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उलझनें घटना से नहीं, अर्थ से जन्म लेती हैं

अर्थ — उलझनें घटना से नहीं, अर्थ से जन्म लेती हैं

किसी घटना की चोट हमें इसलिए नहीं लगती कि वह घटित हुई; चोट तो उस अर्थ से लगती है जिसे हम उस घटना पर आरोपित कर देते हैं।

घटना बाहरी होती है—पर उसकी पीड़ा हमारे द्वारा रची गई व्याख्या से जन्म लेती है।”

मान लीजिए रास्ते पर चलते समय किसी ने पीछे से आपको ज़ोर से धक्का दे दिया। एक ही घटना — लेकिन अर्थ बदलते ही अनुभव बदल जाता है:

  1. अगर आप सोच लें — “यह आदमी मुझे अपमानित करना चाहता है।” तुरंत गुस्सा, चोट, अपमान की भावना जाग जाएगी। धक्का छोटा था… पर अर्थ बड़ा बना दिया गया।
  2. अगर आप सोच लें — “शायद उसका संतुलन बिगड़ गया होगा।” मामला यहीं शांत हो जाता है। धक्का वही था… पर अर्थ बदलते ही चोट भी गायब।
  3. अगर आप पता करें कि वह व्यक्ति चोटिल था या भाग रहा था। तो हो सकता है आपको उस पर दया महसूस होने लगे। फिर वही धक्का अचानक दर्द नहीं बल्कि “घटना” भर रह जाता है।

अब इस उदाहरण का सार- घटना वही रहती है। चोट हमारे द्वारा दिए गए अर्थ से पैदा होती है। यानी अगर आप अपनी सोच की भाषा बदल लें,आप अपनी दुनिया बदल सकते हैं। हम अक्सर घटना को नहीं, उसकी व्याख्या को जी रहे होते हैं।”

जीवन की अधिकांश उलझनें घटनाओं से नहीं,घटनाओं को दिए गए अर्थ से पैदा होती हैं।

कोर्ज़िब्स्की ने एक वाक्य लिखा जो बाद में पूरी दुनिया में फैल गया- “The map is not the territory.” (नक्शा जमीनी हकीकत नहीं होता)

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रविकान्त राऊत

जबलपुर (मध्यप्रदेश)

रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

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