शून्य : एक अवधारणा

शून्य इसे किस रुप में देखा जाये- “निरंकता” के रूप में  अथवा “अनंतता” के रूप में ? आज सुबह-सुबह ही , अपने व्हाट्स-एप्प  पर शून्य पर दो पोस्ट पढ़ कर मैं भी प्रेरित हुआ लगा मैं भी कुछ कहूं .

एक तरफ ये कहा गया कि शून्य की अपनी कोई कीमत नहीं पर जब वो किसी से जुड़्ता है तो एक मूल्य निर्मित होता है, दूसरी तरफ कहा गया कि जिसकी कोई कीमत ही नहीं वो कैसे किसी को मायने दे सकता है ?

शून्य को नापने के मैं दो पैमाने आपको देता हूं ,सबसे पहला प्रश्न तो यह है कि आप नापना कहते किसे हैं , नाप तो उसे ही सकते हैं, न  जिसकी कोई नाप हो, पर…  एक वो,  जो माप हीन हो और अर्थात जिसका मान ही “निरंक”  हो उसे आप कैसे नापेंगे और दूसरे उसे कैसे नापेंगे ,  जो अपरिमित अथवा अनंत संभावनाओं वाला हो . दोनों को ही नापा नही जा सकता। तो ये  हमारी नापने की असमर्थतता को प्रकट करता है , चूंकि हम नाप सकने में असमर्थ हैं , सिर्फ़ इसलिये उसे हम उसे “निरंक”  या “ मूल्य विहीन”  नहीं कह सकते.  बल्कि ये तो हमारी सीमायें हैं,  अनंत को न माप सकने की।

अंग्रेज़ी मे एक शब्द है ” Axiom”,  हिंदी में इसका भावार्थ मैं दूं तो इसके मायने होंगे “स्वंयसिद्ध”, अथवा “स्व-सत्यापित” , अर्थात जिसके मूल्य निर्धारण अथवा परिमाप के लिये किसी बाह्य अथवा किसी सापेक्ष साधन की आवश्यकता नहीं रहती ।

सच कहें तो कोई ऐसा साधन ही नहीं होता जो किसी अनंत को नाप सके ।  ठीक ईश्वर के अस्तित्व की तरह ।

क्योंकि, जो नाप ही लिया गया हो  वो “अनंत” कैसा । दूसरी तरह से कहा जाय कि , जिसकी व्याख्या कुछ चलताऊ लोगों द्वारा हो सकती हो , तो फिर वो “ईश्वर” कैसा?                                                                                                                     एक “बिंदू” की तरह ही “शून्य” भी और “ईश्वर” भी दोनों भी अपरिमित हैं, स्वंयसिद्ध है.  कहने का तात्पर्य यह कि शून्य  “निरंक” नहीं बल्कि “अनंत संभावना” है  । पर एक ट्विस्ट है इसमें कि जब कभी भी  एक अनंत,  किसी पूर्व-मान के साथ जुड़्ता है,  तो वो भी जुड़ने वाले की प्रकृति के अनुरुप ही “परिमापित”(Measurable) और परिसीमित(Limited) हो जाता है ।

शून्य के प्रतिकात्मक स्वरूप को ही देखें,  जो हमारे पूर्व मनीषियों के प्रचंड उर्वर मस्तिष्क की रचना है, कि इसे एक “वृत्त” रूप दिया है , याने “अनंत-परिगमन” ना “आदि” न “अंत” । जबकि अन्य अंक मानों के संकेताक्षर या प्रतीक “विवर्त” याने खुले हैं, इनका एक प्रारंभ और अंत होता ही है,  और वो दिखाई भी देता है ।

इस तरह जब अनंत सम्भावना वाला शून्य भी जब किसी पूर्व अंक या मान से जुड़्ता है तो, पूर्व- मान के आधार पर उसे भी अपना मान सीमित अथवा मर्यादित कर लेना पड़ता है  याने शून्य भी किसी मान के साथ जुड़कर भी, उसके पूर्व-मान से 10 गुना ही दे पाता है ।
हमारे पौराणिक आख्यानों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि, जब भी किसी परमशक्ति ने इस धरा पर व्यवस्थाओं के पुनरुद्धार के लिये किसी मानव योनी में जन्म लिया तो उसने उस पूर्व समाज को एक “मान” दिया, पर यहां पर उसे भी अपनी अनंतता को भूल कर, उस समाज, देश, परिवार और मान्यताओं का मान रखने के लिये स्वयं को सीमित रखना ही पड़ा था ।

