कल्पना कीजिए कि किसी अस्पताल के तीन सबसे वरिष्ठ डॉक्टर एक मरीज़ का ऑपरेशन कर रहे हों, और ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलते ही दो डॉक्टर लिखित में शिकायत दर्ज कराएं कि उन्हें फैसलों की जानकारी ही नहीं दी गई। अस्पताल प्रशासन कहे – घबराइए मत, सब कुछ सर्वसम्मति से हुआ। मरीज़ किस पर भरोसा करे? पिछले हफ़्ते भारत के चुनाव आयोग के भीतर से ठीक ऐसी ही एक खबर बाहर आई, और यह मरीज़ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि देश के करीब 97 करोड़ मतदाता हैं।
23 सितंबर को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ चुनाव आयोग के दो सदस्यों – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी – ने बीते दस महीनों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई वाले फैसलों पर कम-से-कम चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई है। आपत्तियों का दायरा छोटा नहीं है। एक तरफ़ फॉर्म-6 में जोड़ा गया वह नया सवाल है, जिसमें नए मतदाता से पूछा जाता है कि क्या वह या उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछली मतदाता सूची में दर्ज थे – जोशी ने आपत्ति जताई कि किसी वैधानिक फॉर्म में ऐसा बदलाव नियमों में संशोधन किए बिना नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ़ वह शिकायत है कि मतदाता डेटा की आईटी प्रणाली की निगरानी की एक परत हटा दी गई, और यह उनकी जानकारी के बिना हुआ। आयोग का आधिकारिक जवाब आ चुका है – सब कुछ सर्वसम्मति से तय हुआ, सदस्यों के बीच कोई मतभेद नहीं। लेकिन जब कोई संस्था खुद अपने भीतर की असहमति को “सामान्य प्रक्रिया” कहकर खारिज करे, तो सवाल और गहरा हो जाता है।
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ। इसकी जड़ें बिहार की उस विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया में हैं, जिसने इस साल की शुरुआत में राज्य की मतदाता सूची से करीब 65 लाख नाम हटा दिए – कुल मतदाता संख्या 7.9 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ रह गई। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को इन हटाए गए नामों की पूरी सूची सार्वजनिक करने का आदेश दिया, और आयोग ने निर्देश के 56 घंटों के भीतर ज़िला वेबसाइटों पर नाम डाल भी दिए। इसके बाद यही कवायद पूरे देश में फैला दी गई। तीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मसौदा सूचियों से मिलाकर 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटे या शामिल नहीं हो सके। यह संख्या किसी छोटे राज्य की पूरी आबादी के बराबर है।
असली सवाल यह नहीं है कि मतदाता सूची साफ़ होनी चाहिए या नहीं – इस पर शायद ही किसी को एतराज़ हो। असली सवाल यह है: जिस संस्था को संविधान ने चुनाव के “अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” का अधिकार दिया है, अगर वही संस्था अपने भीतर पारदर्शी ढंग से काम करते हुए न दिखे, तो उसके फैसलों पर आम नागरिक कैसे भरोसा करे – चाहे वे फैसले तकनीकी रूप से सही ही क्यों न हों?
भारत के चुनाव आयोग की साख दशकों की मेहनत से बनी है। टी.एन. शेषन के दौर से लेकर अब तक, आयोग की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की रीढ़ माना गया है। लेकिन 2023 में बना एक कानून यह याद दिलाता है कि यह स्वतंत्रता स्थायी गारंटी नहीं, बल्कि लगातार बचाई जाने वाली चीज़ है। सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद, जिसमें चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने को कहा गया था, संसद ने नया कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह एक और केंद्रीय मंत्री को समिति में जोड़ दिया। नतीजा यह कि तीन सदस्यीय चयन समिति में अब सरकार के पास दो वोट हैं। मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इसी नए ढांचे के तहत नियुक्त होने वाले पहले व्यक्ति हैं। यह पृष्ठभूमि किसी को दोषी नहीं ठहराती, लेकिन इतना ज़रूर बताती है कि आयोग की निष्पक्षता को लेकर संदेह का माहौल पहले से मौजूद था – और अब भीतर से उठी असहमति ने उस संदेह को नया ईंधन दे दिया है।
