अलमारी के हर ख़ाने पर
करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं
अब यादों को तलाशने में
वक़्त ज़ाया नहीं होता
आज एक ख़त
अचानक निकल आया पुराने सामानों में
‘कोरा’ ही भेज दिया था कभी किसी ने
पहचानी सी खुशबू
किसी नाम की चुगली कर रही है
अब समझ नहीं आ रहा सहेजूं इसे
या पुर्जा-पुर्जा कर उड़ा दूं
उसे रुसवा होने से बचाने के लिये