विष्णु — जो स्वयं अनंत हैं, जो क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से सृष्टि उपजती है — जब भी इस धरा पर आए, तो एक सीमित मनुष्य की देह ओढ़कर आए। राम बने तो पिता की आज्ञा के सामने झुके, वनवास स्वीकारा, पत्नी के वियोग में रोए — एक साधारण मानव की तरह। कृष्ण बने तो कंस के भय में पले, सुदामा की दरिद्रता को देखकर भी तत्काल चमत्कार नहीं किया, महाभारत के युद्ध में स्वयं शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा लेकर, अपनी ही सीमा बाँध ली। यही तो वह क्षण है जब “अनंत” ने जानबूझकर अपना “शून्य-स्वभाव” त्याग कर एक “मान” ग्रहण किया — उस समाज का मान, उस युग की मर्यादा का मान। क्योंकि अनंत यदि बिना सीमा के प्रकट हो, तो मनुष्य उसे पहचान ही नहीं सकता, अनुसरण तो बहुत दूर की बात है। इसीलिए ईश्वर को भी यहाँ आकर “परिमापित” होना पड़ा — न इसलिए कि वो कमज़ोर था, बल्कि इसलिए कि जिस समाज को वो दिशा देना चाहता था, उसी की भाषा में बोलना था, उसी की सीमाओं के भीतर रहकर असीमित का अर्थ समझाना था, कि यह सीमा कोई “विवशता” नहीं , बल्कि एक “चेतन चयन” थी।
आप अपने ही आसपास नजर दौडायें, आप को भी इत्तेफाक़ होगा कि अनंत संभावना वाला कोई व्यक्तित्व, जब किसी कमतर से जुडता है तो अपना अनंत मान खो बैठता है, पर जैसे ही वो उस न्यून अंक  से अलग होता है , अपना अपरिमित आकाश पा जाता है । और यह केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है

जरा विश्वामित्र को देखिए — ब्रह्मर्षि बनने की असीम संभावना लिए हुए एक तपस्वी, जब मेनका के सान्निध्य में आया तो उसका सदियों का तप क्षणों में विलीन हो गया। वह “अनंत” एक “न्यून संग” से जुड़ा और अपना आकाश खो बैठा। पर जैसे ही उसने उस आसक्ति से स्वयं को अलग किया, वही विश्वामित्र पुनः अपनी असीम ऊँचाई पर लौट आया। यही तो है शून्य का स्वभाव , वह कभी अपना स्थायी रूप से खोता नहीं, बस अस्थायी से ढँक जाता है।

और अब उस दूसरे पक्ष की बात कि जब भी कभी “अहंकार”  शून्य से गुणित होने का दुस्साहस करता है- वो निरंक हो जाता है । ऐसे प्रकरणों में  इसे शून्य समझने की भूल न करें । यहां आपको समझ आ जायेगा कि शून्य और निरंकता दो अलग अलग चीजें है ।

रावण को लीजिए। वेद-ज्ञाता, शिव-भक्त, महापराक्रमी, अनंत संभावनाओं का पुंज था वह। पर उसके दंभ ने जब स्वयं को उस परम-शक्ति के सम्मुख खड़ा किया, जब उसने अपने अहंकार को ही अपना “मान” मान लिया, तो वह शून्य से नहीं, अपने ही अहंकार से गुणित हो गया। और परिणाम? “निरंक”। न लंका रही, न वंश, न यश। दुर्योधन भी ऐसा ही उदाहरण है — अद्भुत योद्धा, प्रखर बुद्धि, पर अहं का वह दुस्साहस जो यह मानने लगा कि वही “अनंत” है — और अंत में सब कुछ शून्य हो गया, पर वह शून्य अब उनके लिए कोई  “अपरिमित संभावना” नहीं, बल्कि निरंकता रह गयी थी।

यहाँ मेरे दर्शन की वह महीन किंतु महत्वपूर्ण रेखा स्पष्ट होती है कि –

शून्य वह है जो मिटकर भी बचा रहता है, निरंकता वह है जो मिटकर पीछे कुछ नहीं छोड़ती।         एक में संभावना है, तो दूसरे में विसर्जन।

इसे  मेरे ” विचार”  कहिये या “दर्शन”, पर आपके स्नेह की आकांक्षा हमेशा रहेगी.आप सभी का दिन आनंदपूर्ण बीते इसी शुभकामनाओं के साथ                                                                                    
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आपका अपना

रविकान्त  राऊत

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