आंकड़ों का दूसरा पहलू भी देखना ज़रूरी है, क्योंकि यह मामला उतना सीधा नहीं जितना विरोध और समर्थन के नारों में दिखता है। भारत की मतदाता सूचियों में गड़बड़ी कोई नई या मनगढ़ंत शिकायत नहीं है – मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियाँ, पलायन कर चुके लोगों के पुराने पते, यह सब वर्षों से चुनाव सुधार पर होने वाली बहसों का हिस्सा रहा है। एक बड़ी, बूढ़ी होती और लगातार गतिशील आबादी वाले देश में मतदाता सूची का समय-समय पर गहन पुनरीक्षण एक वाजिब प्रशासनिक ज़रूरत है, कोई साज़िश नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR की प्रक्रिया को संविधान के दायरे से बाहर नहीं माना। यानी जिन्हें लगता है कि यह पूरी कवायद ही बदनीयती से भरी है, उन्हें भी यह मानना होगा कि सूची की सफ़ाई अपने आप में गलत नहीं है।
फिर पेच कहाँ है? पेच तरीके में है, गति में है, और उस बोझ में है जो यह प्रक्रिया आम आदमी पर डालती है। जिस परिवार के पास पीढ़ियों पुराने दस्तावेज़ नहीं हैं – दिहाड़ी मज़दूर, प्रवासी कामगार, वे महिलाएं जिनका नाम कभी संपत्ति के कागज़ात में दर्ज ही नहीं हुआ – उनके लिए “अपनी नागरिकता साबित करना” उतना आसान नहीं जितना शहरी मध्यवर्ग के लिए है। फॉर्म-6 में जोड़ा गया वह सवाल, जो पूछता है कि क्या माता-पिता या दादा-दादी पुरानी सूची में थे, सुनने में तकनीकी लगता है, लेकिन व्यवहार में यह ठीक उसी तबके को अटकाता है जो बार-बार घर बदलने को मजबूर है। यही वजह है कि विपक्षी दल – तृणमूल कांग्रेस से लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी तक – आरोप लगा रहे हैं कि हटाए गए नामों में गरीब, दलित, मुस्लिम और प्रवासी मतदाताओं की संख्या असमान रूप से ज़्यादा है। आयोग के पास इसका पूरा और पारदर्शी जवाब अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं आया है।
यहीं पर आयोग के भीतर की असहमति असल मायने रखने लगती है। अगर दो आयुक्त खुद यह कह रहे हैं कि उन्हें आईटी प्रणाली की निगरानी से जानकारी छुपाकर बाहर रखा गया, तो यह सिर्फ प्रशासनिक शिकायत नहीं – यह इस बात का संकेत है कि प्रक्रिया की जाँच-परख खुद संस्था के भीतर भी कमज़ोर पड़ रही है। विपक्ष का यह कहना ग़लत नहीं कि जब आयोग के भीतर के लोग ही सवाल उठा रहे हों, तो बाहर से उठने वाले सवालों को “राजनीति से प्रेरित” कहकर टाल देना मुश्किल है। लेकिन यह भी सच है कि तीन अनुभवी प्रशासनिक अधिकारियों के बीच मतभेद होना अपने आप में असामान्य नहीं — किसी भी बड़े फैसले पर अलग-अलग राय रखना स्वस्थ संस्थागत बहस की निशानी भी हो सकती है, बशर्ते वह बहस पारदर्शी रहे और दबाई न जाए।
मेरी अपनी राय यह है कि यहाँ असली खतरा SIR की मंशा में नहीं, बल्कि उस तरीके में है जिसमें असहमति को दबाकर “सर्वसम्मति” का मुखौटा पहनाया जा रहा है। कोई भी संस्था तभी मज़बूत रहती है जब वह अपनी गलतियों और आंतरिक मतभेदों को स्वीकार करने से नहीं डरती। एक बयान जारी करके यह कह देना कि “सब ठीक है, कोई मतभेद नहीं” – जबकि लिखित रिकॉर्ड में चौदह आपत्तियाँ दर्ज हैं – भरोसा बढ़ाने के बजाय घटाता है। अगर सूची से हटाए गए हर नाम की वजह ज़िला स्तर पर स्पष्ट रूप से, समय रहते और स्थानीय भाषा में सार्वजनिक की जाए, अगर आपत्ति दर्ज कराने और नाम दोबारा जुड़वाने की प्रक्रिया वाकई सरल हो – तो सफ़ाई और सफ़ाये के बीच की रेखा साफ़ बनी रह सकती है। लेकिन अगर पारदर्शिता सिर्फ अदालत के आदेश पर मजबूरी में आती है, जैसा बिहार में हुआ, तो शक और गहरा होगा।
इसका असर सिर्फ अगले चुनाव नतीजे तक सीमित नहीं रहेगा। जिस दिन आम मतदाता को यह लगने लगे कि उसका वोट किसी अस्पष्ट प्रशासनिक फैसले से मिट सकता है, उस दिन वह सिर्फ एक सूची से नहीं, बल्कि लोकतंत्र की प्रक्रिया से ही भरोसा खोने लगता है। और एक बार टूटा भरोसा किसी अदालती आदेश या प्रेस विज्ञप्ति से वापस नहीं आता वह लौटता है सिर्फ तब, जब संस्थाएं अपने भीतर की बेचैनी को छुपाने के बजाय उसे ईमानदारी से सुलझाते हुए दिखती हैं। सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि सूची में कितने नाम सही हैं, बल्कि यह है कि जिस पर पूरे लोकतंत्र की गिनती टिकी है, वह गिनती करने वाला खुद कितना भरोसेमंद दिखता है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
९४२५६११२४३
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