

चौदह सितंबर की सुबह दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर एक चमकीला पोस्टर चस्पा हुआ — “Hindi Pakhwada: 14 to 28 September, Celebrate Our Mother Tongue!” पोस्टर का शीर्षक अंग्रेज़ी में था, नीचे मोटे अक्षरों में हिंदी में लिखा था, “अपनी भाषा पर गर्व करें।” जिस बाबू ने यह पोस्टर बनाया, उसने कंप्यूटर पर हिंदी कीबोर्ड ढूंढने में इतना वक्त गंवाया कि आखिर में पूरा मैटर अंग्रेज़ी में टाइप कर के गूगल ट्रांसलेट से हिंदी करवाना पड़ा, इस उम्मीद के साथ कि कोई शब्द अजीब न निकले। संयोग से एक जगह “प्राउड” का अनुवाद “गर्भवती” छपते-छपते बचा, वरना उद्घाटन समारोह में ही एक और उद्घाटन हो जाता।
मुख्य अतिथि जीएम साहब मंच पर आए, माइक संभाला, भाषण शुरू किया — “आज हम सब यहां एकत्रित हुए हैं ताकि अपनी राजभाषा के प्रति… एक्चुअली, कमिटमेंट को रिन्यू कर सकें।” ज़ोरदार तालियां बजीं। पीछे बैठे तीन बाबू आपस में फुसफुसाए, “सर ने राजभाषा दिवस पर ही राजभाषा को बीच रास्ते छोड़ दिया।” भाषण खत्म होते ही जीएम साहब मंच से उतरे और पीए से पूछा, “व्हाट अबाउट हाई टी?” – ठेठ अंग्रेज़ी में, मानो हिंदी सिर्फ मंच तक सीमित एक वर्दी हो, जो भाषण खत्म होते ही उतार कर क्लोकरूम में टांग दी जाती है।
इसी बीच “श्रेष्ठ हिंदी निबंध” प्रतियोगिता का परिणाम घोषित हुआ। विजेता निबंध का शीर्षक था “मातृभाषा का महत्व”, निर्णायक मंडल ने इसे भाव, भाषा और मौलिकता तीनों में उत्कृष्ट बताया। बाद में पता चला कि निबंध पहले चैटजीपीटी से अंग्रेज़ी में लिखवाया गया, फिर उसी ने हिंदी अनुवाद कर पेल दिया गया और लेखक महोदय ने सिर्फ अपना नाम हाथ से हिंदी में लिखा, बाकी पूरा दस्तावेज़ प्रिंटर से निकला हुआ था। पुरस्कार में मिला पांच सौ रुपये का चेक, जिसे जीतने वाले सज्जन ने उसी शाम दोस्तों के व्हाट्सएप ग्रुप में यह लिखकर सेलिब्रेट किया — “Guys, hindi diwas mein mera essay first aaya, party pakki!”
शाम को “हिंदी पखवाड़ा आयोजन समिति” का व्हाट्सएप ग्रुप भी जमकर सक्रिय रहा। ग्रुप का नाम देवनागरी में था, पर मैसेज कुछ यूं थे – “Please sabko reminder bhej dein attendance ke liye।” किसी ने मज़ाक में लिख भी दिया, “भाई हिंदी दिवस की प्लानिंग हिंदी में ही हो जाए तो सोने पे सुहागा”, जिस पर एक ठहाके वाला इमोजी आया, फिर बात फिर वहीं अंग्रेज़ी में आगे बढ़ गई, क्योंकि डेडलाइन नज़दीक थी और वक्त कम।
पखवाड़ा जब पूरा हुआ, नोटिस बोर्ड से पोस्टर उतार दिया गया, फाइल में एक फोटोग्राफ और एक रिपोर्ट लगा दी गई जिसमें लिखा था, “आयोजन अत्यंत सफल एवं उत्साहवर्धक रहा।” यह रिपोर्ट भी पहले अंग्रेज़ी में टाइप हुई थी, बाद में हिंदी में ढाली गई, क्योंकि दफ्तर का टेम्पलेट वैसा ही सेव था। अगले साल तक फिर भाषा वही रहेगी जो साल भर दफ्तर में चलती है, फिर माइक पर सिर्फ पंद्रह दिनों के लिए हिंदी उधार ले ली जायेगी.
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243
