चमकती आँखें।
किसी की असफलता पर आपकी छिपी खुशी।
यही वे क्षण हैं जहाँ मुखौटा गिर जाता है।
चौथे साल भी मेरे पास कुछ नहीं था।
ना किताब छपी।ना पैसा।ना सम्मान।
लेकिन मुझे लगता था—मुझे मिलना चाहिए।
मैं सोचता था—”मैंने इतनी मेहनत की है।इतना sacrifice किया है।मैं deserve करता हूँ।”
यह थी—हक़दारी की भ्रांति।
जिस दिन आपको लगे कि आप हक़दार हैं—उसी दिन आप गिरने लगते हैं।
क्योंकि दुनिया किसी की मेहनत से नहीं चलती।
दुनिया results से चलती है।
और मेरे पास results नहीं थे।
पाँचवें साल—मैं टूट चुका था।
पैसे ख़त्म।उम्मीद ख़त्म।दोस्त ख़त्म।
एक रात मैंने तय किया—अब बस।
मैंने अपनी सारी कहानियाँ delete कर दीं।
अपना Facebook और Instagram account बंद कर दिया।
और अगले दिन—एक कॉल सेंटर में job के लिए apply कर दिया।
Interview में HR ने पूछा—”आप writer थे।फिर यहाँ क्यों आना चाहते हैं?”
मैंने सच बोला।
“क्योंकि passion पेट नहीं भरता।और झूठा passion अंततः आपको तोड़ देता है।”
उसने एक लंबी नज़र से मुझे देखा।
फिर बोली—”Hired.”
कॉल सेंटर में काम करते हुए छह महीने बीते।
नौ से पाँच की नौकरी।Fixed salary।कोई passion नहीं।कोई dream नहीं।
लेकिन—
मैं पहली बार शांत था।
पहली बार मुझे नहीं लग रहा था कि मुझे कुछ “prove” करना है।
पहली बार मैं बिना मुखौटे के जी रहा था।
और फिर एक अजीब बात हुई।
एक रात जब मैं घर लौटा—बिना किसी pressure के,बिना किसी Instagram validation के—मैंने फिर से लिखना शुरू किया।
लेकिन इस बार—
यह passion नहीं था।
यह बस—करना था।
कोई expectation नहीं।कोई “मुझे famous होना है” नहीं।
बस—लिखना अच्छा लगता था।तो लिखा।
एक साल बाद—मेरी एक कहानी छपी।
छोटे से magazine में।कोई पैसा नहीं मिला।
लेकिन मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
क्योंकि अब मैं यह नहीं सोच रहा था—”मैं writer हूँ।”
मैं बस—लिख रहा था।
और इसी के साथ मुझे समझ आया—
सत्य तक पहुँचना एक प्रक्रिया है।
पहले मेरा सत्य था—”मैं writer बनूँगा।”
फिर सत्य बदला—”Passion एक झूठ है।”
अब सत्य यह है—”मैं नहीं जानता क्या सही है।लेकिन जो भी है,यह ठीक है।”
आज जब कोई पूछता है—”तुम क्या करते हो?”
मैं कहता हूँ—”कॉल सेंटर में काम करता हूँ।”
“और writing?”
“वो भी करता हूँ।लेकिन वो मैं नहीं हूँ।वो बस—कुछ है जो मैं करता हूँ।”
लेकिन अजीब बात यह है—
यह मुखौटा नहीं है।
यह पहली बार—मेरा असली चेहरा है।
क्योंकि जब तक मैं “writer” बनने की कोशिश कर रहा था—
तब तक मैं एक मुखौटा पहने था।
“Passionate”, “Dedicated”, “Inspiring” का मुखौटा।
लेकिन जब मैंने passion छोड़ा—
तब जाकर मैं खुद बन पाया।
और शायद—
यही सबसे बड़ा twist है:
कि हम जो बनना चाहते हैं—
वह अक्सर वो नहीं होता जो हम हैं।
और जब हम बनना छोड़ देते हैं—
तब जाकर हम होते हैं।
रविकांत राऊत
जबलपुर मध्यप्रदेश
रविकांत राऊत
जबलपुर मध्यप्रदेश
