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थकावट का मुखौटा

आज मैं मजबूत दिख रहा था।
कम से कम बाहर से।
सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।
काम की सूची लंबी थी।
लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।
हर बातचीत में मुझसे समाधान माँगा गया।
मैंने दिया भी — मुस्कान के साथ, स्पष्ट आवाज़ में, बिना झिझक।
लेकिन शाम तक आते-आते एक हल्की दरार महसूस हुई।
थकान शरीर में नहीं थी।
वह भूमिका में थी।
कभी-कभी नायक होना भी एक आदत बन जाती है।
हर जगह जवाब देना।
हर स्थिति में स्थिर दिखना।
हर संकट में संयमित रहना।
धीरे-धीरे लोग यह मान लेते हैं कि आप टूटते नहीं।
और आप भी।
आज दोपहर एक क्षण ऐसा आया जब मैं अकेला था।
कमरे में कोई नहीं।
खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी।
मैंने कुर्सी पर बैठते हुए महसूस किया — कंधे भारी हैं।
जैसे दिन भर किसी अदृश्य वजन को उठाए रहा हूँ।
मैंने खुद से पूछा — अगर आज मैं मजबूत न रहूँ तो क्या होगा?
यह सवाल डरावना था।
क्योंकि “मजबूत” मेरा परिचय बन चुका था।
हम अक्सर अपने सबसे प्रशंसित गुण में कैद हो जाते हैं।
लोग कहते हैं — “आप तो संभाल लेते हैं।” “आप तो घबराते नहीं।” “आप तो हमेशा शांत रहते हैं।”
और धीरे-धीरे आप अपने ही बनाए संस्करण से बाहर निकलने की अनुमति नहीं देते।
शाम को आईने में देखा।
चेहरा सामान्य था।
कोई आँसू नहीं।
कोई स्पष्ट टूटन नहीं।
बस आँखों में हल्की थकावट।
मैंने पहली बार खुद से कहा — “आज मैं थका हूँ।”
यह स्वीकार करना अजीब था।
जैसे कोई गुप्त बात बोल दी हो।
लेकिन उसी क्षण भीतर थोड़ी जगह बनी।
नायक हमेशा युद्ध में नहीं होता।
कभी-कभी उसे कवच उतारकर बैठना पड़ता है।
मैंने फोन उठाया।
किसी को शिकायत नहीं की।
बस इतना कहा — “आज थोड़ा थका हूँ।”
उस पार से जवाब आया — “ठीक है। आराम करो।”
इतना ही।
दुनिया फिर भी चलती रही।
जिम्मेदारियाँ गायब नहीं हुईं।
लेकिन एक भ्रम टूट गया — कि मुझे हर समय अडिग रहना है।
थका हुआ नायक हार नहीं रहा होता।
वह मानव हो रहा होता है।

और शायद असली साहस यही है — जब आप स्वीकार करें कि आप अजेय नहीं हैं।

रात को सोते समय लगा — आज मैंने कोई बड़ी जीत हासिल नहीं की।
लेकिन मैंने एक मुखौटा उतार दिया।
“हमेशा मजबूत” का।
और उसके नीचे जो चेहरा था — वह कमजोर नहीं था।
वह सच्चा था।

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